
जिस फोन को खरीदने के लिए लोग हजारों डॉलर खर्च करने को तैयार हैं, उस चमकदार तकनीक के पीछे एक ऐसी दुनिया है, जहां कुछ लोगों की जिंदगी बेहद मुश्किल हालात में गुजर रही है। अब आवाजें भी उठने लगी हैं। हां, ये कहानी अक्सर फोन के विज्ञापनों और लॉन्च इवेंट्स में दिखाई नहीं देती। इसकी शुरुआत दुनिया के कुछ ऐसे इलाकों से होती है, जहां जमीन के नीचे छिपे संसाधनों की कीमत तो पूरी दुनिया समझती है, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी की तस्वीर कुछ और है।
कपंनी है- Apple और फोन है- Iphone
अब इस कहानी को लेकर आवाजें इतनी तेज हो गई हैं कि लोग सड़कों पर उतरकर कह रहे हैं- ‘No to Apple Blood Tech’।
आखिर एक चमकदार फोन और खदानों में पसीना बहाते लोगों के संघर्ष के बीच क्या रिश्ता है? कैसे हजारों किलोमीटर दूर चल रहा संघर्ष आपकी जेब में रखे फोन से जुड़ जाता है? और क्यों इस बहस के केंद्र में एक अमेरिकी टेक कंपनी और अफ्रीका का एक देश है?

Apple और कांगो का क्या है कनेक्शन?
इस कहानी को समझने के लिए हमें अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) की खदानों तक जाना होगा।
आज के स्मार्टफोन सिर्फ स्क्रीन, कैमरा और प्रोसेसर से नहीं बनते। इनके अंदर कई तरह के खनिजों का इस्तेमाल होता है। इनमें कोबाल्ट (Cobalt), टैंटेलम (Tantalum), टिन (Tin), टंगस्टन (Tungsten) और सोना (Gold) प्रमुख हैं।
इनमें कोबाल्ट का इस्तेमाल लिथियम-आयन बैटरियों में किया जाता है। यह बैटरी की ऊर्जा क्षमता और स्थिरता से जुड़ा महत्वपूर्ण पदार्थ है। वहीं टैंटेलम का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और कैपेसिटर्स में, टिन का सर्किट बोर्ड की सोल्डरिंग में, टंगस्टन का कुछ इलेक्ट्रॉनिक और वाइब्रेशन से जुड़े कंपोनेंट्स में और सोने का कनेक्टर्स तथा सर्किट में किया जाता है।
यानी जिस फोन को आप हाथ में लेकर इस्तेमाल करते हैं, उसके भीतर ऐसे कई खनिज मौजूद हो सकते हैं जिनकी कहानी अफ्रीका की खदानों से जुड़ती है। अमेरिकी कंपनी Apple भी अपनी सप्लाई चेन में इन खनिजों का इस्तेमाल करती है। कंपनी की अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) में जमा 2024 की Conflict Minerals Report में iPhone को उन उत्पादों में शामिल किया गया है, जिनकी सप्लाई चेन में टिन, टैंटेलम, टंगस्टन और सोने से जुड़े खनिजों की जांच की जाती है।

