बापू रूस क्यों भेजते थे चिट्ठी? कभी ना मिले गुरु-शिष्य का दिलचस्प किस्सा
उनके शब्दों ने बापू के दिल में अहिंसा के लिए भरोसा पैदा किया। दोनों कभी मिले नहीं लेकिन शब्दों से एक ऐसा रिश्ता बना जिसने महात्मा गांधी के मन पर गहरी छाप छोड़ी। 1908-09 के समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था, बापू दूर साउथ अफ्रीका में थे और लेटर रूस लिखते थे।
बापू रूस क्यों भेजते थे चिट्ठी? कभी ना मिले गुरु-शिष्य का दिलचस्प किस्सा
बापू और टॉल्स्टॉय, जो कभी मिले नहीं।

क्या आप जानते हैं अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जब साउथ अफ्रीका में थे, तब मन में उमड़ते विचारों को ऊर्जा कहां से मिल रही थी? जवाब है- रूस के अपने गुरु से। बापू उनसे कभी मिले नहीं लेकिन दूर बैठकर शब्दों की गर्माहट महसूस करते रहे।

रूस के उस शख्स का नाम था लियो टॉल्स्टॉय। वह दुनिया के महान लेखकों में से एक माने जाते हैं, पर सवाल है कि बापू उन्हें लेटर क्यों लिखा करते थे?

इस सवाल के जवाब में छिपी है गांधी और टॉल्स्टॉय की मित्रता की कहानी, जिसे लोग आज भी याद कर रहे हैं। बापू उनसे अपनी बात कहते और सलाह लेते थे। बापू खुद रूस के इस लेखक को अपने शुरुआती शिक्षकों में से एक और नैतिक मार्गदर्शक कहते थे।

प्रेम, अहिंसा और टॉल्स्टॉय 

टॉल्स्टॉय (लेव तोलस्तोय) की किताब ‘द किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू’ से काफी प्रभावित हुए थे। टॉल्स्टॉय मानते थे कि सच्ची ताकत हिंसा में नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य में है। अन्याय का जवाब हिंसा से देना जरूरी नहीं है। बापू चिट्ठी लिखकर अपने गुरु से सलाह कैसे लेते थे? एक सवाल से समझिए, जो उन्होंने साउथ अफ्रीका के बारे में पूछा था।

1 अक्तूबर 1909 को लिखे लेटर में बापू ने अपनी कॉलोनी का जिक्र किया था, जहां वे उस समय रह रहे थे।

भेदभाव वाले कानून पर बापू ने मांगी राय

महात्मा गांधी ने लिखा, 'कॉलोनी में लगभग 13,000 भारतीय रहते हैं। ये कई साल से कानूनी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। रंग और कुछ हद तक एशियाई लोगों के प्रति बहुत ज्यादा भेदभाव है। मुख्य कारण व्यापार को लेकर ईर्ष्या है। तीन साल पहले एक ऐसा कानून बना, जिसे मैंने और कुछ दूसरे लोगों ने अपमानजनक और उन लोगों को हीन महसूस कराने वाला माना, जिन पर यह लागू होता था। मुझे लगा कि इस तरह के कानून को मानना ​​सच्चे धर्म की भावना के खिलाफ है। मैं और मेरे कुछ दोस्त अहिंसा के सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखते थे और अब भी रखते हैं। मुझे आपके लेखों को पढ़ने का सौभाग्य मिला, जिनका मेरे मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।'

थोड़ा रुककर सुनिए रूसी सिंगर का गाया बापू का भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए- 

वापस बापू और रूसी लेखक की दोस्ती पर लौटते हैं। 

लेटर में बापू आगे लिखते हैं- भारतीयों ने ठान लिया कि हमें इस कानून को नहीं मानना ​​है, बल्कि जेल जाने या कानून तोड़ने पर मिलने वाली किसी भी सजा को भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि आधे भारतीयों ने इस अपमानजनक कानून को मानने के बजाय ट्रांसवाल छोड़ दिया। जो बचे उसमें से लगभग 2,500 लोगों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर जेल जाना स्वीकार किया। जेल की सजा चार दिन से छह महीने तक थी। ज्यादातर मामलों में कठोर श्रम की सजा दी गई। कई लोग आर्थिक रूप से बर्बाद हो गए।

