छोटे हथियार, तगड़ी मार... हूतियों से निपटना सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती क्यों
RT पर एक्सपर्ट फरहाद इब्राहिमोव ने बताया कि हूतियों के निशाने पर सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले बुनियादी ढांचे क्यों हैं। किस तरह उनके सस्ते हथियारों के हमले रियाद के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।
विचार
छोटे हथियार, तगड़ी मार... हूतियों से निपटना सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती क्यों
(फोटो: मोहम्मद हमूद/अनादोलू, गेटी इमेजेज के जरिए)

सऊदी अरब की सख्त जवाबी कार्रवाई की चेतावनियों और बाहरी सहयोगियों से सुरक्षा की उम्मीदों के बावजूद यमन के हूती विद्रोही लगातार हमले कर रहे हैं। अंसार अल्लाह (हूती आंदोलन) सीधे तौर पर अब सऊदी अरब के हवाई अड्डों और तेल ठिकानों को निशाना बना रहा है। इसका मकसद यमन युद्ध में सऊदी की दखलंदाजी की कीमत इतनी बढ़ा देना है कि रियाद झुकने और समझौते की शर्तों पर दोबारा विचार करने को मजबूर हो जाए।

अरामको हेडक्वार्टर और एयरपोर्ट निशाने पर

हूती हमलों की ताजा लहर ने सऊदी अरब के सबसे अहम ठिकानों को चोट पहुंचाई है। 13 अक्टूबर की शाम को सऊदी अरामको के धहरान स्थित मुख्यालय पर हमला हुआ, जहां से कंपनी का पूरा प्रबंधन चलता है। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने वहां आग लगने की पुष्टि की। हालांकि गनीमत रही कि किसी की जान नहीं गई।

अंसार अल्लाह ने रियाद की एक ऑयल रिफाइनरी और किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी हमलों का दावा किया है। इन ठिकानों के चयन से साफ है कि हूती सऊदी अरब की तेल की पूरी कमाई को खतरे में डालना चाहते हैं और उसकी अंतरराष्ट्रीय हवाई उड़ानों को ठप करना चाहते हैं।

सऊदी सरकार का खजाना तेल से भरता है और एयरपोर्ट देश को दुनिया से जोड़ते हैं। दोनों की सुरक्षा पर ही देश का भरोसा टिका है। ऐसे में मामूली नुकसान भी हथियारों की लागत से कहीं ज्यादा गहरा असर छोड़ता है।

संघर्ष की जड़ें और हूतियों की रणनीति

हूतियों और सऊदी अरब के बीच टकराव का पुराना इतिहास है। यह आंदोलन उत्तरी यमन में उभरा, 2004 से 2010 के बीच इसने केंद्रीय सरकार से कई जंग लड़ीं और 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया।

इस आंदोलन के उभार के पीछे यमन की राजनीतिक व्यवस्था, स्थानीय संघर्ष और सरकारी संस्थानों का कमजोर पड़ना था। ईरान की मदद से हूतियों की सैन्य क्षमता बढ़ी। हालांकि, उनका अपना सामाजिक आधार और राजनीतिक एजेंडा पहले से मौजूद था।

2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में सैन्य दखल दिया, तो वह हूतियों का मुख्य विदेशी दुश्मन बन गया। सऊदी का मकसद अपनी दक्षिणी सीमा पर विरोधी ताकत को रोकना और मान्यता प्राप्त यमन सरकार की मदद करना था। वहीं हूतियों ने इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई और विदेशी हमले के खिलाफ संप्रभुता की रक्षा के तौर पर पेश किया।

आज भी वही सोच काम कर रही है। सऊदी अरब समर्थित यमन सरकार का अभियान हूतियों के कब्जे वाले इलाकों के लिए खतरा बन रहा है। ऐसे में सऊदी के अंदर गहरे हमले करके हूती रियाद को यह जताना चाहते हैं कि युद्ध में शामिल रहने का खामियाजा उसकी अपनी जमीन पर लगातार भुगतना पड़ेगा।

हूतियों की मांगें

हूतियों की मांगें बिल्कुल साफ हैं:

  • उन पर हो रहे हवाई हमले बंद हों
  • यमन में उनके विरोधियों को मिल रही सऊदी मदद पर रोक लगे
  • परिवहन और व्यापार पर लगी पाबंदियां हटें
  • राजस्व और सरकारी भुगतानों पर सहमति बने

