इजरायल में अगर नेतन्याहू को गादी ने हरा दिया तो क्या बदलेगा?
इजरायल में PM नेतन्याहू और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के बीच मुकाबले का असर देश की विदेश नीति पर पड़ सकता है। JNU के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं कि आइजेनकोट के सत्ता में आने पर ईरान, गाजा और फिलिस्तीन को लेकर इजरायल का सख्त रुख बरकरार रह सकता है, हालांकि सैन्य कार्रवाई की स्ट्रैटजी और डिप्लोमैसी के तरीके में बदलाव संभव है।

इजरायल में आम चुनाव के लिए वोटिंग हो रही है। आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर तक आ सकते हैं। चुनाव में इस बार सबसे सीधा मुकाबला इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के बीच माना जा रहा है। अब सवाल यह है कि अगर गादी चुनाव जीतते हैं तो दुनिया की जियोपॉलिटिक्स पर क्या असर होगा? आइए समझते हैं। 

पहली बात: नेतन्याहू फिर से चुनाव जीतें या गादी सत्ता में आएं, इसका असर देश की विदेश नीति पर पड़ सकता है।

हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि गादी के आने से ईरान, गाजा और फिलिस्तीन को लेकर इजरायल का रुख पूरी तरह बदलने की उम्मीद नहीं है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ स्टडीज के प्रोफेसर राजन कुमार का मानना है कि गादी आइजेनकोट की जीत के बाद भी फिलिस्तीन और ईरान को लेकर इजरायल का रुख सख्त रह सकता है।

यह चुनाव हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद इजरायल में हो रहा पहला आम चुनाव है। इस हमले के बाद गाजा में संघर्ष हुआ और इजरायल का ईरान समेत क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ टकराव भी बढ़ा।

चुनाव में नेतन्याहू की लीडरशिप, सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक और सरकार की नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर, नेतन्याहू अपनी सुरक्षा नीति और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन को अपनी ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं।

गादी आए तो विदेश नीति पर क्या असर होगा?

प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक, आइजेनकोट के सत्ता में आने से इजरायल की विदेश नीति में ज्यादा बदलाव नहीं होगा।

RT हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'इसकी वजह यह है कि उनका बैकग्राउंड भी सेना का रहा है। वह जनरल रह चुके हैं और ईरान और फिलिस्तीन को लेकर उनके विचार भी काफी सख्त हैं। इसलिए यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने से फिलिस्तीन या ईरान को लेकर इजरायल के रुख में कोई बड़ी नरमी आएगी।'

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राजन कुमार कहते हैं कि आइजेनकोट फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने के टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन नहीं करते। इस व्यवस्था की लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बड़े हिस्से की ओर से वकालत की जाती रही है। ऐसे में उनकी जीत के बाद भी स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनने का रास्ता आसान होता नहीं दिखता।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू और आइजेनकोट दोनों ही स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनाने के विरोध में हैं। दोनों का कहना है कि अगर हमास हथियार नहीं छोड़ता, तो गाजा में फिर से सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों और वहां रहने वाले फिलिस्तीनियों के प्रति हिंसा जैसे मुद्दों पर दोनों के रुख में अंतर है।

ईरान पर रुख सख्त रहेगा, लेकिन स्ट्रैटजी बदलेगी?

ईरान को लेकर आइजेनकोट और नेतन्याहू के बीच अंतर उनकी स्ट्रैटजी में दिखाई दे सकता है। 

राजन कुमार ने कहा, 'ईरान के मामले में आइजेनकोट की स्ट्रैटजी नेतन्याहू से कुछ अलग हो सकती है। वह कह चुके हैं कि राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल ही एकमात्र रास्ता नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि हमले करके ईरान में शासन परिवर्तन की कोशिश नहीं होना चाहिए।'

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हालांकि, ईरान के परमाणु प्रोग्राम को लेकर आइजेनकोट का रुख नेतन्याहू की तरह ही सख्त है।

