EXCLUSIVE: चांद पर न्यूक्लियर प्लांट लगाने की तैयारी, रूस के टॉप स्पेस साइंटिस्ट ने बताया मेगा प्लान
चांद पर कदम रखने के बाद अब इंसान वहां लंबे समय तक रहने और उसके संसाधनों का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने की योजना अंतरिक्ष में इंसानी मौजूदगी को नई दिशा दे सकती है।
EXCLUSIVE: चांद पर न्यूक्लियर प्लांट लगाने की तैयारी, रूस के टॉप स्पेस साइंटिस्ट ने बताया मेगा प्लान
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो- AI)

पृथ्वी से जिस चांद को आप निहारते हैं, वहां पहुंचना कभी किसी सपने से कम नहीं था। लेकिन अब इंसान की नजर सिर्फ चांद तक पहुंचने या वहां झंडा लहराने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक अब इससे आगे की तैयारी कर रहे हैं। वे चांद पर मौजूद चीजों को समझने के साथ-साथ वहां के संसाधनों का इस्तेमाल करने के तरीके भी तलाश रहे हैं। चांद पर इंसानी बस्तियां बसाने से लेकर वहां मौजूद कीमती खनिजों को धरती पर लाने तक की संभावनाओं पर विचार हो रहा है। इसके लिए चांद पर ऐसा ढांचा तैयार करना होगा, जो लंबे समय तक काम कर सके।

चांद पर न्यूक्लियर प्लांट लगाने की योजना

इस पूरी योजना में सबसे अहम जरूरत होगी ऊर्जा की। चांद पर बिजली बनाने और दूसरे कामों के लिए लगातार ऊर्जा चाहिए होगी। लेकिन वहां लंबे समय तक रात रहने के कारण सिर्फ सोलर पैनल्स पर निर्भर रहना आसान नहीं होगा। ऐसे में वैज्ञानिक चांद पर न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने की संभावना पर विचार कर रहे हैं।

रूसी विज्ञान अकादमी (Russian Academy of Sciences) के स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमुख रिसर्चर और सोवियत रॉकेट इंजीनियर सर्गेई पावलोविच कोरोलेव (Sergei Pavlovich Korolev) के स्टूडेंट नाथन आइजमोंट (Nathan Eismont) ने RT के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में इस योजना से जुड़े कई अहम पहलुओं पर बात की।

नाथन आइज़मोंट (फोटो- स्क्रीनशॉट)

उन्होंने बताया कि चांद पर Nuclear Reactor की जरूरत क्यों पड़ सकती है, उसे वहां पहुंचाने में क्या चुनौतियां और खतरे हैं और इस दिशा में पहले से मौजूद अंतरिक्ष तकनीक किस तरह मददगार हो सकती है। साथ ही, उन्होंने चांद के संसाधनों के इस्तेमाल, उनसे जुड़ी आर्थिक संभावनाओं और इस मिशन में अलग-अलग देशों की दिलचस्पी पर भी अपनी राय रखी।

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चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर की जरूरत क्यों?

आइजमोंट के मुताबिक, चांद पर जाने का मकसद अब सिर्फ उसकी सतह का अध्ययन करना नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों की दिलचस्पी वहां मौजूद संसाधनों को समझने और उनका इस्तेमाल करने में भी बढ़ रही है। इसके लिए ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा, जो मशीनों को चलाने, संसाधनों को निकालने और जरूरी गतिविधियों को लंबे समय तक जारी रखने में मदद करे। इस पूरी व्यवस्था में बिजली की अहम भूमिका होगी।

अब तक स्पेस के ज्यादातर मिशन सोलर पैनल यानी सूरज की रोशनी से बनने वाली सौर ऊर्जा पर निर्भर रहे हैं। लेकिन जब बात चांद पर भारी मशीनरी और परमानेंट इंफ्रास्ट्रक्चर चलाने की आती है, तो सोलर पैनल काफी नहीं हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है चांद का अपना माहौल और दिन-रात का अजीब सिस्टम। आइजमोंट इसे ऐसे समझाते हैं:

नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
”अगर हम चांद से संसाधन निकालने की बात करें, तो यह साफ है कि लूनर मंथ (चंद्र माह) के दौरान पुराने तरीके काम नहीं करेंगे। चांद पर करीब 14-15 दिन लगातार तेज धूप रहती है और उसके बाद पूरे 14-15 दिन तक एकदम घनी और बर्फीली रात होती है। ऐसे में सोलर पैनल का नॉर्मल तरीका बिल्कुल फिट नहीं बैठता। इसलिए हमें चांद पर 24 घंटे लगातार बिजली बनाने का कोई मजबूत रास्ता निकालना ही होगा। और जो इकलौता एनर्जी सोर्स समझ आता है, वह सिर्फ एक न्यूक्लियर रिएक्टर या एटॉमिक पावर प्लांट ही है।”
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 

चांद पर 15 दिन लंबी चलने वाली रात में तापमान माइनस 130 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है। ऐसे में इतने कड़ाके की ठंड में बैटरियों के भरोसे भारी मशीनें, ड्रिलिंग सिस्टम और बेस स्टेशन को चालू रखना नामुमकिन है।

सोवियत अंतरिक्ष यान लूना-1 का प्रक्षेपण, 1–2 जनवरी 1959। यह पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलने वाला पहला अंतरिक्ष यान था। (फोटो: सोवफोटो/यूनिवर्सल इमेज ग्रुप वाया गेटी इमेजेज)

रिएक्टर कितना पावरफुल होना चाहिए?

अगर चांद पर न्यूक्लियर प्लांट लगाना है तो बड़ा सवाल है कि रिएक्टर कितना पावरफुल होना चाहिए? आइजमोंट के मुताबिक, चांद पर 200 किलोवाट या उससे ज्यादा क्षमता वाला न्यूक्लियर रिएक्टर लगाना मौजूदा तकनीक से संभव है। हालांकि, इसके लिए रिएक्टर को चांद की सतह पर सुरक्षित उतारने के हिसाब से तकनीक में जरूरी बदलाव करने होंगे। वह कहते हैं:

नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
”अगर रिएक्टर की क्षमता 200 किलोवाट या इससे ज्यादा रखी जाती है, तो मौजूदा न्यूक्लियर तकनीक के आधार पर इसे बनाना संभव है। यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, लेकिन रिएक्टर और उससे जुड़ी तकनीक को चांद पर सुरक्षित तरीके से उतारने की जरूरतों के मुताबिक तैयार करना होगा।”
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 

इसके साथ ही वह कहते हैं कि अगर चांद पर ज्यादा क्षमता वाला न्यूक्लियर रिएक्टर भेजना है, तो इसके लिए नए रॉकेट की जरूरत पड़ सकती है।

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आइजमोंट के मुताबिक, रिएक्टर को चांद तक पहुंचाने के दो तरीके हो सकते हैं:

1. इसे पूरी तरह तैयार करके भेजा जाए या

2. इसके अलग-अलग हिस्सों को ले जाकर वहां जोड़ा जाए।

फिलहाल यह तय करना मुश्किल है कि दोनों में से कौन-सा तरीका ज्यादा सुरक्षित और कारगर होगा। हालांकि, उनके मुताबिक, रिएक्टर को पूरी तरह तैयार करके चांद पर पहुंचाना ज्यादा सुरक्षित विकल्प हो सकता है।

सोवियत मून प्रोब-लूना 9, 1966। (फोटो: सोवफोटो/यूनिवर्सल इमेजेज ग्रुप वाया गेटी इमेजेज)

कौन-सा रॉकेट ले जाएगा?