यह मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं। दिसंबर 2023 में संयुक्त राष्ट्र (UN) के रोडमैप में देशव्यापी सीजफायर, सरकारी कर्मचारियों की सैलरी, तेल निर्यात की बहाली और सना एयरपोर्ट व हुदैदाह बंदरगाह से पाबंदियां हटाने की रूपरेखा रखी गई थी। हूती सऊदी अरब पर दबाव बनाकर अपनी शर्तों पर सीजफायर चाहते हैं, ताकि कब्जाए इलाकों पर उनका नियंत्रण बना रहे।

इसके अलावा, सऊदी अरब पर हमले करने से यमन के भीतर हूतियों की अपनी राजनीतिक साख भी मजबूत होती है। वे खुद को विदेशी ताकतों से यमन की रक्षा करने वाले नायक के रूप में पेश करते हैं।

सऊदी से टकराव के पीछे हूतियों का मकसद

ईरान की सैन्य और तकनीकी मदद से हूतियों की क्षमता काफी बढ़ी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अंसार अल्लाह के अपने हित खत्म हो गए हैं। यमन में सत्ता के संघर्ष और सऊदी अरब से टकराव के पीछे उसके अपने उद्देश्य भी हैं। हूतियों की हर कार्रवाई को ईरान के आदेश पर उठाया गया कदम मानने से न तो इस संघर्ष की स्थानीय जड़ें समझ आती हैं और न ही हूती नेतृत्व के मकसद।

इस रिश्ते को असमान संसाधनों वाली साझेदारी के रूप में देखना ज्यादा सही होगा। इसमें यमन का हूती पक्ष काफी हद तक अपने फैसले खुद लेता है। सऊदी अरब को कमजोर करना ईरान और हूतियों, दोनों के हित में हो सकता है। लेकिन युद्ध खत्म करने के लिए दोनों की शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं।

अंसार अल्लाह को यमन के मोर्चों पर हालात और अपने शासन के बने रहने की चिंता है। इसलिए, ईरान और दूसरे देशों के बीच किसी समझौते से हूतियों के हमले अपने आप रुक जाएंगे, इसकी गारंटी नहीं है।

युद्ध का अर्थशास्त्र: 15 हजार डॉलर का ड्रोन बनाम 30 लाख डॉलर की मिसाइल

हूतियों ने मिसाइलों के घरेलू उत्पादन और हथियारों के पुर्जे जुटाने के लिए अपना नेटवर्क बढ़ाया है। इससे सऊदी अरब के लिए उनके हमले रोकना और मुश्किल हो गया है। अगर हूती कई स्रोतों से अपने हथियारों का भंडार दोबारा भर सकते हैं, तो सिर्फ ईरान से होने वाली आपूर्ति रोकने का असर सीमित रहेगा।

इसलिए, ईरान के साथ समझौता कर लेना ही सऊदी ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काफी नहीं होगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि हूती खुद अपने हित में हमले जारी रखने के लिए मानते हैं या नहीं।

यमन की राजधानी सना में हूती समर्थक राइफलों के साथAP© file Photo

हूतियों को सऊदी अरब जितने महंगे या भारी हथियारों की जरूरत नहीं है। वे अपनी मर्जी से निशाना चुनते हैं और जब चाहें हमलों के बीच ब्रेक ले लेते हैं। इसके उलट, सऊदी अरब को अपने विशाल इलाके में हर एयरपोर्ट, रिफाइनरी और शहर की 24 घंटे हिफाजत करनी पड़ती है।

सऊदी अरब की मुश्किल यह है कि सैन्य ताकत में बढ़त होने के बावजूद वह अपने विरोधी को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले हमलों से रोक नहीं पाया है। हूती इसी क्षमता को बातचीत में अपनी ताकत बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

सऊदी अरब हर साल सैन्य खर्च पर 82 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करता है। इसके बावजूद उसे अपने बुनियादी ढांचे को हूतियों के हमलों से बचाने में मुश्किल हो रही है। इससे पता चलता है कि सऊदी अरब ने हथियारों पर जितना पैसा खर्च किया है, वे इस खास युद्ध में उतने प्रभावी साबित नहीं हुए हैं।

लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में हथियारों की कीमत का अंतर भी अहम हो जाता है। दिए गए अनुमानों के मुताबिक, एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत 30 लाख डॉलर से ज्यादा है, जबकि हूतियों के कुछ ड्रोन महज 15,000 से 25,000 डॉलर में तैयार हो जाते हैं।

