45 पन्ने, 140 पॉइंट्स... BRICS के घोषणापत्र में विश्व के लिए छिपे बड़े संदेश
नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों का साझा बयान आने वाले वक्त में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की नई दशा-दिशा तय कर सकते हैं।
45 पन्ने, 140 पॉइंट्स... BRICS के घोषणापत्र में विश्व के लिए छिपे बड़े संदेश
ब्रिक्स समिट में जारी साझा बयान में कई अहम कूटनीतिक संदेश छिपे हैं।© ANI

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 का साझा बयान जारी हो चुका है। इस 'नई दिल्ली घोषणापत्र' को महज 45 पन्नों और 140 पॉइंट्स का कूटनीतिक दस्तावेज समझना भूल होगी, क्योंकि ब्रिक्स के 21 देशों ने इसमें हर उस बड़े सवाल पर सामूहिक राय रखी है, जो इस वक्त पूरी दुनिया को मथ रहे हैं। इसमें व्यक्त विचार आने वाले वक्त में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की नई दशा-दिशा तय कर सकते हैं। गहरे ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही दुनिया में यह बहुध्रुवीय व्यवस्था की एक सशक्त आवाज कही जा सकती है।

इस घोषणापत्र की एक सबसे बड़ी अहमियत है- आम सहमति। ब्रिक्स के विस्तारित परिवार में अब 21 देश हैं। इनमें से कई देशों की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं, अलग हित हैं, अलग विचार हैं। उन सभी को खासकर ईरान और यूएई जैसे देशों को एक साझा बयान पर राजी करना भारत की अपने आप में एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। खासकर तब, जब दुनिया कई मोर्चों पर संघर्ष, तनाव, व्यापारिक टकराव और पुरानी वैश्विक संस्थाओं पर घटते भरोसे से जूझ रही है। घोषणापत्र ने भारत की विश्वबंधु की छवि को फिर से मजबूत किया है। इस घोषणापत्र को ध्यान से पढ़ें तो इसमें कई अहम कूटनीतिक संदेश छिपे हैं।

ब्रिक्स समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी© ANI

पहलगाम हमले की कड़ी निंदा

नई दिल्ली घोषणापत्र में, जम्मू-कश्मीर में पिछले साल हुए पहलगाम आतंकी हमले की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की गई है। हालांकि पहलगाम नाम नहीं है, लेकिन 22 अप्रैल 2025 को 26 लोगों की जान लेने वाले इस हमले की कड़ी निंदा किया जाना ही अपने आप में बड़ी बात है।

ब्रिक्स ने सिर्फ आतंकवाद ही नहीं, सभी रूपों में आतंकवाद को खारिज किया है और जीरो टॉलरेंस की बात कही है। आतंकवाद की इसी व्यापक परिभाषा को लेकर अक्सर आम सहमति नहीं बन पाती है। लेकिन अब ब्रिक्स ने सीमापार आतंकवाद, आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों, टेरर फंडिंग और उसके पूरे इको सिस्टम के खिलाफ भी समन्वित प्रतिक्रिया की बात कही है।

पश्चिम एशिया संकट पर दो टूक बात

घोषणापत्र में पश्चिम एशिया खासकर ईरान के संकट, गाजा की स्थिति और इजरायल-फलस्तीन विवाद को लेकर स्पष्ट, संतुलित लेकिन कड़ा रुख अपनाया गया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताने के अलावा सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचने का आह्वान किया गया है, जिससे हालात और बिगड़ने की आशंका हो।

राष्ट्रों की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने और डायलॉग-डिप्लोमेसी से समाधान निकालने पर जोर दिया गया है, ताकि ऊर्जा की सप्लाई चेन बाधित न हो। साझा बयान इससे आगे भी जाता है और आम नागरिकों व सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर को टारगेट न करने की अपील करता है ईरान पर अमेरिका के हमलों के संदर्भ में ये महत्वपूर्ण है।

ब्रिक्स समिट के सेशन में पीएम मोदी क्लोजिंग रिमार्क्स देते हुए।© ANI

द्वि-राष्ट्र समाधान

गाजा में शांति कायम करने और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लागू करने की मांग की गई है। जबरन विस्थापन का विरोध करते हुए मानवीय मदद सुनिश्चित करने का आह्वान भी किया गया है। इसके अलावा इजरायल-फिलिस्तीन विवाद में द्वि-राष्ट्र समाधान के लिए अटूट प्रतिबद्धता दोहराई गई है। कहा गया है कि इजरायल-फिलिस्तीन विवाद में स्थायी शांति बातचीत से ही आ सकती है। फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों, वित्तीय संस्थानों में उचित प्रतिनिधित्व देने की जरूरत को रेखांकित किया गया है।

परमाणु सुरक्षा  

नई दिल्ली घोषणापत्र में शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा केंद्रों पर हमलों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। साफ शब्दों में नागरिक ठिकानों और परमाणु केंद्रों पर हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। खासतौर से उन न्यूक्लियर ठिकानों का जिक्र है, जो IAEA के पूर्ण सुरक्षा मापदंडों के अधीन हैं। इसके अलावा ब्रिक्स ने परमाणु खतरों और हथियारों की होड़ के प्रति आगाह करते हुए मिडिल ईस्ट में विनाशक हथियारों से मुक्त क्षेत्र स्थापित करने और परमाणु अप्रसार के प्रयासों को तेज करने की भी बात कही गई है।

विवादों का वार्ता से समाधान

ब्रिक्स के इस साझा बयान का एक व्यापक संदेश ये भी है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान जोर-जबरदस्ती नहीं बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से तलाशा जाना चाहिए। बढ़ते ध्रुवीकरण और भरोसे की कमी के बीच वार्ता, आपसी विचार-विमर्श और कूटनीतिक प्रयासों को आजमाया जाना चाहिए। इसमें स्थानीय संगठनों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन, पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पौधारोपण करते हुए© ANI

एकतरफा टैरिफ 

घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय नियम कानूनों को ताक पर रखकर, एकतरफा तरीके से आर्थिक और अन्य पाबंदियां लगाए जाने की भी निंदा की गई है। कहा गया है कि ये वैश्विक नियमों के विरुद्ध हैं, व्यापार की व्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं और सप्लाई चेन को बाधित करके अनिश्चितता पैदा करते हैं। ब्रिक्स ने आर्थिक दबाव से मुक्त ग्लोबल ऑर्डर की वकालत की है। ये पश्चिम खासकर अमेरिका को सीधा संदेश है, जिसके टैरिफ वॉर और पाबंदियों ने कई देशों के व्यापार पर बुरा असर डाला है। इसके अलावा विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं में सुधार पर जोर दिया गया है।

भारत के लिए ये क्यों इतना अहम?

1. कूटनीतिक रूप से

भारत ऐसा साझा घोषणापत्र जारी कराने में कामयाब रहा है, जिसमें आतंकवाद से लेकर पश्चिम एशिया और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं।

2. रणनीतिक लिहाज से

घोषणापत्र में भारत जहां एक तरफ पहलगाम हमले की कड़ी निंदा करवाने में सफल रहा है, वहीं संयुक्त राष्ट्र में भारत ही नहीं, ब्राजील की बड़ी भूमिका को रूस-चीन का समर्थन रणनीतिक रूप से अहम है।

3. ग्लोबल साउथ के लिए

साझा बयान में ग्लोबल साउथ के देशों के हितों को तरजीह देने, उनकी आवाज को मजबूती से उठाने और वैश्विक नीति-निर्णय में उनकी अधिक भागीदारी का जिक्र है। भारत इसके लिए लंबे समय से प्रयासरत रहा है।

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