
'अप्रणितः तु मत्स्यन्यायं उद्भवयति'
संस्कृत की इस एक पंक्ति से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज की जियोपॉलिटिक्स को सरल भाषा में न सिर्फ समझाया बल्कि आगाह भी किया है।
मौका था NDTV वर्ल्ड समिट का और पीएम ने The World Between Orders की बात शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि हमें दो बातों को समझना होगा।
पहली बात- दुनिया का ऑर्डर बदल क्यों रहा है? पुराना ग्लोबल ऑर्डर आज की चुनौतियों का समाधान क्यों नहीं दे पा रहा? और
दूसरी बात- इस बदलती दुनिया में भारत की भूमिका क्या है?
पीएम की बात पर आगे बढ़ने से पहले संस्कृत की उस लाइन पर वापस लौटते हैं।
पहले जान लीजिए कि इसे चाणक्य के अर्थशास्त्र से लिया गया है। पीएम ने यह बताते हुए कहा कि जब व्यवस्था कमजोर पड़ती है, तो मत्स्य न्याय पैदा होता है। मस्त्य न्याय यानी बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जो मत्स्य-न्याय की स्थिति पैदा होने से रोके।यही भारत का विजन है, और यही भारत कर रहा है।
इशारों में उन्होंने वो सब कुछ कह दिया, जो वह कहना चाह रहे थे।
अब मत्स्य न्याय चर्चा में है तो लोग समझना चाहते हैं कि इसका व्यापक अर्थ क्या है और आज से करीब 2400 साल पहले चाणक्य ने इस डॉक्ट्रिन को क्यों समझाया था? इस तरह से देखिए तो यह भारतीय पॉलिटिकल थॉट या कहिए प्राचीन भारतीय दर्शन है।
इसमें समझाया गया है कि राज्य या दुनिया के लिए कानून या ऑर्डर कितना जरूरी होता है। इसमें कहा गया है कि ऐसा नहीं हुआ और 'जंगल का कानून' हावी होता है तो बलवान कमजोरों को खत्म कर सकते हैं। जंगल में ऐसा ही होता है। अंग्रेजी में लोग इसे 'rule of the fish' ट्रांसलेट कर सकते हैं।
अब इसके गूढ़ मर्म को सरलता से समझिए
वैध राज्य बनने से पहले अराजकता या नियमहीनता की स्थिति की तुलना इससे की गई है। जैसे ज्यादा शक्तिशाली इकाई के न होने पर बड़ी मछली, छोटी मछली को निगल सकती है, इसकी तरह अराजकता वाले राज्य (देश) में ताकतवर लोग कमजोरों को कुचल देंगे।
चाणक्य ने नियमविहीन समंदर में मछली का उदाहरण देते हुए समझाया था कि कैसे शासक विहीन राज्य में स्थिति भयावह हो जाएगी। कमजोरों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा। वे दूसरों की दया पर निर्भर रहेंगे।
पीएम ने इसी बात को पूरी धरती के संदर्भ में इस्तेमाल किया। आगे उन्होंने चाणक्य के शासक को संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों में देखने की बात कही जिससे दुनिया में सभी निष्पक्ष तरीके से रह सकें।
क्योंकि चाणक्य ने कहा था कि अगर शासक (आज की जियोपॉलिटिक्स में वैश्विक संगठन) ईमानदार, न्यापूर्ण, उचित और जनहितैषी नहीं रहेंगे तो जनता में (दुनिया में) मस्त्य न्याय लागू हो जाएगा। यानी न्याय के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। कमजोरों को धन नहीं मिलेगा। समानता की भावना खत्म हो जाएगा।
विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय सरकार या प्राधिकरण या कहिए वैश्विक संगठन का कॉन्सेप्ट भी यही सोचकर लाया गया था जिससे लड़ाई न हो।
अब उस पंक्ति को पूरा करते हैं।
'अप्रणितः तु मत्स्यन्यायं उद्भवयति।
बलियान् अबलं हि ग्रसते दण्डधाराभवे।'
यानी जब दंड के कानून का अभाव होता है, तो ऐसी अव्यवस्था जन्म लेती है जैसा मछली शासन में होता है- यानी मजिस्ट्रेट (दंड के अभाव) के न होने पर बलवान कमजोरों को निगल जाएंगे मतलब कुचल देंगे। लेकिन उनकी सुरक्षा मिलने पर कमजोर लोग बलवानों का प्रतिरोध करेंगे।
अब चाणक्य के इसी दर्शन को ध्यान में रखकर पीएम की बात को समझते हैं।

पीएम मोदी ने दुनिया के बदलते वर्ल्ड ऑर्डर पर कहा कि यह स्वाभाविक है। दूसरे विश्व युद्ध ने दुनिया को एक बड़ा सबक दिया था। दुनिया ने समझा कि केवल पावर और इंट्रेस्ट के आधार पर विश्व व्यवस्था नहीं चल सकती। संवाद जरूरी है, सहयोग जरूरी है और विवादों का समाधान भी जरूरी है। इसी भावना ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की नींव रखी। UN ने दशकों तक वैश्विक सहयोग और शांति को बढ़ावा देने के लिए अपनी एक भूमिका निभाई है। लेकिन समय के साथ दुनिया बदलती गई। नई आकांक्षाएं उभरीं। नई अर्थव्यवस्थाएं और नए पावर्स का उदय हुआ।
उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियां भी पहले से कहीं अधिक जटिल होती गईं। तकनीक ने समाज, अर्थव्यवस्था और शक्ति के स्वरूप को बदल दिया। और जो देश उस समय ग्लोबल ऑर्डर बनाने वाली टेबल पर नहीं थे, वो अपनी भूमिका के साथ आगे आ गए। लेकिन सवाल ये कि क्या ग्लोबल ऑर्डर उसी गति से बदला? जवाब है - नहीं।
पीएम ने ताजा संकट का भी इशारा किया
हां, मोदी ने कहा कि दशकों तक कारोबार ने देशों को जोड़ा, तकनीक ने दूरियां मिटाईं, समुद्री रास्तों ने अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ा, कल्चर और मोबिलिटी अलग-अलग समाजों को करीब लाए, लेकिन आज यही कड़ियां नए तनावों का सामना कर रही हैं। ट्रेड को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। तकनीक, कंप्टीशन और संघर्ष का नया क्षेत्र बन रही है। समुद्री रूट, जियोपॉलिटिकल टेंशन के केंद्र बन रहे हैं। इसलिए, आज की चुनौती केवल एक नए ग्लोबल ऑर्डर के उभरने की नहीं है। चुनौती ये है कि बदलती दुनिया में ऐसा ऑर्डर कैसे बने, जिसमें नई वास्तविकताओं को जगह मिले, वैश्विक संस्थान ज्यादा प्रभावी हों और देशों के बीच सहयोग की भावना मजबूत हो। और यहीं से भारत की भूमिका का सवाल सामने आता है।
आखिर में ग्लोबल साउथ की बात
उन्होंने कहा- आज सवाल ये भी है कि जब दुनिया का पुराना क्रम बदल रहा है तो हम मिलकर कैसी नई विश्व व्यवस्था बनाना चाहते हैं? मल्टीलैटरल इंस्टीट्यूशन्स में सुधार जरूरी है। ग्लोबल साउथ की आवाज को उचित स्थान देना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग केवल अच्छे समय के लिए न हो, संकट के समय भी वो प्रभावी हो, इसके लिए सभी स्टेकहोल्डर्स में प्रभावी सहमति होना जरूरी है। उनका इशारा संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों की तरफ था।







