
भारत ने गरीबी दूर करने में एक लंबी छलांग लगाई है। 12 साल में बड़ा बदलाव देखने को मिला। जिस देश में 2011-12 में हर चार में से एक व्यक्ति अत्यधिक गरीब की श्रेणी में आता था, 2023-24 तक यह संख्या घटकर हर 38 में से एक रह गई। वर्ल्ड बैंक की India Poverty and Equity Brief रिपोर्ट अच्छी खबर दे रही है।
इसके मुताबिक, भारत में अत्यधिक गरीबी में रहने वाली आबादी का हिस्सा 27.1 फीसदी से घटकर 2.6 फीसदी रह गया है।
इस बदलाव का दायरा सिर्फ अत्यधिक गरीबी तक सीमित नहीं है। गरीबी के एक दूसरे पैमाने पर देखें, तो 2011-12 से 2023-24 के बीच करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए। यानी करोड़ों लोगों की आर्थिक स्थिति में इतना सुधार हुआ कि वे पहले के मुकाबले बेहतर तरीके से अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहे हैं।
बड़ी आबादी वाले भारत के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गरीबी में कमी का असर करोड़ों परिवारों की जिंदगी पर पड़ा है। ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में गरीबी कम हुई है। लोगों की उपभोग क्षमता में सुधार, रोजगार में बढ़ोतरी और सरकारी सहायता योजनाओं ने इस बदलाव में भूमिका निभाई है। हालांकि, गरीबी कम होने का मतलब यह नहीं है कि देश में यह समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है। अभी भी बड़ी आबादी गरीबी की ऊंची रेखा के नीचे है और ग्रामीण इलाकों में चुनौती ज्यादा बनी हुई है।
आखिर भारत ने गरीबी कम करने में कितनी प्रगति की है? 12 साल में कितने लोगों की आर्थिक स्थिति बदली? विश्व बैंक गरीबी को मापता कैसे है और अब किन चुनौतियों पर ध्यान देने की जरूरत है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं।
भारत में गरीबी कितनी कम हुई?
विश्व बैंक की रिपोर्ट में गरीबी को समझने के लिए दो प्रमुख पैमानों का इस्तेमाल किया गया है। पहला अत्यधिक गरीबी का और दूसरा निम्न-मध्यम आय (Lower-Middle-Income) वाले देशों के लिए तय गरीबी का पैमाना है।

इन आंकड़ों को आसान भाषा में समझें, तो 2011-12 में भारत में हर चार में से एक व्यक्ति रोजाना करीब 58 रुपये से कम खर्च कर पाता था और अत्यधिक गरीबी की श्रेणी में आता था। यहां 58 रुपये का मतलब 2021 की कीमतों के हिसाब से है। 2023-24 तक ऐसे लोगों की आबादी घटकर सिर्फ 2.6 फीसदी रह गई।
दूसरे पैमाने पर देखें तो 2011-12 में देश की 57.7 फीसदी आबादी रोजाना करीब 82 रुपये से कम खर्च कर पाती थी। यह रकम भी 2021 की कीमतों के आधार पर क्रय शक्ति समानता (PPP) से निकाली गई है, न कि आज की कीमतों के हिसाब से। 2023-24 में इस श्रेणी में आने वाली आबादी घटकर 16.1 फीसदी रह गई।
विश्व बैंक के मुताबिक, इस दौरान करीब 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर आए। यानी 12 साल में करोड़ों लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और वे पहले के मुकाबले अपनी जरूरतों पर ज्यादा खर्च करने की स्थिति में पहुंचे।
शहरों में भी घटी गरीबी
भारत में गरीबी कम होने का असर सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहा। ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में अत्यधिक गरीबी में गिरावट दर्ज की गई है। विश्व बैंक की अप्रैल 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2011-12 से 2022-23 के बीच अत्यधिक गरीबी की दर में यह बदलाव आया।
क्षेत्र | 2011-12 में अत्यधिक गरीबी | 2022-23 में अत्यधिक गरीबी | कुल गिरावट |
|---|---|---|---|
ग्रामीण भारत | 18.4% | 2.8% | 15.6 प्रतिशत |
शहरी भारत | 10.7% | 1.1% | 9.6 प्रतिशत |
आसान भाषा में समझें-
ग्रामीण भारत: 2011-12 में हर 100 में करीब 18 लोग अत्यधिक गरीब थे। 2022-23 में यह संख्या घटकर करीब 3 रह गई।
शहरी भारत: 2011-12 में हर 100 में करीब 11 लोग अत्यधिक गरीब थे। 2022-23 में यह संख्या घटकर करीब 1 रह गई।
गरीबी कम होने के पीछे क्या वजह रही?