इस रिएक्टर को धरती से चांद तक पहुंचाने के लिए रूस अपने सबसे भरोसेमंद और हेवी-लिफ्ट रॉकेट Angara-5 का इस्तेमाल कर सकता है। आइजमोंट ने इसका जिक्र किया है। उनके मुताबिक, यह रॉकेट करीब 23 टन वजन का पेलोड धरती की कक्षा तक पहुंचा सकता है।

आइजमोंट के मुताबिक, इस मिशन के लिए रूस के बैकोनूर और सुदूर पूर्व में स्थित लॉन्च सेंटर (वोस्तोचनी), दोनों विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। इनमें से किसे चुना जाएगा, यह वहां मौजूद सुविधाओं और कर्मचारियों की तैयारी जैसे पहलुओं पर निर्भर करेगा।

उन्होंने कहा कि अभी इस कार्यक्रम की आगे की रूपरेखा का आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है। लेकिन रूस की मौजूदा तकनीकी क्षमता, आर्थिक संसाधनों और संबंधित संस्थानों की तैयारी को देखते हुए, उन्हें कोई बड़ी तकनीकी या आर्थिक बाधा नजर नहीं आती।

लूनोखोद 1, सोवियत मून रोवर के पहिए और चेसिस यूनिट, जिसका लूना 17 मिशन के लिए टेस्ट किया जा रहा था, USSR, 1970। (फोटो: सोवफोटो/यूनिवर्सल इमेज ग्रुप वाया गेटी इमेजेज)

सेफ्टी और रिस्क: सबसे बड़ा खतरा क्या है?

चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की योजना में सबसे अहम सवाल उसकी सुरक्षा का है। रिएक्टर को पहले धरती से अंतरिक्ष में भेजना होगा, इसके बाद उसे चांद की सतह पर उतारना होगा। हर चरण में अलग तरह की चुनौतियां हैं। इसलिए ऐसे मिशन में सिर्फ रिएक्टर को अंतरिक्ष में पहुंचाना काफी नहीं होगा, उसे सुरक्षित तरीके से लॉन्च करना और तय जगह तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी होगा।

अगर रॉकेट धरती के वायुमंडल से बाहर निकलते समय किसी हादसे का शिकार हो जाए, तो क्या होगा? आइजमोंट ने इस डर को खुलकर सामने रखा है।

नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
”सबसे पहला चैलेंज यही है कि इसके लिए बहुत ज्यादा सावधानी चाहिए। न्यूक्लियर सोर्स के साथ सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब आप सैटेलाइट को अर्थ ऑर्बिट में भेज रहे होते हैं। अगर उस समय कुछ गड़बड़ हो जाए और रिएक्टर ऑर्बिट में पहुंचने की जगह वापस जमीन पर गिर जाए तो यह बहुत भयानक होगा।”
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 

हालांकि, उन्होंने भरोसा दिलाया कि रूस के पास पुराना अनुभव है। वह बताते हैं कि सोवियत संघ के समय ऐसे 32 उपकरण लॉन्च किए गए थे, जिनमें न्यूक्लियर रिएक्टर लगे थे। उनका दावा है कि इस मामले में रूस का अनुभव दूसरे देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है।

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चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कैसे होगी?

रिएक्टर को सुरक्षित स्पेस में पहुंचाने के बाद अगला बड़ा काम होगा उसे चांद की जमीन पर सही-सलामत उतारना। आइजमोंट के मुताबिक, इसका स्टैंडर्ड तरीका यही है कि पहले स्पेसक्राफ्ट को चांद के ऑर्बिट में पहुंचाया जाए और वहां से स्पीड कंट्रोल करते हुए सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाए। हालांकि, वह कहते हैं कि इसके लिए अलग से तैयारी और तकनीकी काम करना पड़ेगा।

एक सवाल यह भी है कि रिएक्टर को एक ही इकाई के रूप में भेजा जाए या उसके अलग-अलग हिस्से चांद पर पहुंचाकर वहां जोड़े जाएं? आइजमोंट का मानना है कि पूरे प्लांट को एक रेडी-मेड प्रोडक्ट की तरह एक ही बार में लैंड कराना ज्यादा सेफ और आसान रहेगा।

