EXCLUSIVE: पढ़ाई में तो कभी मेडल मिला नहीं... एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज जीतने वाली सुचिका की सक्सेस स्टोरी
एशियन गेम्स 2026 में MMA में ब्रॉन्ज जीतने वाली सुचिका तरियाल से RT हिंदी ने खास बातचीत की, जहां उन्होंने MMA के नियम और इस खेल को समझाया। सुचिका ने 12 साल की उम्र से शुरू हुई फाइटिंग की कहानी, जूडो से MMA तक के सफर और एशियन गेम्स मेडल तक पहुंचने का अनुभव भी शेयर किया।

भारत के लिए 20वें एशियन गेम्स में एक और मेडल आया है। सुचिका तरियाल ने महिलाओं के 60 किग्रा ट्रेडिशनल MMA में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। यह एशियन गेम्स 2026 में भारत का चौथा मेडल है।

लेकिन इस मेडल की कहानी सिर्फ जीत-हार तक सीमित नहीं है। सवाल उस खेल का भी है, जिसका नाम सुनकर शायद बहुत से लोग एक पल के लिए रुक जाएं- MMA... ये कौन-सा गेम है? MMA, मतलब... Mixed Martial Arts।

लेकिन सुचिका की कहानी सिर्फ एक मेडल या MMA की नहीं है। 12 साल की उम्र में उनके साथ हुई एक घटना ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया था-’काश, मुझे लड़ना आता... मैं अपना बचाव कर पाती।’ ये कहने वाली लड़की कि- कभी पढ़ाई में तो मेडल मिला नहीं, तो गेम में ही सही.... यहीं से शुरू हुआ सुचिका का सफर, जो जूडो से होते हुए MMA और अब एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचा है। RT हिंदी ने भारतीय MMA खिलाड़ी और एशियन गेम्स 2026 की ब्रॉन्ज मेडलिस्ट सुचिका तरियाल से एक्सक्लूसिव बातचीत की।

सुचिका तरियाल, भारतीय MMA खिलाड़ी, एशियन गेम्स 2026 की ब्रॉन्ज मेडलिस्ट।

पंच, किक और ग्रैपलिंग... MMA में कैसे होता है मुकाबला?

अगर आप कोई MMA फाइट पहली बार देखें तो थोड़ा कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है। रिंग जैसी जगह, खिलाड़ियों की ड्रेस कुछ जूडो जैसी, कहीं पंच चलते दिखेंगे, कहीं किक, कहीं कुश्ती के दांव और कुछ ही सेकंड में मुकाबला जमीन पर पहुंच जाएगा। एक नॉन-स्पोर्ट्स इंसान सोच सकता है- आखिर ये हो क्या रहा है?

असल में MMA अलग-अलग कॉम्बैट स्पोर्ट्स (फाइटिंग स्पोर्ट्स) का मिक्स है। इसमें बॉक्सिंग के पंच, किक बॉक्सिंग की किक्स, रेसलिंग और जूडो के टेकडाउन-ग्रैपलिंग जैसे दांव-पेच और कराटे जैसी मार्शल आर्ट्स की तकनीकों का इस्तेमाल हो सकता है। यानी फाइटर को सिर्फ हमला करना ही नहीं, बल्कि अलग-अलग तकनीकों से बचाव करना भी आना चाहिए।

सुचिका के मुताबिक, MMA में सामने वाले का पंच या किक कब आ रही है, इसका अंदाजा लगाना और उससे बचना उतना ही जरूरी है, जितना ग्रैपलिंग या टेकडाउन करना। एक छोटी-सी गलती मुकाबले का रुख बदल सकती है।

बॉक्सिंग से कैसे अलग है MMA? 

बॉक्सिंग की तरह यहां भी मुकाबला राउंड में होता है, लेकिन बॉक्सिंग के रिंग की जगह MMA में केज होता है, जिसे उसके आठ किनारों की वजह से ऑक्टागन कहा जाता है। मुकाबले का नतीजा जजों के स्कोर, नॉकआउट या सबमिशन से तय हो सकता है। यानी यह WWE जैसी एंटरटेनमेंट फाइट नहीं, बल्कि नियमों के तहत होने वाला कॉम्पिटिटिव कॉम्बैट स्पोर्ट है।

और इसी खेल में भारत की सुचिका तरियाल ने इतिहास रचते हुए देश के लिए पदक जीता। सेमीफाइनल में सिंगापुर की हुई हून तेओ से हार के बाद सुचिका को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। मुकाबले के बाद सुचिका केज में टूट गईं और वह फफक पड़ीं। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचना और भारत को इंटरनेशनल लेवल पर मेडल दिलाना अपने में एक बड़ी बात है। 

लेकिन सुचिका की कहानी सिर्फ एक मेडल की कहानी नहीं है।

सुचिका तरियाल की बचपन की तस्वीरें।

‘काश मुझे लड़ना आता...’ 12 साल की उम्र में बदली जिंदगी

RT हिंदी से सेमिफाइनल से ठीक पहले खास बातचीत में सुचिका ने बताया कि 12 साल की उम्र में उनके साथ एक ऐसी घटना हुई, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। एक सैलून में उनके साथ गलत व्यवहार हुआ। उस वक्त उनके मन में एक बात आई—काश, मुझे लड़ना आता... काश, मैं अपना बचाव कर पाती। 