विश्व बैंक ने भारत में गरीबी कम होने के पीछे कई कारणों का जिक्र किया है। इनमें लोगों की उपभोग क्षमता में सुधार, रोजगार में बढ़ोतरी और सरकारी सहायता योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है।
खर्च करने की क्षमता बढ़ी
गरीबी का आकलन सिर्फ कमाई के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात से भी किया जाता है कि परिवार अपनी जरूरतों पर कितना खर्च कर पा रहे हैं।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में घरेलू उपभोग में बढ़ोतरी गरीबी घटने का एक प्रमुख कारण रही। आसान भाषा में कहें तो परिवार पहले के मुकाबले भोजन और दूसरी जरूरी चीजों पर अधिक खर्च करने की स्थिति में पहुंचे।
रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी
रिपोर्ट में रोजगार में बढ़ोतरी को भी गरीबी कम होने की एक वजह बताया गया है। खासकर महिलाओं की कामकाजी भागीदारी में वृद्धि का इसमें योगदान रहा। जब परिवार के अधिक सदस्यों के पास काम और कमाई के अवसर होते हैं तो उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
सरकारी योजनाओं से मिली मदद
खाद्य सब्सिडी और दूसरी सामाजिक सहायता योजनाओं ने भी गरीबी कम करने में भूमिका निभाई। इसे एक उदाहरण से समझें। अगर किसी परिवार को सरकारी योजना के तहत मुफ्त या सब्सिडी वाला अनाज मिलता है तो उसे भोजन पर अपनी जेब से कम पैसा खर्च करना पड़ता है। इससे उसकी सीमित आय का कुछ हिस्सा दूसरी जरूरी जरूरतों के लिए बच सकता है।
इस तरह उपभोग में बढ़ोतरी, रोजगार के मौके और सरकारी सहायता ने मिलकर गरीबी कम करने में योगदान दिया।
4. विश्व बैंक गरीबी को मापता कैसे है?
विश्व बैंक गरीबी मापने के लिए तीन अलग-अलग पैमानों का इस्तेमाल करता है। इनका मकसद यह समझना है कि किसी देश में कितने लोग बहुत कम खपत कर पा रहे हैं और कितने लोग अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी पर्याप्त खर्च नहीं कर पा रहे हैं।
तीनों पैमानों को ऐसे समझिए:
पैमाना | रोजाना खर्च (भारतीय रुपये में) | आसान मतलब |
|---|---|---|
3 डॉलर | करीब 58 रुपये | इससे कम खपत करने वाले लोग अत्यधिक गरीब हैं। |
4.20 डॉलर | करीब 82 रुपये | इससे कम खपत करने वाले लोग निम्न-मध्यम आय वाले देशों के गरीबी पैमाने पर गरीब हैं। |
8.30 डॉलर | करीब 162 रुपये | इससे कम खपत करने वाले लोग उच्च-मध्यम आय वाले देशों के गरीबी पैमाने पर गरीब हैं। |
इनका अंतर समझिए।
मान लीजिए किसी व्यक्ति की रोजाना खपत 100 रुपये के बराबर है। वह 3 डॉलर और 4.20 डॉलर वाले पैमाने पर अत्यधिक गरीब या गरीब नहीं माना जाएगा, लेकिन 8.30 डॉलर वाले पैमाने पर गरीब माना जाएगा।
इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति अत्यधिक गरीबी से बाहर आ सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसकी आर्थिक स्थिति इतनी बेहतर हो गई है कि वह गरीबी के हर पैमाने से बाहर आ जाए।
ये रकम आज के बाजार भाव से डॉलर को रुपये में बदलकर नहीं निकाली गई हैं। ये 2021 की कीमतों के आधार पर क्रय शक्ति समानता (PPP) से तय की गई हैं। साथ ही, विश्व बैंक यहां कमाई नहीं, बल्कि व्यक्ति की खपत के आधार पर गरीबी मापता है।
डॉलर में गरीबी क्यों मापी जाती है?
