
ईरान और अमेरिका के बीच शुरू हुआ संघर्ष अब सऊदी अरब के लिए भी नई मुसीबत बनता दिख रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों ने रियाद के एयरपोर्ट से लेकर सऊदी के तेल ठिकानों और अहम समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब यमन की सरकारी सेना के साथ मिलकर हूतियों के ठिकानों पर हमले कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद हूतियों से निपटना उसके लिए आसान नहीं दिख रहा। आखिर हूती सऊदी अरब के अहम ठिकानों को कैसे निशाना बना रहे हैं? और इस संघर्ष में सऊदी के सैन्य और रणनीतिक विकल्प कितने सीमित हैं?

हूतियों ने सऊदी अरब के पोर्ट से लेकर एयरपोर्ट जैसे स्ट्रैटेजिक ठिकानों को सबसे ज्यादा हिट किया है। सऊदी अरब इस वजह से अपना तेल नहीं बेच पा रहा है। इस जंग में मक्का पैक्ट के बाद भी तुर्की और पाकिस्तान सऊदी की जंग लड़ने नहीं आए और न ही पुराना सहयोगी होने के नाते अमेरिका ने ही रियाद का साथ दिया। ऐसे में सवाल है कि हूतियों के खिलाफ ये सभी देश क्यों नहीं लड़ना चाहते, सऊदी को उसके ही प्रमुख सहयोगियों ने अकेला क्यों छोड़ दिया है। इस बीच हूतियों के खिलाफ जंग लड़ने का ऑफर खुद इजरायल ने सऊदी के पास क्यों भेजा?
सऊदी के सहयोगियों ने क्यों हाथ खड़े किए?
जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय स्टडी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि हूतियों से जंग लड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं है, क्योंकि वह कोई स्थापित आर्मी नहीं हैं। यमन के हूतियों का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है, इसलिए उनको ट्रैक कर पाना ही सबसे मुश्किल काम है। वहीं दूसरी तरफ, वह जब भी, जहां से भी, चाहते हैं, वहां से दुश्मन पर हमला करके भाग जाते हैं। इसीलिए अब तक की जंग में सऊदी अरब को हूतियों ने भारी नुकसान पहुंचाया है।
जहां तक बात अमेरिका, पाक और तुर्की द्वारा सऊदी के मदद की है तो सभी के अपने-अपने हित और कारण हैं। अमेरिका पहले से ही ईरान युद्ध में फंसा है, जिसमें उसे भारी नुकसान हो चुका है। वह धीरे-धीरे अब इस जंग से खुद को बाहर निकालना चाहता है। इसलिए वह हूतियों के खिलाफ नया मोर्चा खोलने से बच रहा है। दूसरी वजह यह भी है कि इस बहाने अमेरिका सऊदी अरब को अपने और ज्यादा हथियार बेचना चाहता है।

हूतियों पर हमले का मतलब ईरान पर हमला
प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि पाकिस्तान और तुर्की मक्का पैक्ट करने के बाद भी हूतियों के खिलाफ जंग नहीं लड़ना चाहते। इसकी कई वजहें हैं। उन्होंने कहा कि हूती ईरान के प्रॉक्सी कहे जाते हैं। ऐसे में पाकिस्तान इस्लामिक ब्रदरहुड के कारण ईरान से नहीं भिड़ना चाहता, क्योंकि हूतियों पर हमला एक तरह से सीधे ईरान से जंग छेड़ना होगा। वहीं तुर्की मक्का पैक्ट में सिर्फ मुस्लिम ब्रदरहुड को बढ़ावा देने के लिए शामिल हुआ है। वह पहले से नाटो का सदस्य है, उसे इस पैक्ट में शामिल होने की कोई खास जरूरत नहीं थी, लेकिन धार्मिक और रणनीतिक मकसद से तुर्की इसमें है।
मिडिल-ईस्ट में बदल रही परिस्थितियों में अब वहां अपनी धाक जमाने की होड़ में तुर्की भी शामिल होना चाहता है। वह हूतियों के खिलाफ इसलिए जंग नहीं लड़ रहा कि जब अमेरिका और पाकिस्तान आगे नहीं आ रहे, जिनका सऊदी के साथ सीधा डिफेंस एग्रीमेंट है तो वह किस लिए इसमें पड़े।
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा कहते हैं कि हूतियों से इजरायल के अलावा कोई नहीं लड़ सकता। हूती बहुत ताकतवर हैं। उनके पास अत्याधुनिक हथियार और बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। वह गुरिल्ला वार करते हैं। अमेरिका हूतियों से जंग छेड़कर नई आफत नहीं मोल लेना चाहता। वहीं पाकिस्तान या तुर्की की हिम्मत हूतियों से लड़ने की नहीं है। इसकी एक वजह ईरान भी है। अगर पाकिस्तान या तुर्की ऐसा करते हैं तो मिडिल ईस्ट में एक नई जंग शुरू हो जाएगी। ईरान फिर पाकिस्तान या तुर्की को नहीं छोड़ेगा।
इजरायल क्यों लड़ना चाहता है सऊदी के लिए हूतियों से जंग?
