यमन में राष्ट्रपति कंपाउंड ही उड़ा दिया, लाल सागर से कैसे लड़ी जा रही होर्मुज की लड़ाई?
यमन में हूतियों ने अदन स्थित राष्ट्रपति परिसर पर मिसाइल हमला किया है। उनका कहना है कि सऊदी इसका इस्तेमाल हथियार रखने के लिए कर रहा था। समझिए कैसे लाल सागर से होर्मुज की लड़ाई लड़ी जा रही है।
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यमन में राष्ट्रपति कंपाउंड ही उड़ा दिया, लाल सागर से कैसे लड़ी जा रही होर्मुज की लड़ाई?
हूती विद्रोहियों ने अदन में राष्ट्रपति भवन के कॉम्प्लेक्स पर हमला किया है।© Getty Images

यमन के हूती विद्रोहियों ने अदन स्थित राष्ट्रपति परिसर अल-मआशिक पर हमला किया है। यह वही परिसर है, जहां यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का मुख्यालय है और इसे सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। यमन के स्वास्थ्य मंत्री ने बताया है कि इस हमले में पांच लोगों की मौत हुई और 16 लोग घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी सुरक्षित हैं।

हूतियों ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि उन्होंने उस मुख्यालय को निशाना बनाया, जिसका इस्तेमाल सऊदी अरब कर रहा था। हूतियों का आरोप है कि इस परिसर का इस्तेमाल सऊदी अरब मिलिट्री ऑपरेशन के हेडक्वार्टर और हथियारों को स्टोर करने के लिए कर रहा था। यह तो ताजा अपडेट रहा लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। समझिए कैसे हूतियों की लड़ाई बड़ा सिग्नल दे रही है। 

बाब-अल-मंदेब की लड़ाई का दूसरा एंगल

यमन में हूतियों और सऊदी अरब समर्थित सरकारी बलों के बीच लड़ाई बढ़ती जा रही है। लाल सागर के तट पर मोखा बंदरगाह और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास नियंत्रण को लेकर संघर्ष चल रहा है। हूती लगातार सऊदी के हवाई अड्डों और एनर्जी इंफ्रास्टक्चर को निशाना बना रहे हैं।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सऊदी, ईरानी और क्षेत्रीय सूत्रों के हवाले से बताया है-

1. इन हमलों का मकसद सऊदी अरब को यमन में हूतियों की शर्तें मानने के लिए मजबूर करना है।

2. साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका पर दबाव बनाना भी है, ताकि वह ईरान पर अपना आर्थिक और सैन्य दबाव कम करे।

इससे एक बात साफ हो जाती है कि ईरान और अमेरिका का टकराव केवल फारस की खाड़ी या होर्मुज स्ट्रेट तक सीमित नहीं रह गया है। यमन में हूती विद्रोहियों की तेज होती गतिविधियां इसे लाल सागर तक ले आई हैं।

हूती→ सऊदी → अमेरिका

रणनीतिक सलाहकार संस्था Horizon Engage के मध्य पूर्व सुरक्षा विशेषज्ञ माइकल नाइट्स का कहना है कि ईरान और हूती सऊदी अरब की आर्थिक संवेदनशीलता और स्थिरता की जरूरत का फायदा उठाकर अमेरिका पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

वह कहते हैं कि ईरान सीधे अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर नहीं कर पा रहा, इसलिए सऊदी अरब को निशाना बनाकर अमेरिका को परेशान करने की कोशिश कर रहा है।

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होर्मुज की लड़ाई लाल सागर से लड़ी जा रही?

हां, होर्मुज स्ट्रेट ईरान के लिए लंबे समय से रणनीतिक दबाव का अहम जरिया रहा है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से की ग्लोबल मार्केट तक पहुंच इसी रास्ते पर निर्भर करती है।

यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने से ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों और समुद्री परिवहन पर असर पड़ सकता है।

लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार पर बाब-अल-मंदेब भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह स्ट्रेट अदन की खाड़ी को लाल सागर से जोड़ता है। यहां से जहाज स्वेज नहर की ओर बढ़ते हैं, जो एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का अहम रास्ता है।

फरवरी के अंत में अमेरिका के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही लगभग बंद कर रखी है और कई जहाजों को निशाना बनाया है। दूसरी तरफ उसके क्षेत्रीय सहयोगी हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट भी सऊदी जहाजों के लिए बंद कर दिया है। इससे एक साथ दो समुद्री रास्तों पर ईरान का दबाव बन गया है।

दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रेशर बढ़ेगा?

