
मंगल पर घर बसाने के लिए ड्राई फ्रूट्स के साथ कैसा प्रयोग चल रहा?
कल्पना कीजिए, आप मंगल ग्रह यानी Mars पर हैं। चारों तरफ लाल मिट्टी, दूर-दूर तक बंजर जमीन और ऐसी ठंड कि खुले में रहना लगभग नामुमकिन हो। अब सवाल है कि अगर एक दिन इंसान सचमुच मंगल पर बसने पहुंचा, तो उसके रहने के लिए घर कहां से आएंगे? क्या पृथ्वी से ईंट, सीमेंट और रेत से भरे ट्रक रॉकेट में लादकर भेजे जाएंगे? जाहिर है, यह इतना आसान नहीं होगा।
लेकिन वैज्ञानिकों ने इस मुश्किल का हल खोजने के लिए एक ऐसी चीज से प्रेरणा ली है, जो हमारी रसोई में आसानी से मिल जाती है- ड्राई फ्रूट्स!
हॉन्गकॉन्ग के वैज्ञानिक एक खास निर्माण सामग्री यानी कंस्ट्रक्शन मैटेरियल तैयार करने पर काम कर रहे हैं, जिसका आइडिया फ्रीज-ड्राइड फलों (Freeze Dried Fruits) से मिला है। इस एक्सपेरिमेंट में रेत, जिलेटिन, खास तरह के यीस्ट और 3D प्रिंटिंग तकनीक की मदद ली जा रही है। मकसद है ऐसी सामग्री बनाना, जो मंगल जैसे बेहद ठंडे और कम वायुदाब वाले वातावरण में भी काम आ सके।

लेकिन फल सुखाने की तकनीक से घर बनाने का आइडिया आया कैसे? रेत और यीस्ट मिलकर निर्माण सामग्री कैसे तैयार करेंगे? और क्या सचमुच मंगल की मिट्टी से वहां इंसानों के रहने लायक मकान बनाए जा सकते हैं? आइए, आसान भाषा में समझते हैं इस दिलचस्प साइंस को।
ड्राई फ्रूट्स से कैसे मिला घर बनाने का आइडिया?
AP की रिपोर्ट के मुताबिक, हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (HKUST) के सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग विभाग की टीम इस एक्सपेरिमेंट पर काम कर रही है। इसका नेतृत्व एसोसिएट प्रोफेसर किउ जिशेन (Qiu Jishen) कर रहे हैं।
टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसी निर्माण सामग्री तैयार करना है, जो मंगल के बेहद कम वायुदाब और कम तापमान में भी इस्तेमाल की जा सके। पृथ्वी पर इस्तेमाल होने वाले सामान्य कंक्रीट को सीधे मंगल पर ले जाकर इस्तेमाल करना आसान नहीं होगा। वहां का वातावरण अलग है और निर्माण के लिए जरूरी संसाधन जुटाना भी मुश्किल है।
देखिए फ्रीज-ड्राई फ्रूट्स से आइडिया लेकर कैसे तैयार हो रहा बिल्डिंग मटीरियल-
इसी समस्या का हल खोजते हुए वैज्ञानिकों ने फ्रीज-ड्राइंग की प्रक्रिया पर गौर किया। इस तकनीक में फलों को पहले जमाया जाता है फिर कम दबाव में उनकी जमी हुई नमी को सीधे भाप में बदलकर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया को सब्लिमेशन (Sublimation) कहते हैं। इससे फल में पानी की मात्रा काफी कम हो जाती है और उसकी बनावट बदल जाती है।
किउ जिशेन के मुताबिक, फल जमाने और सुखाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले हालात मंगल के वातावरण से कुछ हद तक मिलते-जुलते हैं। इसी से वैज्ञानिकों को विचार आया कि क्या इस प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर मंगल पर घर बनाने के लिए खास सामग्री तैयार की जा सकती है।
यानी वैज्ञानिक ड्राई फ्रूट्स को ईंटों में नहीं बदल रहे हैं।
वे फल सुखाने की प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर ऐसी सामग्री बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो मंगल जैसे वातावरण में उपयोगी हो सके।
रेत, जिलेटिन और यीस्ट से बनेगा ‘स्पेस कंक्रीट’?
इस एक्सपेरिमेंट की खासियत यह है कि वैज्ञानिक ऐसी निर्माण सामग्री तैयार करने की संभावना तलाश रहे हैं, जिसके लिए मंगल पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए टीम ने रेत, जिलेटिन और जेनेटिकली इंजीनियर्ड यीस्ट को मिलाकर एक खास मिश्रण तैयार किया है।
रेत इस सामग्री का मुख्य आधार है। लैब में वैज्ञानिक ऐसी मिट्टी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके रासायनिक और भौतिक गुण मंगल की मिट्टी जैसे हों।
जिलेटिन मिश्रण को एक gel जैसा आधार देता है। इससे यीस्ट को पनपने के लिए अनुकूल वातावरण मिल सकता है। वहीं, जेनेटिकली इंजीनियर्ड यीस्ट ऐसा यीस्ट है, जिसके आनुवंशिक गुणों में बदलाव किया गया है। वैज्ञानिक इसका इस्तेमाल खास तरह के चिपकने वाले प्रोटीन बनाने के लिए कर रहे हैं।

