
इजरायल के चुनाव में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए छोटी मानी जाने वाली अरब पार्टियों का रोल बड़ा हो गया है। इधर, बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने इन पार्टियों पर ‘चुनाव चोरी’ का आरोप लगाया है। लिकुड का दावा है कि अरब पार्टियों ने वोटरों को प्रभावित करने के लिए पैसे बांटे, धमकियां दीं और मतदान में गड़बड़ी की। पार्टी ने जांच एजेंसियों से कार्रवाई की भी मांग की है।
दूसरी ओर, अरब पार्टियों के मजबूत प्रदर्शन ने सरकार गठन का समीकरण जटिल कर दिया है। आखिर फिलिस्तीनियों के अधिकारों की वकालत करने वाली इन पार्टियों से नेतन्याहू का टकराव क्यों है और उनकी बढ़ती ताकत इजरायल की राजनीति को कैसे प्रभावित कर सकती है? आइए समझते हैं।
लिकुड ने क्या आरोप लगाए?

नेतन्याहू की पार्टी ने आरोप लगाया है कि अरब पार्टियों ने कई मतदान केंद्रों पर गंभीर गड़बड़ियां कीं। पार्टी के मुताबिक, इनमें नकदी और रा'अम पार्टी की पर्चियां बांटना, मतदान केंद्र के कर्मचारियों को धमकाना, एक से ज्यादा बार वोट डालना, फर्जी पहचान का इस्तेमाल करना, मतदाताओं की संख्या और मतपेटियों में मौजूद लिफाफों के आंकड़ों में अंतर जैसी शिकायतें शामिल हैं।
लिकुड का कहना है कि वह इन आरोपों से जुड़े सैकड़ों बयान और सबूत पुलिस, इजरायल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट और केंद्रीय चुनाव समिति को सौंप रही है। पार्टी ने मामले की तत्काल जांच और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उसने इन कथित गड़बड़ियों को इजरायली लोकतंत्र और नागरिकों के मतदान के अधिकार पर हमला बताया है।
अरब पार्टियों से नेतन्याहू का टकराव क्यों है?
असल में, नेतन्याहू और अरब पार्टियों के बीच विरोध केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है। दोनों के राजनीतिक विचारों में भी बड़ा अंतर है।
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी दक्षिणपंथी यहूदी राष्ट्रवाद की राजनीति करती है।
वहीं, इजरायल की कई अरब पार्टियां फिलिस्तीनियों के अधिकारों की वकालत करती हैं और गाजा को लेकर नेतन्याहू सरकार की नीतियों की आलोचना करती हैं।
इजरायल की आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत है। ये नागरिक देश की राजनीति में अपनी भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं। हालांकि, सभी अरब पार्टियों की विचारधारा एक जैसी नहीं है। कुछ पार्टियां इजरायल की संसदीय व्यवस्था में भागीदारी के जरिए अरब नागरिकों के अधिकार और सुविधाएं हासिल करने पर जोर देती हैं, जबकि दूसरी पार्टियां फिलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान और अधिकारों को प्राथमिकता देती हैं।
अंकारा बेस्ड राजनीतिक विश्लेषक और तुर्किए के पूर्व डिप्लोमेट अयदिन सेजर (Aydein Sezer) अपने विश्लेषण में इसी अंतर की ओर ध्यान दिलाते हैं। एक लेख में उन्होंने लिखा कि इजरायल की अरब पार्टियों को एकसमान विचारधारा वाला गुट मानना सही नहीं है। धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी विचारों वाली पार्टियों से लेकर इस्लामिक पृष्ठभूमि वाली रा'अम पार्टी तक, उनके राजनीतिक तरीके और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।

अरब पार्टियां कैसे बन गईं किंगमेकर?
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। चुनाव में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने के बाद अरब पार्टियों की भूमिका अहम हो गई है। शुरुआती रुझानों में इन पार्टियों को करीब 19 सीटों पर बढ़त मिलने की बात सामने आई है। ऐसे में उनका समर्थन सरकार गठन का समीकरण बदल सकता है।
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हालांकि, मजबूत प्रदर्शन के बावजूद अरब पार्टियों के लिए सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाना आसान नहीं है। तेल अवीव बेस्ड राजनीतिक टिप्पणीकार अत्तिला सोमफल्वी (Attila Somfalvi) अपने विश्लेषण में लिखते हैं कि अरब पार्टियों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है, लेकिन इजरायल के मौजूदा राजनीतिक माहौल में उनके साथ सरकार बनाना आसान नहीं है। इसकी एक वजह अरब पार्टियों के साथ गठबंधन को लेकर मौजूद राजनीतिक और सामाजिक विरोध है।
अरब पार्टियों के बीच भी मतभेद हैं। इसलिए यह तय नहीं है कि वे किसी एक गठबंधन को समर्थन देंगी। फिर भी, उनकी सीटें उन्हें सरकार गठन की बातचीत में अहम स्थान दिला सकती हैं।
समर्थन घटा, लेकिन नेतन्याहू का आधार मजबूत

अत्तिला सोमफल्वी का मानना है कि चुनाव में नेतन्याहू का समर्थन घटने के बावजूद उनका मुख्य वोट बैंक मजबूत बना हुआ है। लिकुड अब भी इजरायल की सबसे बड़ी पार्टी है। नेतन्याहू के विरोधियों को बदलाव के समर्थन में वोट मिले, लेकिन वे उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए जरूरी सीटें नहीं जुटा पाए। दूसरी ओर, लिकुड भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी।
नेतन्याहू के सामने अब दूसरे दलों का समर्थन जुटाने की चुनौती है। उनके विरोधियों को भी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन हासिल करना होगा। चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के साथ सरकार नहीं बनाने की बात कही थी। ऐसे में राजनीतिक गतिरोध खत्म करने के लिए राष्ट्रीय एकता की सरकार का विकल्प चर्चा में आ सकता है, लेकिन दोनों पक्षों की हिचकिचाहट इसके रास्ते में बाधा है।
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क्या बदलेगी इजरायल की पश्चिम एशिया पॉलिसी?
चुनाव के बाद सरकार गठन का रास्ता मुश्किल होने के बावजूद इजरायल की पश्चिम एशिया नीति में तत्काल बदलाव की गारंटी नहीं है। सोमफल्वी अपने विश्लेषण में ईरान के साथ संभावित नए टकराव और वेस्ट बैंक में तनाव बढ़ने की आशंका का भी जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक, इजरायल में बदलती डेमोग्राफी, अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय की भूमिका और व्यापक आबादी का दक्षिणपंथ की ओर झुकाव भविष्य की राजनीति को प्रभावित करेंगे।
इसलिए चुनाव का सवाल केवल यह नहीं है कि नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रहेंगे या नहीं। असली चुनौती यह है कि बहुमत के बिना राजनीतिक गुट सरकार कैसे बनाएंगे और सत्ता के समीकरणों में बदलाव का देश की नीतियों पर कितना असर पड़ेगा। फिलहाल, लिकुड के आरोपों की जांच और विभिन्न राजनीतिक गुटों के बीच बातचीत पर नजर रहेगी।