अपने बेहद कीमती ठिकानों को बचाने के लिए सऊदी अरब को इन सस्ते ड्रोनों पर भी महंगे इंटरसेप्टर दागने पड़ते हैं। लेकिन लगातार चलते ऐसे रक्षा अभियानों से मिसाइलों का भंडार तेजी से खाली हो रहा है, जिसकी तुरंत भरपाई करना आसान नहीं है। खासकर तब, जब दुनियाभर में एयर डिफेंस सिस्टम की भारी मांग चल रही हो। यही वजह है कि हूतियों के ज्यादातर ड्रोन भले ही निशाने तक न पहुंच पाएं, फिर भी उन्हें सऊदी के सुरक्षा कवच को थकाने और कमजोर करने का मौका मिल जाता है।

तकनीकी दिक्कतों के साथ सऊदी सेना की संरचना भी एक चुनौती है। सऊदी अरब की नियमित सेना और नेशनल गार्ड को ऐतिहासिक रूप से अलग रखा गया है। इसकी एक वजह राजशाही को तख्तापलट से बचाना भी रही है। लेकिन अलग-अलग कमान व्यवस्था और फैसले लेने की बेहद केंद्रीकृत प्रक्रिया से तालमेल में दिक्कत आ सकती है। इससे सैन्य अधिकारियों की अपने स्तर पर तुरंत फैसला लेने की क्षमता भी सीमित हो सकती है। ऐसे में सिर्फ और हथियार खरीदने से समस्या हल नहीं होगी।

बाहर से कितनी मदद मिल पाएगी?

तुर्किये और पाकिस्तान ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए मदद की बात कही है, लेकिन यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि दोनों देश पूरी तरह युद्ध में उतरेंगे। यमन के अंदर हूतियों के खिलाफ लड़ाई में शामिल होना तो और भी दूर की बात है। 5 अक्टूबर को मक्का समझौते में शामिल पक्षों ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए सैनिक और सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने की बात कही थी। हालांकि, इन वादों का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि सहयोगी देश हमलों की संख्या और उनसे होने वाले नुकसान को कितना कम कर पाते हैं।

तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सऊदी अरब को एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और तकनीकी मदद देने की संभावना जताई है। हालांकि, उन्होंने साफ कर दिया कि तुर्किये दूसरे देशों की जमीन पर हमले करने के लिए अपने सैनिक नहीं भेजेगा। यानी तुर्किये ने शुरुआत से ही अपनी सीमाएं तय कर दी हैं।

पाकिस्तान भी सीधे इस युद्ध में उतरने से बचना चाहेगा। यमन की लड़ाई में शामिल होने का मतलब है सैन्य खर्च बढ़ना और पड़ोसी ईरान के साथ रिश्ते और खराब होने का खतरा। इसलिए यह उम्मीद करना जल्दबाजी होगी कि इस्लामाबाद, रियाद की ओर से हूतियों को हराने की जिम्मेदारी उठा लेगा। सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की प्रतिबद्धताओं के बावजूद उसकी भूमिका कुछ खास ठिकानों की सुरक्षा और सैन्य मदद देने तक सीमित रह सकती है।

अमेरिका के रुख को भी इसी तरह समझने की जरूरत है। खुफिया जानकारी साझा करने और हमलों के लिए ठिकानों की पहचान करने में मदद देने से सऊदी अरब के अभियान को समर्थन मिलता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वॉशिंगटन हूतियों के हमले हर कीमत पर रोकने के लिए तैयार है।

हूती शायद दूसरे देशों की मदद की इन्हीं सीमाओं को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि सऊदी अरब के सहयोगी उसकी रक्षा में मदद तो करेंगे, लेकिन यमन में सऊदी अरब के लक्ष्य हासिल करने के लिए लंबे युद्ध में फंसने से बचेंगे।

जब तक सहयोगियों की मदद से हूतियों के हमलों में बड़ी कमी नहीं आती, तब तक उन्हें साथ लाने की धमकी का अंसार अल्लाह पर खास असर पड़ने की संभावना कम है।

(यह एनालिसिस RT के लिए फरहाद इब्राहिमोव ने लिखा है, जो रूस की RUDN यूनिवर्सिटी में फैकल्टी ऑफ इकनोमिक्स के लेक्चरर हैं। वह रूसी सरकार के अधीन फाइनेंशियल यूनिवर्सिटी के सोशल साइंसेस और मास कम्युनिकेशंस में राजनीति विज्ञान के एक्सपर्ट और लेक्चरर भी हैं।)

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