आखिर कांगो में ही क्यों है इतनी दिलचस्पी?
कांगो प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में शामिल है। यहां कोबाल्ट, टैंटेलम, तांबा, सोना और कई अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार हैं।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) की 2026 की Mineral Commodity Summaries रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो दुनिया का सबसे बड़ा कोबाल्ट उत्पादक था। उस साल दुनिया के कुल कोबाल्ट उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 75 फीसदी थी। इसी तरह वैश्विक टैंटेलम उत्पादन में भी कांगो की हिस्सेदारी लगभग 51 फीसदी थी।
यानी दुनिया को स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और दूसरी आधुनिक तकनीकों के लिए जिन खनिजों की जरूरत है, उनमें से कई का बड़ा हिस्सा इसी देश से आता है।
लेकिन सवाल यह है कि जिस जमीन के नीचे इतनी संपदा है, वहां रहने वाले आम लोगों की जिंदगी में उसका फायदा कितना पहुंचा है?
खदानों में संघर्ष, बच्चों से मजदूरी और विस्थापन
कांगो के खनिजों की कहानी सिर्फ बड़े उद्योगों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे हजारों ऐसे मजदूरों की जिंदगी है, जो बेहद मुश्किल हालात में काम करते हैं।
खासकर आर्टिसनल माइनिंग (Artisanal Mining) यानी छोटे स्तर पर पारंपरिक तरीकों से होने वाले खनन में सुरक्षा के इंतजाम बेहद कमजोर हो सकते हैं। कई जगह मजदूर हाथों से जमीन खोदकर खनिज निकालते हैं। संकरी सुरंगों, अस्थिर जमीन, धूल और जहरीले पदार्थों के संपर्क में आने से उनकी जान और सेहत पर खतरा बना रहता है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और मानवाधिकार संगठनों ने कांगो में खनन से जुड़े बाल मजदूरी और जबरन काम कराने के मामलों पर चिंता जताई है।
अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labor) की रिपोर्ट के मुताबिक, कांगो में बच्चों से कोबाल्ट के साथ-साथ टिन, टैंटेलम और टंगस्टन जैसे खनिजों के खनन में खतरनाक काम कराए जाने के मामले सामने आए हैं।
Amnesty International ने अपनी 2023 की रिपोर्ट ‘Powering Change or Business as Usual?’ में बताया कि औद्योगिक स्तर पर कोबाल्ट और तांबे की खदानों के विस्तार के कारण कई समुदायों को उनके घरों और खेती की जमीन से जबरन हटाया गया। रिपोर्ट में मारपीट, यौन हिंसा और घरों में आग लगाने जैसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का भी जिक्र है।
यानी जिन खनिजों की मांग दुनिया की आधुनिक तकनीक बढ़ा रही है, उनके उत्पादन की कीमत कई बार स्थानीय समुदायों को अपनी जमीन, आजीविका और सुरक्षा खोकर चुकानी पड़ रही है।
खनिजों पर कब्जे की जंग और M23 का खेल
कांगो की समस्या सिर्फ खदानों में काम करने की खराब परिस्थितियों तक सीमित नहीं है। देश के पूर्वी हिस्से में लंबे समय से सशस्त्र संघर्ष भी जारी है।
विशेष रूप से नॉर्थ किवू (North Kivu) और आसपास के इलाकों में खनिज संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। यहां M23 जैसे सशस्त्र समूहों की गतिविधियों ने हालात को और जटिल बनाया है।
संयुक्त राष्ट्र के कांगो विशेषज्ञ समूह की 3 जुलाई 2025 की रिपोर्ट (S/2025/446) में रुबाया (Rubaya) के खनन क्षेत्र का विस्तार से जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, AFC/M23 ने इस इलाके में कोल्टन (Coltan), कैसिटेराइट और दूसरे खनिजों के कई खनन स्थलों पर नियंत्रण स्थापित किया और उनके व्यापार से राजस्व जुटाया।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इन खनिजों को रवांडा तक तस्करी के रास्तों से पहुंचाया गया। वहां दूसरे खनिजों के साथ मिलाकर उनके मूल स्रोत की पहचान मुश्किल बनाई जा सकती है।

यहां यह समझना जरूरी है कि कोल्टन से टैंटेलम निकाला जाता है। टैंटेलम इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है और मोबाइल फोन के कुछ कंपोनेंट्स में इसका इस्तेमाल होता है।
इस तरह खनिजों की सप्लाई चेन सिर्फ व्यापार का मामला नहीं रह जाती। जब खदानों पर हथियारबंद समूहों का नियंत्रण हो और खनिजों की तस्करी से उन्हें पैसा मिले, तो वैश्विक बाजार तक पहुंचने वाली सप्लाई चेन भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
अमेरिका और Apple की जवाबदेही पर सवाल
यहां कहानी में अमेरिका का एंगल भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
अमेरिका ने साल 2010 में डोड-फ्रैंक एक्ट (Dodd-Frank Act) के तहत सेक्शन 1502 लागू किया था। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि अमेरिकी शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियां अपने उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले कुछ खनिजों के स्रोत के बारे में जानकारी दें।
इस कानून के तहत चार खनिजों को Conflict Minerals की श्रेणी में रखा गया था। ये हैं टिन, टैंटेलम, टंगस्टन और सोना। कंपनियों को यह पता लगाने और खुलासा करने की जिम्मेदारी दी गई कि ये खनिज डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो या उसके पड़ोसी देशों से तो नहीं आ रहे और उनकी सप्लाई चेन में मानवाधिकार उल्लंघन या सशस्त्र समूहों को वित्तीय लाभ पहुंचने का जोखिम तो नहीं है।
लेकिन इस कानून में एक महत्वपूर्ण कमी भी है। कोबाल्ट को इन चार खनिजों की सूची में शामिल नहीं किया गया।
यह एक बड़ा सवाल है, क्योंकि कांगो दुनिया का सबसे बड़ा कोबाल्ट उत्पादक देश है और कोबाल्ट आधुनिक बैटरी उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यानी अमेरिका ने कुछ खनिजों की सप्लाई चेन को लेकर कंपनियों से खुलासे की व्यवस्था बनाई, लेकिन कोबाल्ट के लिए वैसी अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था इस कानून के तहत नहीं है।