विश्व बैंक गरीबी की रेखा तय करने के लिए डॉलर को सामान्य विनिमय दर से रुपये में बदलकर इस्तेमाल नहीं करता। वह यह भी देखता है कि अलग-अलग देशों में एक जैसी रकम से कितनी चीजें खरीदी जा सकती हैं। इसे क्रय शक्ति समानता (Purchasing Power Parity यानी PPP) कहते हैं। आसान भाषा में समझें तो भारत में 100 रुपये से जितनी चीजें खरीदी जा सकती हैं, जरूरी नहीं कि उतनी ही चीजें अमेरिका में उसके बराबर डॉलर से खरीदी जा सकें। इसलिए देशों के बीच गरीबी की तुलना करते समय वहां की कीमतों और खरीदने की क्षमता का अंतर भी ध्यान में रखा जाता है।
अब भी कहां बाकी है चुनौती?
भारत में गरीबी कम होने की तस्वीर उत्साहजनक तो है, लेकिन इसके बावजूद कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो बताते हैं कि अभी इस दिशा में काफी काम बाकी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की दर 19.3 फीसदी थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 8.6 फीसदी थी। यानी शहरों के मुकाबले गांवों में गरीबी की चुनौती अब भी ज्यादा है।
रिपोर्ट के अनुसार, 0 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों में गरीबी की दर 21.8 फीसदी थी। वहीं, बिना शिक्षा वाले लोगों में यह दर 21.3 फीसदी और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में 7.4 फीसदी थी।
ये आंकड़े बताते हैं कि गरीबी में गिरावट का लाभ सभी वर्गों तक एक समान नहीं पहुंचा है। बच्चों और कम शिक्षा वाले लोगों के बीच गरीबी की दर अब भी अपेक्षाकृत ज्यादा है।
भौगोलिक स्तर पर भी गरीबी एक जैसी नहीं है। विश्व बैंक के मुताबिक, उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले राज्यों में देश की करीब 57 फीसदी गरीब आबादी रहती है। इसका मतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी कम होने के बावजूद कुछ राज्यों और सामाजिक समूहों में आर्थिक चुनौतियां ज्यादा बनी हुई हैं।
आगे गरीबी कितनी घट सकती है?
विश्व बैंक का अनुमान है कि 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का हिस्सा 2026 में 14.2 फीसदी से घटकर 2028 तक 12.1 फीसदी हो सकता है। यह अनुमान बताता है कि आने वाले वर्षों में गरीबी और कम होगी।
आसान भाषा में समझें तो विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट भारत में गरीबी कम होने की बड़ी तस्वीर पेश करती है। 2011-12 से 2023-24 के बीच अत्यधिक गरीबी की दर 27.1 फीसदी से घटकर 2.6 फीसदी रह गई। वहीं, 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के आधार पर करीब 49.6 करोड़ लोग इस सीमा से ऊपर आए। यह बदलाव बताता है कि पिछले 12 वर्षों में करोड़ों परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबी कम होना, उपभोग क्षमता में बढ़ोतरी और सरकारी सहायता योजनाओं की भूमिका इस प्रगति को समझने के महत्वपूर्ण पहलू हैं।





