Explained: 7 की तेजी का भूकंप, 'धरती की छत' आखिर इतनी जोर से क्यों हिली?
करोड़ों साल से जारी प्लेटों की टक्कर ने हिमालय को जन्म दिया, लेकिन इसी भूगर्भीय हलचल ने तिब्बत को भूकंप के लिहाज से संवेदनशील भी बनाया है। 22 अक्टूबर 2026 को 7 की तीव्रता के आए भूकंप में 16 लोगों की जान चली गई। आखिर शांत दिखने वाले दुनिया के इस ऊंचे पठार के नीचे क्या है, जो इसे भूकंप के लिहाज से अलग बनाता है?
Explained: 7 की तेजी का भूकंप, 'धरती की छत' आखिर इतनी जोर से क्यों हिली?

'The roof of the world' यानी ‘धरती की छत’ कहे जाने वाले तिब्बत को यह नाम समुद्र तल से इसकी असाधारण ऊंचाई के कारण मिला है। करीब 4,500 मीटर की औसत ऊंचाई पर फैला यह विशाल पठार दुनिया के सबसे ऊंचे पठारी क्षेत्रों में शामिल है। यहां आसमान से रिश्ता जितना ऊंचा है, धरती के भीतर की हलचल उतनी ही गहरी है। दूर-दूर तक फैले मैदान, बर्फ से ढकी चोटियां और पहाड़ों के बीच बसे गांव इसे दूर से शांत और स्थिर दिखाते हैं। लेकिन इस खूबसूरत नजारे के नीचे धरती की दो विशाल प्लेटों के बीच एक ऐसी टक्कर जारी है, जो करोड़ों साल से इस इलाके का नक्शा बदल रही है।

22 अक्टूबर 2026 को तिब्बत क्षेत्र में आए भूकंप ने इसी भूगर्भीय कहानी की ओर ध्यान खींचा। रात करीब 10.30 बजे नागचू (Nagqu) क्षेत्र में 7 तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें कम से कम 16 लोगों की मौत हुई और 54 लोग घायल हुए। सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हुए। बचाव दलों को दूरदराज के इलाकों, खराब मौसम और क्षतिग्रस्त सड़कों के बीच राहत पहुंचाने की चुनौती का सामना करना पड़ा।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक भूकंप का केंद्र नागचू से करीब 191 किलोमीटर पूर्व-उत्तर-पूर्व में था और इसकी गहराई 18 किलोमीटर बताई गई।

लेकिन इस घटना के पीछे एक बड़ा सवाल है। आखिर तिब्बत की जमीन इतनी जोर से क्यों हिली? क्या इसकी वजह सिर्फ हिमालय के करीब होना है या इस विशाल पठार के नीचे कुछ ऐसा चल रहा है, जो इसे बार-बार भूकंप की चपेट में लाता है?

RT हिंदी ने तिब्बत क्षेत्र में काम कर चुके वैज्ञानिक और प्रोफेसर वी.पी. उनियाल से बात की।

भूकंप के केंद्र नागचू की भौगोलिक बनावट के बारे में बताते हुए प्रोफेसर उनियाल कहते हैं कि नागचू तिब्बत के विशाल पठारी क्षेत्र में स्थित है। यह इलाका समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर फैले घास के मैदानों और खुले भूभाग के लिए जाना जाता है। तिब्बती पठार की औसत ऊंचाई करीब 4,500 मीटर है। इसी असाधारण ऊंचाई के कारण तिब्बत को ‘दुनिया की छत’ कहा जाता है।

हिमालय की कहानी, जो तिब्बत के नीचे से शुरू होती है

तिब्बत में भूकंप को समझने के लिए पहले यह जानना होगा कि हिमालय बना कैसे। धरती की सबसे ऊपरी कठोर परत कई बड़े हिस्सों में बंटी हुई है, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेटें कहते हैं। भारत का अधिकांश हिस्सा और उसके आसपास हिंद महासागर का बड़ा क्षेत्र जिस प्लेट पर स्थित है, उसे भारतीय प्लेट कहा जाता है। यह प्लेट धीरे-धीरे उत्तर की ओर बढ़ रही है। करीब पांच करोड़ साल पहले इसका सामना यूरेशियाई प्लेट से हुआ, जिस पर तिब्बत और एशिया का बड़ा हिस्सा स्थित है। दोनों प्लेटों के बीच टक्कर से धरती की चट्टानों पर दबाव पड़ा, जिससे हिमालय ऊपर उठा और तिब्बती पठार की बनावट भी प्रभावित हुई। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। इसी लगातार पड़ने वाले दबाव से क्षेत्र की चट्टानों में तनाव जमा हो सकता है और जब वे अचानक खिसकती हैं, तो भूकंप आता है। 