इन प्रोटीन का काम रेत के कणों को आपस में जोड़ने और सामग्री की मजबूती बेहतर करने में मदद करना है। आसान भाषा में समझें तो रेत इस सामग्री का ढांचा तैयार करती है, जबकि जिलेटिन और यीस्ट से बनने वाले प्रोटीन एक तरह के जैविक गोंद की भूमिका निभाते हैं।
वैज्ञानिक इन सभी चीजों को मिलाकर ऐसी सामग्री विकसित करना चाहते हैं, जो कंक्रीट की तरह निर्माण कार्य में इस्तेमाल हो सके। हालांकि, यह अभी एक्सपेरिमेंट के स्टेज में है। इसे पारंपरिक कंक्रीट का पूरी तरह विकसित विकल्प या मंगल पर घर बनाने के लिए तैयार सामग्री नहीं माना जा सकता।
3D प्रिंटर कैसे बनाएगा मंगल पर घर?
सामग्री तैयार करने के बाद अगला सवाल है कि इससे घर बनाया कैसे जाएगा? यहां काम आएगी 3D प्रिंटिंग तकनीक।
सामान्य प्रिंटर कागज पर अक्षर और तस्वीरें छापता है, जबकि 3D प्रिंटर किसी डिजिटल डिजाइन के आधार पर सामग्री की परत-दर-परत जमावट करके एक ठोस आकार तैयार करता है। इस तकनीक का इस्तेमाल छोटे मॉडल, मशीनों के पुर्जे और निर्माण संबंधी संरचनाएं बनाने में किया जाता है।
हांगकांग की टीम अपनी लैब में मंगल जैसे हालात तैयार करके 3D प्रिंटर की मदद से इस सामग्री को आकार दे रही है। वैज्ञानिक यह देख रहे हैं कि मंगल जैसी ठंड और कम हवा के दबाव में यह सामग्री कितनी अच्छी तरह काम करती है।
भविष्य में अगर यह तकनीक सफल होती है, तो मंगल की सतह पर मौजूद मिट्टी से निर्माण सामग्री तैयार करके मशीनों की मदद से दीवारें और दूसरी संरचनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे पृथ्वी से हर ईंट और निर्माण सामग्री भेजने की जरूरत कम हो सकती है।

हालांकि, 3D प्रिंटर से घर का ढांचा बनाना ही काफी नहीं होगा। इंसानों के रहने के लिए घर को गर्म रखना होगा, सांस लेने के लिए हवा और पीने के लिए पानी का इंतजाम करना होगा। साथ ही, अंतरिक्ष से आने वाली ऐसी अदृश्य किरणों से भी बचाना होगा, जो इंसान के शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इन सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग तकनीकों की जरूरत होगी।
मंगल पर घर बनाना इतना मुश्किल क्यों है?
मंगल पर घर बनाने में कई चुनौतियां हैं। वहां का वातावरण पृथ्वी से बहुत अलग है।
पहली चुनौती है कम वायुदाब- मंगल पर हवा का दबाव पृथ्वी के मुकाबले बहुत कम है इसलिए वहां निर्माण करना आसान नहीं होगा।
दूसरी चुनौती है ठंड- मंगल का औसत तापमान करीब माइनस 60 डिग्री सेल्सियस रहता है। ऐसे में निर्माण सामग्री को मजबूत और टिकाऊ बनाना जरूरी होगा।
तीसरी चुनौती है सामान पहुंचाना- पृथ्वी से ईंट, सीमेंट और भारी मशीनें मंगल तक भेजना महंगा और मुश्किल होगा।
चौथी चुनौती है ऊर्जा- 3D प्रिंटर और दूसरी मशीनें चलाने के लिए बिजली चाहिए। वैज्ञानिक किउ जिशेन के मुताबिक, मंगल पर ऊर्जा जुटाने वाले उपकरण पहुंचाना भी एक बड़ी चुनौती होगी।
इसी वजह से अंतरिक्ष विज्ञान में In-situ Resource Utilization (ISRU) यानी किसी दूसरे ग्रह पर मौजूद संसाधनों का वहीं इस्तेमाल करने की अवधारणा अहम है। इसका मकसद यह है कि भविष्य में मंगल पर जाने वाले इंसानों को हर जरूरी चीज पृथ्वी से न ले जानी पड़े।

क्या मंगल पर सचमुच घर बना पाएगा इंसान?
फिलहाल, इस सवाल का जवाब देने के लिए और रिसर्च की जरूरत है। हॉन्गकॉन्ग के वैज्ञानिकों का यह शुरुआती एक्सपेरिमेंट जैविक सामग्री, मिट्टी और 3D प्रिंटिंग से अंतरिक्ष में निर्माण के नए तरीके तलाश रहा है।
लैब में मंगल जैसे हालात बनाना और वहां सचमुच घर बनाना अलग बातें हैं। वहां हानिकारक किरणें, धूल, तापमान में बदलाव और मशीनों की देखभाल जैसी चुनौतियों से भी निपटना होगा। किउ जिशेन को उम्मीद है कि भविष्य में इंसान मंगल पर उतरकर वहां काम कर सकेगा। उनका शोध इसी सपने को हकीकत के करीब लाने की कोशिश है।

अब ड्राई फ्रूट्स खाते समय उसके इस पहलू को भी सोचिएगा जरूर।