भूटान के हिमालय में कैसे फटी झील? अब भारत तक कितना बड़ा खतरा?
भूटान की एक झील से निकले पानी ने भारत तक खतरे की घंटी क्यों बजा दी? आखिर क्या है इस बाढ़ की वजह?

सोचिए, हिमालय में समुद्र तल से करीब 14,700 फीट की ऊंचाई पर एक झील हो और उसका पानी अचानक पहाड़ों से नीचे की ओर दौड़ पड़े। रास्ते में जो आए, उसे बहाता हुआ यह पानी पड़ोसी देश तक पहुंच जाए तो? भूटान में कुछ ऐसा ही हुआ है। इतनी ऊंचाई पर स्थित एक ग्लेशियर झील से अचानक पानी निकलने के बाद न सिर्फ वहां सड़कें और दूसरी सुविधाएं तबाह हुई हैं, बल्कि भारत के पश्चिम बंगाल और असम तक बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। 

29 अक्टूबर की शाम भूटान के गासा जिले में स्थित शिंताफू (Sintaphu/Shintaphu) झील से अचानक पानी निकलने की खबर आई। इसके बाद निचले इलाकों में सायरन बजाए गए और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। भारत में भी संकोश नदी के आसपास के इलाकों को अलर्ट किया गया है। आखिर हिमालय की इस झील में ऐसा क्या हुआ? इसका पानी भारत तक कैसे पहुंचता है और यहां कितना बड़ा खतरा पैदा हो सकता है? समझते हैं।

भूटान के नेशनल सेंटर फॉर हाइड्रोलॉजी एंड मेटियोरोलॉजी (NCHM) की 2022–23 की वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित शिंताफू झील की तस्वीर।

भूटान में कहां फटी झील, क्या हुआ?

शिंताफू झील भूटान के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित गासा (Gasa) जिले के लाया (Laya) क्षेत्र में है। यह वाकिला (Wakila) पर्वत के नीचे लुंगो इलाके में करीब 4,480 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है। यानी समुद्र तल से लगभग 14,700 फीट ऊपर।

यह इलाका भूटान की राजधानी थिंपू से उत्तर की ओर पड़ता है और हिमालय के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र का हिस्सा है। झील से निकलने वाला पानी मो छू (Mo Chhu) नदी के जलग्रहण क्षेत्र में पहुंचता है।  

29 अक्टूबर की शाम झील से पानी का तेज बहाव शुरू हुआ। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, रात करीब 8:15 बजे तक बाढ़ का पानी तक्तसेमाखांग (Taktsemakhang) इलाके में पहुंच गया। इससे लाया की ओर जाने वाली सड़क का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। गासा छाचू (Gasa Tshachu) का मशहूर गर्म पानी का झरना (Hot Spring) परिसर भी बाढ़ की चपेट में आ गया। 30 अक्टूबर की सुबह तक मिली जानकारी के मुताबिक, वहां किसी की मौत या घायल होने की खबर नहीं थी। एहतियात के तौर पर प्रभावित इलाकों से लोगों को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था।

बाद की रिपोर्टों में पुनाखा-गासा हाईवे के एक हिस्से के पूरी तरह बह जाने और सड़क को अगले आदेश तक बंद करने की जानकारी भी सामने आई। दो बेली ब्रिज (Bailey Bridges) के बहने की आशंका जताई गई है। नुकसान का पूरा आकलन अभी जारी है।

भूटान के नेशनल सेंटर फॉर हाइड्रोलॉजी एंड मेटियोरोलॉजी (NCHM) की रिपोर्ट में शिंताफू की मुख्य और ऊपरी झील का पैनोरमिक व्यू।

यह झील पहले से ही खतरनाक क्यों थी?

असल में, शिंताफू कोई सामान्य पहाड़ी झील नहीं है। यह ग्लेशियर के आसपास बर्फ पिघलने से बनी झील है, जिसे भूटान की 17 संभावित खतरनाक ग्लेशियर झीलों (Potentially Dangerous Glacial Lakes) में शामिल किया गया था।

इसकी संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वैज्ञानिकों ने 2023 में भी इसका अध्ययन किया था। इसमें झील की गहराई, आसपास के इलाके, प्राकृतिक बांध (Moraine) और ग्लेशियर की स्थिति का सर्वे किया गया था।

एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, शिंताफू झील का सतही क्षेत्रफल करीब 2,38,314 वर्ग मीटर यानी लगभग 59 एकड़ है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से करीब 4,480 मीटर है। 2021 के अध्ययन में इसका अनुमानित जल भंडार 62 लाख घन मीटर बताया गया था। यह करीब 2,480 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल में भरे पानी के बराबर है। हालांकि, यह पुराना वैज्ञानिक आकलन है, मौजूदा घटना में कितना पानी निकला, इसका अलग अनुमान सामने आया है। कुछ ताजा मीडिया रिपोर्टों में करीब 74 लाख घन मीटर पानी निकलने की बात कही गई है। 

भूटान के पुनाखा में मो छू नदी की बाढ़ से सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई सिस्टम आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया।

झील फटने से भारत तक कैसे पहुंचता है पानी?