अमेरिका स्थित काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) ने अपने एक लेख में लाल सागर के संकट को होर्मुज के आसपास जारी संघर्ष का एक नया आयाम बताया। उसके मुताबिक, बाब-अल-मंदेब पर हूतियों की पकड़ मजबूत होना और सऊदी जहाजों के लिए खतरा बढ़ना क्षेत्रीय संघर्ष के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।

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मोखा सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के सीईओ अतीक गरल्लाह ने अलजजीरा के एक लेख में कहा, 'बाब-अल-मंदेब के आसपास लड़ाई तेज होने की मुख्य वजह वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से इसकी रणनीतिक अहमियत है। यमन संघर्ष में शामिल पक्षों के लिए भी यह इलाका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां के तटीय क्षेत्र, द्वीपों और आसपास के पहाड़ी इलाकों पर नियंत्रण से निगरानी रखने, सैनिकों की तैनाती करने और समुद्री यातायात के लिए खतरा पैदा करने की अलग-अलग क्षमताएं मिलती हैं।'

ईरान प्रेशर कैसे बढ़ा रहा है?

CFR के विश्लेषण के मुताबिक, ईरान हूतियों को हथियार, प्रशिक्षण और खुफिया सहायता देता रहा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के जरिए अधिक एडवांस्ड मिसाइलों और ड्रोन से जुड़ी मदद भी पहुंचने की बात कही जाती है। इससे हूतियों की अपने क्षेत्र से बाहर, खासकर लाल सागर में हमला करने की क्षमता बढ़ी है।

इस सहायता का रणनीतिक फायदा यह है कि ईरान को हर मोर्चे पर अपनी सेना भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। यमन में मौजूद हूती अपने मिसाइलों, ड्रोन और तटीय ठिकानों के जरिए सऊदी अरब और समुद्री रास्तों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। इससे अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को केवल ईरान की सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने के बजाय यमन से पैदा होने वाले खतरे के लिए भी तैयारी करनी पड़ती है।

इससे एक और फायदा होता है कि हूती विद्रोही हमलों की जिम्मेदारी खुद लेते हैं। 

सऊदी अरब निशाने पर क्यों?

सऊदी, ईरानी और क्षेत्रीय सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि हूती सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पर दबाव बनाना चाहते हैं, ताकि यमन में उनकी मांगों पर बातचीत हो। इसके साथ ही वे अमेरिका पर भी दबाव डालना चाहते हैं, जिसने ईरान की आर्थिक नाकेबंदी कर रखी है।

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हूतियों की मांगों में यमन के बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर लगी पाबंदियां हटाना, ईरान के लिए नियमित उड़ानें बहाल करना, सरकारी कर्मचारियों के वेतन का भुगतान और युद्ध के नुकसान का मुआवजा शामिल बताया गया है।

वे यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को सऊदी की ओर से मिलने वाले समर्थन को खत्म करने की भी मांग करते रहे हैं। इन मांगों को मानने से यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों की पकड़ और मजबूत हो सकती है।

हूती प्रवक्ता मोहम्मद अब्दुस्सलाम ने हालांकि, इसे खारिज करते हुए कहा कि उनकी मांगें मानवीय और आर्थिक मुद्दों से जुड़ी हैं। उन्होंने बंदरगाहों पर प्रतिबंधों में ढील, आर्थिक पाबंदियां हटाने और यमन के अपने संसाधनों से सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने की मांग की।

सऊदी को नुकसान, हूतियों का कुछ नहीं

हूती विद्रोहियों ने हाल के दिनों में सऊदी अरब के कई एयरपोर्ट और उसके तेल ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें रियाद का किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट और सऊदी अरामको का हेडक्वार्टर भी शामिल है।

सऊदी अरब के लिए ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा खास महत्व रखती है। तेल और गैस से होने वाली कमाई उसकी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ बड़े निवेश और आर्थिक बदलाव की योजनाओं के लिए भी अहम है। 2019 में अरामको की तेल सुविधाओं पर हुए हमलों से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब पांच फीसदी हिस्सा अस्थायी रूप से प्रभावित हुआ था।

दूसरी तरफ, हूतियों के पास इस लड़ाई में खोने के लिए कुछ नहीं है। उनकी आर्थिक संपत्तियां सऊदी के सामने कहीं नहीं टिकतीं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि हूतियों पर दबाव बनाने की स्ट्रैटजी यहीं प्रभावित होती है।

पूर्व अमेरिकी वार्ताकार आरोन डेविड मिलर कहते हैं, 'सऊदी के बुनियादी ढांचे की कीमत हूतियों के बुनियादी ढांचे से कहीं ज्यादा है।'

उनका कहना है कि हूतियों के पास खोने के लिए सऊदी अरब के मुकाबले कम चीजें हैं। यह अंतर लंबे संघर्ष में अहम हो सकता है, क्योंकि सऊदी अरब को अपने महंगे और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा करनी होगी, और हूती कम संसाधनों के साथ भी लगातार खतरा बनाए रख सकते हैं।

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