यहीं से शुरू हुआ एक सफर।

सुचिका की मां ने उन्हें जूडो की ओर बढ़ाया। घर में चार बहनें हैं और सभी जूडो से जुड़ी रहीं। सुचिका ने करीब 15 साल जूडो को दिए। इसके बाद कॉमनवेल्थ में हिस्सा लिया। वहां वह ब्रॉन्ज मेडल से चूक गईं। फिर कुराश में एशियन गेम्स खेला। ओलंपिक की तैयारी भी की, लेकिन कोरोना महामारी और आर्थिक चुनौतियों के बीच उन्हें खेल से ब्रेक लेना पड़ा।

एक वक्त ऐसा आया जब लगा कि शायद खेल की यह कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।

लेकिन फिर वापसी हुई।

खेल से ब्रेक के बाद सुचिका ने की वापसी।RT

खेल से लिया ब्रेक, फिर MMA ने कराई दमदार वापसी

MMA खिलाड़ी पूजा तोमर और हिमांशु ने उन्हें दोबारा प्रोफेशनल फाइट की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। जूडो और ग्रैपलिंग उन्हें आती थी, लेकिन स्ट्राइकिंग नहीं। इसलिए सुचिका ने फिर से शुरुआत की- पंच सीखे, किक्स सीखीं, प्रोफेशनल फाइट्स कीं।

जब MMA को एशियन गेम्स में शामिल किया गया तो उन्होंने ट्रायल दिया। इसके बाद दो एशियन चैंपियनशिप खेलीं और आखिरकार एशियन गेम्स तक पहुंचीं।

36 साल की उम्र में मेडल जीतने वाली सुचिका के लिए उम्र कभी रुकावट नहीं रही। वह कहती हैं कि बहुत से लोग एक उम्र के बाद खेल छोड़ देते हैं, लेकिन वह आज भी ट्रेनिंग कर रही हैं।

सुचिका के लिए उम्र कभी रुकावट नहीं रही, ट्रेनिंग रखी जारी।RT

36 की उम्र में मेडल, उम्र कोई बाधा नहीं

उनके मन में एक पुरानी कसक भी थी।

कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में खेलने के बावजूद वह उस वक्त मेडल नहीं ला पाई थीं। एक मेडल जीतने की वह इच्छा उनके भीतर बनी रही। अब वह सपना पूरा हो चुका है।

लेकिन सुचिका की कहानी का सबसे अहम मोड़ शायद मेडल से भी पहले आता है।

जिस लड़की ने कभी खुद को मजबूत बनाने के लिए फाइटिंग सीखी थी, वही आज दूसरी लड़कियों को सेल्फ-डिफेंस सीखने का संदेश दे रही है।

‘लड़कियों को सेल्फ-डिफेंस जरूर सीखना चाहिए’

सुचिका कहती हैं कि शुरुआत में उन्होंने यह खेल मेडल के लिए नहीं चुना था। वह खुद को मजबूत बनाना चाहती थीं। खेल ने उन्हें वह आत्मविश्वास दिया कि अगर कोई उनके साथ गलत करे तो वह उसका जवाब दे सकती हैं।

उनका संदेश साफ है- लड़कियों के लिए सेल्फ-डिफेंस जरूरी है। कोई भी ऐसा खेल सीखना चाहिए, जिससे वे खुद को सुरक्षित रख सकें और मजबूत महसूस कर सकें।

सुचिका की कहानी में एक और दिलचस्प पहलू है- शादी और करियर।

शादी के बाद भी जारी रखा खेल

भारतीय समाज में अक्सर लड़कियों की शादी को एक तय उम्र से जोड़कर देखा जाता है। सुचिका ने 30 साल की उम्र में शादी की। उनका कहना है कि अगर जीवनसाथी और परिवार का साथ मिले तो शादी के बाद भी खेल जारी रखा जा सकता है।

सुचिका की जीत पर राष्ट्रपति दौपदी मुर्मू ने भी दी बधाई।

उनके पति कपिल हूडा और परिवार ने उनका पूरा साथ दिया। मेडल की खबर आने के बाद परिवार का रिएक्शन भी बेहद खास था। टीवी पर मुकाबला देख रहे परिवार वालों ने जैसे ही खबर सुनी, उन्हें लगातार फोन आने लगे।

एक तरफ 36 साल की उम्र में एशियन गेम्स का मेडल...

दूसरी तरफ 12 साल की उम्र में खुद को मजबूत बनाने का लिया गया एक फैसला।

इन दोनों के बीच करीब दो दशक से ज्यादा का सफर है- जूडो, कॉमनवेल्थ, कुराश, ओलंपिक का अधूरा सपना, खेल से ब्रेक, फिर MMA में वापसी और अब एशियन गेम्स का पोडियम।

सुचिका की कहानी शायद यही बताती है कि कभी-कभी जिंदगी का सबसे बड़ा मुकाबला रिंग में नहीं, उससे बहुत पहले शुरू हो चुका होता है।

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