इसे ऐसे समझिए कि अगर किसी कालीन को एक तरफ से लगातार धकेला जाए, तो वह जगह-जगह सिकुड़ने और ऊपर उठने लगेगा। धरती की चट्टानें कालीन की तरह नरम नहीं होतीं, लेकिन लंबे समय तक पड़ने वाले दबाव के कारण उनमें भी बदलाव आते हैं। कहीं चट्टानें मुड़ती हैं, कहीं जमीन ऊपर उठती है और कहीं बड़े-बड़े हिस्से एक-दूसरे के सापेक्ष खिसक जाते हैं।

तिब्बत का पठारी इलाका। (फोटो: NASA)

भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर ने हिमालय को ऊपर उठाने में अहम भूमिका निभाई। इसी व्यापक भूगर्भीय प्रक्रिया से तिब्बती पठार का मौजूदा स्वरूप भी जुड़ा है। यही वजह है कि तिब्बत को केवल ऊंचे पहाड़ों और विशाल मैदानों का इलाका समझना काफी नहीं है। इसकी जमीन के नीचे भी लगातार भूगर्भीय गतिविधियां चल रही हैं।

जमीन के नीचे आखिर भूकंप कैसे पैदा होता है?

कल्पना कीजिए कि दो विशाल चट्टानी हिस्से एक-दूसरे के संपर्क में हैं। उनके बीच घर्षण के कारण वे आसानी से खिसक नहीं पा रहे। इसके बावजूद आसपास की भूगर्भीय हलचल उन पर दबाव डालती रहती है। धीरे-धीरे तनाव जमा होता जाता है। फिर एक ऐसा क्षण आता है, जब चट्टानें अपनी पुरानी स्थिति में टिके नहीं रह पातीं और अचानक खिसक जाती हैं।

अचानक पैदा हुई इसी रगड़ से ऊर्जा निकलती है, जो भूकंपीय तरंगों के रूप में फैलती है। जमीन पर हमें जो झटके महसूस होते हैं, वे इसी ऊर्जा का असर हैं।

धरती की ऊपरी परत में मौजूद ऐसी दरारों या कमजोर क्षेत्रों को भ्रंश (Fault) कहा जाता है। तिब्बत में कई बड़े फॉल्ट मौजूद हैं। भारतीय प्लेट और यूरेशियाई प्लेट के बीच टक्कर से पैदा होने वाला दबाव इस पूरे क्षेत्र में फैलता है। कहीं धरती की परत दबकर सिकुड़ती है, कहीं उसमें खिंचाव पैदा होता है और कहीं चट्टानों के बड़े हिस्से एक-दूसरे के समानांतर खिसकते हैं। 

यही कारण है कि तिब्बत में भूकंप की कहानी केवल दो प्लेटों की सीमा तक सीमित नहीं है। इस टक्कर का असर पठार के भीतर तक दिखाई देता है। भूवैज्ञानिकों के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां धरती की परतों के भीतर चल रही कई प्रक्रियाओं को एक साथ समझा जा सकता है।

तिब्बत का नागचू गुरुवार रात आए 7 तीव्रता के भूकंप का केंद्र था। तस्वीरः riseq.seismo.gov.in से साभार।RT

18 किलोमीटर की गहराई क्यों है अहम?

22 अक्टूबर के भूकंप से जुड़ी रिपोर्ट में इसकी गहराई 18 किलोमीटर बताई गई है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भूकंप की गहराई उसके सतही प्रभाव को प्रभावित कर सकती है।

सामान्य तौर पर, समान तीव्रता वाले दो भूकंपों में सतह के करीब आया भूकंप किसी इलाके में ज्यादा तेज झटके पैदा कर सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर कम गहराई वाला भूकंप अनिवार्य रूप से ज्यादा तबाही मचाएगा। नुकसान का स्तर भूकंप के केंद्र से दूरी, जमीन की प्रकृति, इमारतों की मजबूती और आबादी के वितरण पर भी निर्भर करता है।

यहां एक और फर्क समझना जरूरी है। भूकंप का magnitude बताता है कि सोर्स पर कितनी ऊर्जा निकली, जबकि intensity यानी तीव्रता किसी खास जगह पर महसूस हुए झटकों और वहां हुए प्रभाव को दर्शाती है। 

भूकंप से ढहे मकानों के बीच राहत और बचाव अभियान जारी है। (फोटो: शिन्हुआ न्यूज एजेंसी)

तिब्बत की धरती का पुराना रिकॉर्ड क्या बताता है?