अब सवाल है कि भूटान के पहाड़ों में हुई इस घटना से भारत के मैदानी इलाकों में खतरा कैसे पैदा हो गया? इसे समझने के लिए नदियों का रास्ता समझना जरूरी है।

शिंताफू झील का पानी सबसे पहले मो छू (Mo Chhu) नदी के जलग्रहण क्षेत्र में पहुंचता है। यह नदी भूटान के गासा और पुनाखा इलाकों से होकर दक्षिण की ओर बहती है। पुनाखा में मो छू का मिलन फो छू (Pho Chhu) नदी से होता है। दोनों मिलकर पुनात्सांगछू (Punatsangchhu) नदी बनाती हैं।

आगे यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद संकोश (Sankosh) नदी के नाम से जानी जाती है। इसे कुछ इलाकों में गदाधर नदी भी कहा जाता है। यानी भूटान में निकला पानी नदियों के इसी नेटवर्क के जरिए भारत के उत्तरी बंगाल और असम तक पहुंच सकता है।

यही वजह है कि इस घटना का असर सिर्फ भूटान तक सीमित नहीं है। पहाड़ों से नीचे आते समय पानी अपने साथ मिट्टी, पत्थर, पेड़ों के तने और दूसरी भारी चीजें भी बहाकर ला सकता है। इससे नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने के साथ उसके किनारे बसे इलाकों, पुलों, सड़कों और खेतों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

शिंताफू झील से पानी के अचानक निकलने के बाद आई बाढ़ से हुई तबाही का अगली सुबह का व्यू।

भारत में कहां-कहां अलर्ट, कितनी तैयारी?

भूटान में झील से पानी निकलने की खबर मिलते ही भारत में भी प्रशासन सक्रिय हो गया। पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार और कूचबिहार जिलों में संकोश नदी के आसपास के इलाकों पर खास नजर रखी जा रही है। इसके अलावा जलपाईगुड़ी और उत्तर बंगाल के दूसरे संवेदनशील इलाकों में भी सतर्कता बढ़ाई गई है।

असम में धुबरी समेत संकोश नदी के आसपास के इलाकों को अलर्ट किया गया है। कुछ रिपोर्टों में कोकराझार, बक्सा और चिरांग जिलों को भी निगरानी में रखने की जानकारी है।

पश्चिम बंगाल के वन मंत्री मनोज कुमार ओरांव ने संकोश नदी के किनारे रहने वाले लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की। कुमारग्राम और आसपास के इलाकों में प्रशासन ने लोगों को सतर्क रहने को कहा। वहीं उत्तर बंगाल विकास मंत्री निशीथ प्रमाणिक ने भी कहा कि नदी किनारे रहने वाले लोगों को अलर्ट कर दिया गया है और जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेजने की तैयारी है।

अलीपुरद्वार के एसपी अमित कुमार शाह के मुताबिक, प्रशासन ने राहत और बचाव के इंतजाम किए हैं। उनके बयान के अनुसार, करीब 4,000 से 5,000 लोगों को स्कूलों में बनाए गए राहत केंद्रों में पहुंचाया गया, जबकि 6,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया गया। SDRF की टीम तैनात है और NDRF की टीम भी भेजी गई है। लोगों के लिए पीने के पानी, सूखे राशन और दूसरी जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। संकोश नदी प्रणाली के लिए रेड अलर्ट जारी होने की जानकारी भी दी गई।

भारत सरकार की ओर से भी भूटान से आने वाले पानी को लेकर संबंधित एजेंसियों को सतर्क किया गया। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के निगरानी केंद्रों को नदी के जलस्तर पर नजर रखने और किसी भी असामान्य बदलाव की तत्काल सूचना देने को कहा गया। इनमें बारोबिशा, संकोश LRP, गोलकगंज और बालाडोबा जैसे केंद्र शामिल हैं।

आखिर क्या होता है GLOF, कैसे फटती है ग्लेशियर झील?

इस पूरी घटना को समझने के लिए RT हिंदी ने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के ग्लेशियोलॉजी साइंटिस्ट डॉ. मनीष मेहता से बात की। डॉ. मेहता ने बताया कि GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (Glacial Lake Outburst Flood)। आसान भाषा में कहें तो ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील का पानी अचानक बाहर निकलकर बाढ़ का रूप ले लेता है।

हिमालय में ग्लेशियर पिघलने से निकलने वाला पानी पहाड़ों के बीच झीलों में जमा होता है। कई झीलों को बर्फ, पत्थर और मिट्टी से बनी प्राकृतिक दीवार (Moraine) रोककर रखती है। इस दीवार पर दबाव बढ़ने, दरार पड़ने या भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप जैसी घटनाओं से झील का पानी अचानक बाहर निकल सकता है। यह पानी तेज रफ्तार से संकरी पहाड़ी घाटियों में बहता है और अपने साथ पत्थर, मिट्टी व पेड़ बहाकर ले जाता है। इससे रास्ते में पुल, सड़कें और बस्तियां तबाह हो सकती हैं।

हिमालय में कहां-कहां आई ऐसी आफत?