टॉलस्टॉय के बारे में जानिए।

उसी समय जलने लगी थी सत्याग्रह की लौ

बापू ने बताया कि इस समय ट्रांसवाल की जेलों में 100 से ज्यादा सत्याग्रही (शांतिपूर्ण प्रतिरोध करने वाले) बंद हैं। इनमें से कुछ बहुत गरीब हैं जो रोज कमाकर गुजारा करते थे। नतीजा यह हुआ कि उनकी पत्नियों और बच्चों का भरण-पोषण चंदे से करना पड़ा, जो ज्यादातर सत्याग्रहियों से ही इकट्ठा किया गया था। इससे भारतीयों पर भारी बोझ पड़ा, लेकिन मेरी राय में वे इस चुनौती का डटकर सामना करने में सफल रहे।

हममें से कुछ लोगों ने यह साफ तौर पर देखा है कि जहां जबरदस्ती या ताकत का इस्तेमाल नाकाम हो जाता है, वहां 'पैसिव रेजिस्टेंस' (शांतिपूर्ण प्रतिरोध यानी अहिंसक आंदोलन) सफल हो सकता है।

9 सितंबर 2024 को टॉलस्टॉय की जयंती पर एक प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसमें बापू के साथ उनके संबंधों को भी प्रमुखता से दर्शाया गया था।

लंदन से लिखे इस लेटर में बापू ने यह भी बताया था कि मैं शाही अधिकारियों से मिलने और अपनी बात रखने आया हूं। अहिंसक आंदोलन के हमारे समर्थकों का मानना ​​है कि सरकार के सामने गिड़गिड़ाना नहीं चाहिए। आगे उन्होंने अहिंसक प्रतिरोध के नैतिक मूल्यों और प्रभाव पर निबंध लिखने के लिए प्रतियोगिता आयोजित करने की बात लिखी। इससे आंदोलन को लोकप्रियता मिलेगी और लोग सोचेंगे।

बापू ने आगे टॉल्स्टॉय से राय मांगते हुए लिखा- एक दोस्त ने इस प्रस्तावित प्रतियोगिता के नैतिक पहलू पर सवाल उठाया है। उनका मानना ​​है कि ऐसा निमंत्रण 'पैसिव रेजिस्टेंस' की सच्ची भावना के खिलाफ होगा और यह लोगों की राय खरीदने जैसा होगा। क्या मैं नैतिकता के इस विषय पर आपकी राय जान सकता हूं? और अगर आपको लगता है कि निबंध या लेख मंगवाने में कोई बुराई नहीं है, तो क्या आप मुझे उन लोगों के नाम भी बता सकते हैं जिनसे मुझे इस विषय पर लिखने के लिए खास तौर पर संपर्क करना चाहिए?

बापू ने एक किताब के बारे में क्या पूछा?

एक और बात है जिसके लिए मैं आपका थोड़ा समय लेना चाहूंगा। भारत में मौजूदा अशांति के बारे में एक हिंदू व्यक्ति को लिखे गए आपके पत्र की एक प्रति (कॉपी) मुझे एक दोस्त से मिली है। देखने में तो यह आपकी ही राय लगती है। मेरे दोस्त का इरादा है कि वह अपने खर्च पर इसकी 20,000 प्रतियां छपवाकर बंटवाए और इसका अनुवाद भी करवाए। हालांकि, हमें मूल पत्र नहीं मिल पाया है, और जब तक हमें इसकी प्रति की सटीकता और इस बात का पक्का यकीन न हो जाए कि यह पत्र वास्तव में आपका ही है, तब तक इसे छपवाना हमें सही नहीं लगता। मैं इसके साथ उस कॉपी की एक कॉपी भेज रहा हूं। अगर आप मुझे बता सकें कि क्या यह आपका ही पत्र है, क्या यह सही कॉपी है और क्या आप इसे इसी तरह से प्रकाशित करने के लिए सहमत हैं, तो मैं आपका आभारी रहूंगा।

20 नवंबर 1910 को इस महान रूसी लेखक का निधन हो गया था।

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