Apple का क्या है जवाब?
Apple ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वह अपने सप्लायरों से श्रम, मानवाधिकार और पर्यावरण संबंधी कड़े मानकों का पालन कराता है। कंपनी की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी सप्लाई चेन के सभी पहचाने गए 3TG स्मेल्टर और रिफाइनर थर्ड-पार्टी ऑडिट में शामिल थे। जांच में सशस्त्र समूहों को आर्थिक मदद देने का कोई आधार नहीं मिला।
वहीं, दिसंबर 2024 में कांगो सरकार ने Apple की फ्रांस और बेल्जियम स्थित सहयोगी कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि कांगो से तस्करी किए गए खनिज रवांडा के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में वैध बताकर बेचे जा रहे हैं। Reuters के मुताबिक, Apple ने इन आरोपों को गलत बताया और संघर्ष बढ़ने के बाद अपने स्मेल्टर और रिफाइनर को कांगो और रवांडा से 3TG खनिजों की खरीद रोकने का निर्देश दिया था।
रिसाइकिल्ड कोबाल्ट वाला दावा क्या है?
इस पूरी बहस के बीच Apple ने अप्रैल 2026 में एक अहम घोषणा की। कंपनी के मुताबिक, अब उसकी डिजाइन की गई सभी बैटरियों में 100 फीसदी रिसाइकिल्ड कोबाल्ट इस्तेमाल किया जा रहा है। Apple ने यह भी बताया कि 2025 में उसके सभी उत्पादों में इस्तेमाल हुए कुल कोबाल्ट का 95 फीसदी रिसाइकिल्ड स्रोतों से आया था।
यह कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव है। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से कोबाल्ट निकालकर दोबारा इस्तेमाल करने से नए खनन पर निर्भरता कम की जा सकती है। लेकिन इससे कहानी का दूसरा हिस्सा खत्म नहीं हो जाता। कांगो में खनन से जुड़े मानवाधिकार उल्लंघन, विस्थापन और सशस्त्र समूहों की फंडिंग जैसे मुद्दे सिर्फ एक कंपनी के बैटरी निर्माण तक सीमित नहीं हैं। Apple की पूरी सप्लाई चेन में दूसरे खनिज भी इस्तेमाल होते हैं और उनकी उत्पत्ति का पता लगाना भी जरूरी है।
साथ ही, रिसाइकिल्ड सामग्री के इस्तेमाल का दावा कंपनी का अपना है। इसकी स्वतंत्र निगरानी, सप्लाई चेन की पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों को हुए नुकसान की भरपाई जैसे सवाल अपनी जगह बने हुए हैं।

आखिर किसकी कीमत पर आगे बढ़ रही है तकनीक?
एक तरफ दुनिया AI, इलेक्ट्रिक कारों और स्मार्टफोन के जरिए भविष्य की ओर बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ इन तकनीकों के लिए खनिज निकालने वाले कांगो जैसे देशों के लोगों के हिस्से में संघर्ष और मुश्किलें आ रही हैं।
सवाल है कि दुनिया की इस तकनीकी तरक्की का फायदा उन लोगों तक कितना पहुंच रहा है, जिनकी जमीन से इसके लिए जरूरी खनिज निकलते हैं? किसी फोन की कीमत सिर्फ उसके बॉक्स पर लिखे डॉलर से तय नहीं होती, उसके पीछे उन हाथों की मेहनत और संघर्ष भी छिपा होता है, जो शायद ही कभी उसके विज्ञापन में दिखाई देते हैं।





