
इस साल मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिक- कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को दिया गया है। इन्होंने मिलकर ऐसी तकनीक खोजी है, जिसे ऑप्टोजेनेटिक्स (Optogenetics) कहा जाता है। आसान शब्दों में बताएं तो इन्होंने ऐसा 'स्विच' बनाया है, जिससे रोशनी के जरिए दिमाग के नर्व सेल्स को चालू या बंद किया जा सकता है।

इन्होंने ऐसा क्या खास किया?
हमारे दिमाग में अरबों-खबरों न्यूरॉन्स का जटिल जाल बिछा हुआ है। ये नर्व सेल्स पलक झपकने से भी कम वक्त में एक-दूसरे को संदेश भेजती रहती हैं। वैज्ञानिकों को इनकी स्टडी करनी थी, लेकिन चुनौती ये थी कि बिना दिमाग को नुकसान पहुचाए किसी खास न्यूरॉन को तेजी से कंट्रोल कैसे किया जाए।
पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने एक बार देखा कि पानी में पाए जाने वाले एक कोशिका वाले नन्हे हरे शैवाल (Algae) रोशनी की तरफ आकर्षित होकर तैरते हैं। उन्होंने लैब में जांच की तो पता चला कि इन शैवाल में एक खास तरह का प्रोटीन होता है। इस प्रोटीन पर जब नीली रोशनी पड़ती है तो हल्का-सा बिजली का करंट पैदा होता है।

ब्रेन के सेल्स को किया ऑन-ऑफ
वैज्ञानिकों ने सोचा कि अगर इस प्रोटीन को दूसरे सेल्स में डाल दिया जाए तो वह लाइट सेंसिटिव बन सकता है। कार्ल डाइसेरोथ ने उस जीन को खोजा, जो इस प्रोटीन को कंट्रोल करता है। इसके बाद उन्होंने उस प्रोटीन वाले जीन का इस्तेमाल एक जिंदा चूहे के दिमाग के न्यूरॉन्स में किया। जब उस कोशिका पर खास तरह की रोशनी डाली गई तो वह तुरंत एक्टिव हो गई और सिग्नल भेजने लगी।
उन्होंने बारीक फाइबर बनाए और उनके जरिए सेल्स पर रोशनी डालकर दिखाया कि किस तरह जीवित दिमाग की खास कोशिकाओं को मॉडिफाई करके जब चाहे, ऑन या ऑफ किया जा सकता है।
दिमाग की कोशिकाएं मिलीसेकंड्स की गति से आपस में संवाद करती हैं। ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक ने पहली बार वैज्ञानिकों को लैब में उसी गति से उन्हें कंट्रोल करने का तरीका दे दिया है।

इसका क्या फायदा?
ऑप्टोजेनेटिक्स की यह तकनीक सिर्फ दिमाग की कोशिकाओं को ऑन या ऑफ करने के काम नहीं आती बल्कि कई गंभीर बीमारियों के इलाज का नया रास्ता भी खोल सकती है।
- इससे वैज्ञानिकों को दिमाग के रहस्यों को समझने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिक अब जान सकेंगे कि दिमाग का कौन सा हिस्सा या कौन सी कोशिका डर, खुशी, नींद, भूख, दर्द जैसी भावनाओं या यादों को कंट्रोल करती है।
- इससे कई बीमारियों का इलाज खोजने में भी मदद मिल सकती है। डिप्रेशन, अल्जाइमर, पार्किंसंस, ऑटिज्म और शिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक और तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों को बेहतर ढंग से समझने और नई दवाइयां बनाने में यह तकनीक नई उम्मीद बनकर आई है।
- इसके अलावा आनुवंशिक बीमारी (Retinitis Pigmentosa) की वजह से आंखों की रोशनी खो चुके लोगों को दोबारा धुंधला ही सही, लेकिन फिर से लायक बनाने के प्रयास भी हो रहे हैं।
नोबेल की खबर मिलने पर बोले, बच्चों का टिफिन पैक करना है
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के 54 साल के प्रोफेसर कार्ल डाइसेरोथ को नोबेल पुरस्कार की खबर मिलने का वाकया भी दिलचस्प रहा। वह देर रात तक काम करके सोने जा रहे थे कि तभी स्वीडन से नोबेल कमेटी का फोन आ गया।
करीब एक घंटे बाद AP से फोन पर बातचीत में जब उनसे पूछा गया कि आगे उनका क्या प्लान है? तो उन्होंने कहा कि उनकी लिस्ट में अगला काम बच्चों को स्कूल के लिए सैंडविच बनाना है और लंच पैक करके देना है, जो अभी गहरी नींद में सो रहे हैं।
नोबेल पुरस्कार के तहत तीनों वैज्ञानिकों को 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (करीब 10 करोड़ रुपये) की राशि दी जाएगी।