प्रोफेसर अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि सऊदी इस वक्त बहुत मजबूर है। कोई भी उसकी मदद नहीं कर रहा है। पाकिस्तान और तुर्की ने बीच में भले कहा कि वह अपनी सेना तैनात कर रहे हैं और अन्य सैन्य मदद कर रहे हैं, लेकिन सच यह है कि ये दोनों ही देश सीधे हूतियों से जंग नहीं लड़ सकते। पाकिस्तान कह रहा है कि उसके सैनिक पूर्व डिफेंस पैक्ट के तहत सऊदी में पहले से ही तैनात हैं। पाकिस्तान और तुर्की कुल मिलाकर रक्षात्मक खेल रहे हैं। सऊदी भी इस बात को समझ रहा है। सऊदी को अपनी यह जंग खुद लड़नी पड़ेगी। मगर वह हूतियों से पार नहीं पाएगा। यह बात इजरायल जानता है।
अब्राहम अकॉर्ड में शामिल कराना मकसद
प्रोफेसर श्रीवास्तव आगे कहते हैं कि ऐसे में इजरायल के पास मौका है कि वह अब्राहम अकॉर्ड में शामिल करने के लिए सऊदी अरब को हूतियों के खिलाफ जंग लड़ने की बात कहकर राजी कर ले। इजरायल का मकसद और छिपा संदेश यही है कि वह हूतियों से जंग लड़ेगा, लेकिन जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने को तैयार हो जाए।
वहीं इस पर कमर आगा कहते हैं कि यमन के हूतिये किसी देश की मजबूत आर्मी की तरह ताकत हासिल कर चुके हैं। उसे ईरान और चीन का बैकअप है। उनसे सऊदी, पाकिस्तान, तुर्की या अमेरिका नहीं लड़ पाएंगे। इसकी वजह है कि वे गुरिल्ला युद्ध लड़ते हैं, यानी कहीं से आते हैं और हमले करके भाग जाते हैं। इसलिए हूतियों के खिलाफ कोई जंग लड़ सकता है तो वह एकमात्र इजरायल है। इजरायल ने पहले भी इस तरह की जंगें लड़ी हैं। इजरायल गुरिल्ला वार का सबसे माहिर खिलाड़ी है। बल्कि हर तरह के युद्ध में इजरायल पारंगत है। वह अकेले कई बार पहले भी 7-8 देशों से युद्ध लड़ चुका है और उन सभी को हरा चुका है।
उन्होंने कहा कि इजरायल के पास ताकत और टेक्नोलॉजी है। सऊदी गहरे संकट में है। उसकी मदद और कोई नहीं कर रहा। सिर्फ इजरायल उसके लिए लड़ने को तैयार है, मगर अब्राहम अकॉर्ड की वजह से सऊदी उसका ऑफर स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
दूसरी वजह है कि हाल ही में सऊदी ने हाल ही में मक्का पैक्ट जॉइन किया है, जिसमें तुर्की और पाकिस्तान हैं। इस वजह से भी वह अब इजरायल के करीब जाने से बच रहा है। क्योंकि तब पाकिस्तान और तुर्की उससे नाराज हो जाएंगे। हालांकि वह सऊदी की मदद भी नहीं कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ इजरायल और सऊदी के अच्छे संबंध हैं, जो पहले से ही हैं। इजरायल अपने उन संबंधों को इस मदद का ऑफर देकर और मजबूत करना चाहता है। अब सऊदी अरब को हूतियों से पार पाने के लिए या तो ईरान से समझौता कर लेना चाहिए या फिर इजरायल की बात माननी पड़ेगी।
ट्रंप ने हूतियों को क्या धमकी दी?
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— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) October 13, 2026
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यमन के हूती विद्रोहियों को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, “हूती बहुत बुरा व्यवहार कर रहे हैं। मुझे लगा था कि एक साल पहले जब हमने उनपर जमकर बमबारी की थी और उनके अनुरोध पर बाद में हमले रोक दिए थे तो उन्होंने सबक सीख लिया होगा। मगर लंबे समय तक चुप रहने के बाद शायद ईरान के इशारे पर अब वे फिर से उभर आए हैं। वे बहुत गंदे तरीके से सऊदी अरब पर हमला कर रहे हैं और शायद जानबूझकर अमेरिकी चुनावों से पहले तेल की कीमतें बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह अच्छा नहीं है।
किसी को उन्हें समझाना चाहिए कि मैं चुनाव नहीं लड़ रहा हूं। मैं पहले ही भारी मतों से जीत चुका हूं, लेकिन चुनाव के बाद मैं वहां रहूंगा और मैं कभी नहीं भूलूंगा!”
इजरायल के ऑफर पर क्या है सऊदी की प्रतिक्रिया?
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिकी मध्यस्थता के जरिए सऊदी अरब की मंजूरी पाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इजरायल यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान में शामिल हो सके। वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान जनता की तीखी प्रतिक्रिया और मक्का एलायंस के इस्लामिक ब्रदरहुड के मोह के डर से इसपर अभी कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं या इस कदम का विरोध कर रहे हैं। हालांकि सऊदी अरब की तरफ से अभी नेतन्याहू के ऑफर पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।