22 अक्टूबर की घटना को समझने के लिए इतिहास में पीछे देखना जरूरी है। तिब्बत और आसपास का हिमालयी क्षेत्र लंबे समय से बड़े भूकंपों का सामना करता रहा है। अलग-अलग समय पर आए इन भूकंपों ने दिखाया है कि इस पूरे इलाके में भूगर्भीय तनाव किस तरह विनाशकारी घटनाओं का रूप ले सकता है।

1950: असम-तिब्बत भूकंप

15 अगस्त 1950 को भारत-तिब्बत सीमावर्ती क्षेत्र में एक बड़ा भूकंप आया, जिसकी तीव्रता 8.6 दर्ज की गई। इसे 20वीं सदी के सबसे शक्तिशाली दर्ज भूकंपों में गिना जाता है। इसने बड़े भूस्खलन और जमीन में व्यापक बदलाव पैदा किए। भारत के असम और आसपास के इलाकों में भी इसका गंभीर असर हुआ।

2008: दमशुंग में भूकंप

अक्टूबर 2008 में तिब्बत के दमशुंग क्षेत्र में लगभग 6.6 तीव्रता का भूकंप आया। इस घटना में लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। 

2017: मेनलिंग क्षेत्र में झटके

नवंबर 2017 में तिब्बत के मेनलिंग क्षेत्र में लगभग 6.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। पूर्वी तिब्बत का यह इलाका जटिल भूगर्भीय संरचना वाले क्षेत्र का हिस्सा है।

2025: तिंगरी में तबाही

7 जनवरी 2025 को तिब्बत के तिंगरी क्षेत्र में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना में कम से कम 95 लोगों की मौत हुई। 

भूकंप के बाद असली चुनौती सिर्फ मलबा हटाना नहीं

तिब्बत जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्र में भूकंप आने के बाद मुश्किलें जमीन के हिलने के साथ खत्म नहीं होतीं। यहां कई बस्तियां दूर-दराज के इलाकों में स्थित हैं। पहाड़ी रास्ते संकरे हैं और खराब मौसम में सड़क संपर्क बनाए रखना कठिन हो सकता है। भूकंप से चट्टानें गिरें या भूस्खलन हो, तो राहत सामग्री पहुंचाने में देरी हो सकती है।

अगर इसी दौरान तापमान गिर रहा हो या बर्फबारी हो रही हो, तो बेघर हुए लोगों के लिए अस्थायी आश्रय, गर्म कपड़े, भोजन और चिकित्सा सहायता की जरूरत और बढ़ जाती है। क्षतिग्रस्त संचार व्यवस्था बचाव दलों के लिए एक अलग चुनौती बन सकती है।

भूकंप प्रभावित गांवों में लोगों की मदद के लिए पहुंचे बचाव दल। (फोटो: शिन्हुआ न्यूज एजेंसी)

22 अक्टूबर के भूकंप से जुड़ी रिपोर्ट में भी आफ्टरशॉक, चट्टानें गिरने और सड़क पर आवाजाही सीमित किए जाने का जिक्र है। आफ्टरशॉक वे झटके हैं, जो बड़े भूकंप के बाद उसी क्षेत्र में आते हैं। बड़े भूकंप के बाद जमीन की परतें बदली हुई स्थिति के अनुसार समायोजित होती रहती हैं, जिससे आगे भी झटके महसूस हो सकते हैं। ये झटके पहले से कमजोर हो चुकी इमारतों को और नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इसलिए किसी भूकंप से होने वाले नुकसान को केवल उसकी तीव्रता के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इमारतों की गुणवत्ता, स्थानीय भूगर्भीय स्थिति, सड़क और संचार नेटवर्क तथा आपदा के लिए पहले से की गई तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

बदलती धरती के साथ सुरक्षित रहने की चुनौती 

’धरती की छत’ पर आए झटके हमें याद दिलाते हैं कि हिमालय और तिब्बती पठार ऊपर से भले ही अडिग दिखाई दें, लेकिन उनके नीचे की धरती लगातार बदल रही है। करीब पांच करोड़ साल पहले शुरू हुई भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर ने इस क्षेत्र को उसका मौजूदा स्वरूप दिया। यही भूगर्भीय प्रक्रिया आज भी इसकी सक्रियता को प्रभावित करती है।

धरती की इस हलचल को रोका नहीं जा सकता। लेकिन इसे समझना, वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर जोखिम पहचानना और समय रहते तैयारी करना संभव है। तिब्बत के भूकंप की कहानी आखिरकार सिर्फ इस बात की कहानी नहीं है कि जमीन क्यों हिली- यह इस बात की भी कहानी है कि इंसान एक बदलती हुई धरती के साथ खुद को कितना सुरक्षित रख सकता है।

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