प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं, 'वह ईरान को परमाणु संवर्धन से रोकना चाहते हैं। इसे रोकने के लिए उनकी रणनीति अलग हो सकती है कि सैन्य कार्रवाई कहां और किस तरह की जाए, लेकिन उनका कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना ही होगा। वह ईरान को सीमित रखने की भी कोशिश करना चाहते हैं।'

गाजा के मामले में भी आइजेनकोट और नेतन्याहू के बीच अंतर को समझना जरूरी है। प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक, आइजेनकोट गाजा में मिलिट्री ऑपरेशन पूरी तरह बंद करने की बात नहीं करते, लेकिन वह नेतन्याहू की मौजूदा रणनीति की आलोचना करते रहे हैं।

Rajan Kumar
आइजेनकोट गाजा में ऑपरेशन बंद करने की बात नहीं करते, लेकिन उनकी स्ट्रैटजी अलग हो सकती है। वह नेतन्याहू की गाजा नीति की आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि सैन्य कार्रवाई किस तरह चलाई जा रही है, इसमें बदलाव होना चाहिए।
राजन कुमार
राजन कुमार
JNU में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर

अमेरिका और ट्रंप के साथ कैसे रहेंगे रिश्ते?

इजरायल की राजनीति पर अमेरिका का असर भी इस चुनाव का अहम पहलू है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू का खुलकर समर्थन किया है। ऐसे में अगर आइजेनकोट सत्ता में आते हैं, तो उन्हें भी अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखने होंगे।

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ट्रंप ने खुले तौर पर नेतन्याहू का समर्थन किया है। बहुत से लोग इसे घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। ऐसे में अगर आइजेनकोट सत्ता में आते हैं, तो उन्हें भी ट्रंप के साथ अच्छे संबंध बनाने पड़ेंगे, क्योंकि यह सच्चाई है कि इजरायल अमेरिका के समर्थन के बिना नहीं रह सकता।
राजन कुमार
राजन कुमार
JNU में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर

वह कहते हैं कि 'अगर नेतन्याहू फिर से सत्ता में आते हैं, तो वह कोशिश करेंगे कि ईरान पर हमला जल्द से जल्द हो। उन्हें लगता है कि अगर अमेरिका कभी ईरान पर हमला कर सकता है, तो वह ट्रंप के कार्यकाल में ही कर सकता है। इसके बाद इजरायल को शायद ऐसा मौका न मिले। इसलिए नेतन्याहू जल्द से जल्द हमले के लिए उकसाने की कोशिश करेंगे और इसका फायदा उठाएंगे।'

इजरायल में सरकार बनाना इतना मुश्किल क्यों?

इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं। देश की संसद (नेसेट) में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। किसी एक पार्टी को अपने दम पर इतनी सीटें मिलना बेहद मुश्किल है, इसलिए पार्टियों को चुनाव के बाद गठबंधन बनाना पड़ता है।

प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक, इसी व्यवस्था के कारण चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के लिए भी सरकार बनाना आसान नहीं होता।

उन्होंने कहा, 'इसमें आप किसी उम्मीदवार को वोट नहीं देते, बल्कि पार्टी को वोट देते हैं। पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी हिसाब से उसे संसद में सीटें मिलती हैं। इसके लिए एक न्यूनतम वोट प्रतिशत यानी थ्रेशोल्ड भी होता है। किसी पार्टी को कम से कम तय प्रतिशत वोट मिलने पर ही उसके सदस्य संसद में भेजे जा सकते हैं।'

पूरी दुनिया पर क्या असर होगा?

इजरायल में अगली सरकार चाहे नेतन्याहू की बने या आइजेनकोट की, ईरान, गाजा और फिलिस्तीन को लेकर तत्काल बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है।

दोनों नेताओं के सुरक्षा संबंधी लक्ष्य कई मामलों में एक जैसे हैं। अंतर इस बात में हो सकता है कि वे मिलिट्री ऑपरेशन, डिप्लोमैसी, जवाबदेही और अमेरिका के साथ तालमेल को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।

भारत समेत दुनिया के दूसरे देशों के लिए भी यह चुनाव इसलिए अहम है, क्योंकि इजरायल की नीतियों का असर मिडिल ईस्ट की स्थिरता, ईरान के साथ टकराव और अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति पर पड़ सकता है।

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