भूटान की यह घटना अकेली नहीं है। साल 2026 में भी हिमालय के अलग-अलग हिस्सों में ग्लेशियर, बर्फ और पहाड़ी झीलों से जुड़ी आपदाएं सामने आई हैं।

इस साल 26 अगस्त को नेपाल के रसुवा (Rasuwa) जिले में चीन-नेपाल सीमा के पास ल्हेंदे खोला (Lhende Khola) नदी क्षेत्र में एक बड़ी बाढ़ आई थी। वहां बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा टूटकर नदी में गिरा, जिससे पानी का रास्ता रुक गया और एक अस्थायी झील बन गई। कुछ समय बाद यह अवरोध टूट गया और मलबे के साथ पानी का तेज बहाव नीचे की ओर बढ़ा। इससे भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी क्षेत्रों में भारी तबाही हुई।

हालांकि, इसे शिंताफू जैसी पारंपरिक ग्लेशियर झील के फटने की घटना कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। नेपाल में बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन से अस्थायी झील बनी थी, जो बाद में टूट गई। दोनों घटनाओं में पानी का अचानक और विनाशकारी बहाव समान है, लेकिन इनके बनने की प्रक्रिया अलग है।

2005 का तिब्बत का पारेछू फ्लड

जून 2005 में तिब्बत में पारेछू नदी पर भूस्खलन के कारण प्राकृतिक बांध बन गया था। इसके पीछे पानी जमा होकर झील बन गई। बाद में यह बांध टूटने से पानी हिमाचल प्रदेश के स्पीति क्षेत्र की ओर आया और सतलुज नदी में बाढ़ का खतरा पैदा हुआ। भारत में प्रशासन को अलर्ट करना पड़ा और कुछ इलाकों से लोगों को हटाया गया।

भारत में भी इसका खतरा लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। सिक्किम में 2023 में साउथ ल्होनक (South Lhonak) झील फटने से तीस्ता नदी में भीषण बाढ़ आई थी। इस घटना ने बांधों, सड़कों और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद राज्य में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और जोखिम कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।

सितंबर 2026 में केंद्र सरकार ने भी हिमालयी राज्यों के साथ GLOF और हिमस्खलन के खतरे से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की थी। वहीं सिक्किम में इस साल उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक सर्वे किया गया और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने पर काम हुआ।

क्या ऐसे खतरे को पहले से रोका जा सकता है?

GLOF को पूरी तरह रोकना आसान नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, समय रहते चेतावनी और सुरक्षित स्थानों पर लोगों को पहुंचाकर नुकसान कम किया जा सकता है।

भूटान में भी इस दिशा में काम हो रहा है। लुनाना क्षेत्र की थोरथोर्मी (Thorthormi) झील में पानी का स्तर नियंत्रित करने के लिए साइफन सिस्टम (Siphon System) जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके जरिए झील से पानी को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालने की कोशिश की जाती है।

भारत में भी सिक्किम के शाको छू (Shakho Chho) ग्लेशियर लेक पर सेंसर लगाए गए हैं। ये सेंसर पानी के स्तर से जुड़ा डेटा सैटेलाइट के जरिए निगरानी केंद्र तक पहुंचाते हैं, ताकि संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते अलर्ट दिया जा सके।

चमोली के वसुंधरा ताल पर CSIR-CBRI द्वारा लगाए गए GLOF मॉनिटरिंग और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम की तस्वीर।

इधर उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल (Vasundhara Tal) पर राज्य का पहला ग्लेशियर लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है। USDMA की इस पहल के तहत वाटर लेवल, मौसम, बर्फ की गहराई, जमीन के तापमान और कंपन पर सेंसर से नजर रखी जाएगी। दूरदराज के इलाके में डेटा सैटेलाइट के जरिए रियल टाइम में भेजा जाएगा, ताकि GLOF के खतरे का समय रहते पता लगाया जा सके।

2023 के NRSC आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में 344 ग्लेशियर झीलें चिह्नित हैं, जिनमें 13 हाई रिस्क श्रेणी में हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और CBRI के विशेषज्ञ भी इस परियोजना से जुड़े हैं। राज्य में छह ग्लेशियर झीलों का बाथिमेट्रिक सर्वे भी किया गया है, ताकि उनकी गहराई और जल भंडारण क्षमता का आकलन हो सके।

भूटान की शिंताफू झील की घटना एक बार फिर बता रही है कि हिमालय में होने वाली ऐसी आपदाएं किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहतीं। पहाड़ों में जमा पानी जब नीचे उतरता है तो उसका रास्ता कई देशों और आबादी वाले इलाकों से होकर गुजरता है। ऐसे में भारत और भूटान के बीच समय पर सूचना साझा करना, नदी के जलस्तर की निगरानी और स्थानीय लोगों को अलर्ट करना बेहद जरूरी है।

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