उन्होंने बताया कि चांद पर उपकरण उतारने का अनुभव पहले से है। रूस समेत कई देशों ने चांद पर लैंडर और रोवर भेजे हैं। कुछ मिशनों में चांद की मिट्टी के नमूने इकट्ठा करके धरती पर भी लाए गए हैं। आइजमोंट का कहना है कि इन पुराने मिशनों से मिली जानकारी नए काम में मदद कर सकती है।

लूना 17 मिशन, 17 नवंबर, 1970 को सोवियत रिमोट-कंट्रोल्ड लूनर रोवर, लूनोखोद 1 द्वारा बनाई गई चांद की सतह की पैनोरमिक इमेज। (फोटो: सोवफोटो/यूनिवर्सल इमेजेज ग्रुप वाया गेटी इमेजेज)

चांद पर इतनी दौड़ क्यों, असल मकसद क्या है?

चांद पर साइंस रिसर्च तो अपनी जगह है, लेकिन इस पूरे प्रोजेक्ट का असल मकसद बिजनेस और दुर्लभ खनिजों की जरूरत है। आइजमोंट इस पर दो टूक कहते हैं कि चांद के मिशनों का मकसद अब केवल रिसर्च करना नहीं रह गया है, बल्कि उसके रिसोर्सेज का इस्तेमाल करना है। हमें वहां ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना है जिससे जरूरी मटेरियल धरती पर लाया जा सके। यह सिर्फ साइंस नहीं, बल्कि बहुत बड़ा इकोनॉमिक मामला है।

नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
”चांद पर रेयर अर्थ मेटल्स का बहुत बड़ा भंडार है। धरती पर बहुत जल्द इन चीजों की भारी किल्लत होने वाली है। एक वक्त ऐसा भी आ सकता है जब धरती पर इन्हें ढूंढकर निकालने से ज्यादा सस्ता इन्हें सीधे चांद से लाना पड़ेगा।”
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 
नाथन आइज़मोंट, रिसर्चर, स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट 

क्या चांद पर पर्यटन भी होगा?

इस मिशन के आगे बढ़ने से स्पेस टूरिज्म को भी नया बढ़ावा मिलेगा। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) की सैर के मुकाबले चांद का चक्कर लगाना बेशक बहुत ज्यादा महंगा होगा। लेकिन आइज़मोंट का मानना है कि दुनिया में ऐसे कई अमीर लोग हैं जो चांद की सैर के लिए मुंहमांगी रकम देने को तैयार हैं। उनके हिसाब से यह अच्छी बात है, क्योंकि ऐसे लोगों के टिकट के पैसे से ही इस बड़े मिशन के खर्च की भरपाई हो सकेगी।

इकोलॉजिकल चिंताएं और दूसरे देशों की दिलचस्पी

दूसरी तरफ, चांद को लेकर इकोलॉजिकल चिंताएं भी हैं। आइजमोंट ने बताया कि कुछ लोग इसे संरक्षित क्षेत्र (Sanctuary) बनाए रखने की वकालत करते हैं। हालांकि, उनका कहना है कि फिलहाल इस तरह के विचार को व्यापक समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है। चांद के पर्यावरण को लेकर ऐसी फिक्र जरूरत से ज्यादा बढ़-चढ़कर जताई जा रही है।

आइजमोंट कहते हैं कि कई देश चांद से जुड़े मिशनों में हिस्सा लेना चाहते हैं। “मुझे लगता है कि इसमें जुड़ने के जितने मौके हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग इसमें दिलचस्पी रखने वाले होंगे।” इसके साथ ही वह कहते हैं कि अंतरिक्ष से जुड़े कार्यक्रमों में वैज्ञानिक और आर्थिक मकसद के साथ राजनीतिक प्रतिष्ठा का पहलू भी होता है। किसी बड़े मिशन का हिस्सा बनना देश की अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ा सकता है।

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