
दशकों तक तेल के कारोबार में एक ही सिक्का चलता आया है- अमेरिकी डॉलर। तेल खरीदना है, डॉलर में पेमेंट करो। तेल बेचना है, डॉलर में पेमेंट लो। पेट्रो-डॉलर (Petrodollar) के इसी दम पर अमेरिका लंबे अरसे से दुनिया के देशों पर अपनी धौंस जमाता रहा है। लेकिन अब हवा का रुख बदल रहा है। पेट्रो-डॉलर की जमीन खिसक रही है। ईरान युद्ध और होर्मुज में तनाव से गहराए तेल संकट ने डी-डॉलराइजेशन यानी डॉलर के बजाय क्षेत्रीय मुद्रा में व्यापार को नई रफ्तार दे दी है। अगर दुनिया के देश अपनी लोकल करंसी में एनर्जी खरीद रहे हैं, चाहे वह रूस हो, चीन हो या फिर भारत, तो इससे अमेरिका को क्या दिक्कत है? पेट्रो-डॉलर के विकल्प किस तरह तैयार हो रहे हैं? इसमें ब्रिक्स देशों की क्या भूमिका है, आइए समझते हैं।
'पेट्रो-डॉलर का दौर खत्म होने की ओर'
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट कर्नल रोहित देव ने इस सवाल पर RT India से बातचीत में कहा कि पेट्रो-डॉलर का दौर खत्म होने जा रहा है। ये बस कुछ ही वक्त की बात है। इस बदलाव के पीछे सिर्फ ब्रिक्स देश ही नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ ब्राजील, इंडिया, चीन और रूस एकसाथ आकर ये कर रहे हैं। ये नेचुरली हो रहा है, और इसकी एक बड़ी वजह ईरान युद्ध है।
कर्नल देव ने कहा कि इस युद्ध ने लोगों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। आपने ईरानियों को भी सुना होगा, जो कह रहे हैं कि वो अब केवल चीन की करंसी (युआन) में ही लेन-देन करना चाहते हैं। भारत ने भी कई डील में चीनी करंसी में पेमेंट किया है।
भारत खोल रहा पेमेंट के कई रास्ते
कर्नल रोहित देव ने RT से कहा कि भारत पेमेंट के लिए कई तरह के रास्ते खोल रहा है, चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक हो या कोई और तरीका। ऐसे में मुझे यकीन है कि अगर रूस और भारत आज की तरह ही रुपये और रूबल में लेन-देन कर सकते हैं, तो कहना होगा कि पेट्रो-डॉलर खतरे में है।
उन्होंने इसे समझाते हुए कहा कि अगर ईरान अमेरिकी डॉलर से ज्यादा भारतीय रुपये पर भरोसा करता है और रुपये में तेल बेचना चाहता है, तो वह रुपये में ही सौदा करेगा। यह कॉमन सेंस की बात है। आप किसी देश पर अपनी करंसी नहीं थोप सकते। इसलिए कहा जा सकता है कि डॉलर का रुतबा अब खतरे में है।
'पेट्रो-डॉलर का खेल अब पलट चुका'
अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार डॉ. शुभदा चौधरी ने भी RT India से बातचीत में कहा कि अमेरिका का पेट्रो-डॉलर का खेल अब पलट चुका है। अब पेट्रो-युआन बड़ी ताकत के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया अब एक ऐसे दौर में जा रही है, जहां कई तरह की नई व्यवस्थाएं उभर रही हैं। इसमें ब्रिक्स की भूमिका भी बहुत अहम है।
ब्रिक्स देश कैसे बना रहे नया करंसी सिस्टम?
ब्रिक्स देशों के बीच डी-डॉलराइजेशन यानी डॉलर के प्रभाव को कम करने की बहस के बीच बड़ा सवाल ये है कि करंसी सिस्टम को कंट्रोल कौन करता है। क्या ब्रिक्स डॉलर को चुनौती देना चाहता है या फिर इसकी वित्तीय ताकत को?
इस पर जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अतुल अनेजा ने RT से बातचीत में कहा था कि डॉलर के समानांतर सिस्टम बनना पहले ही शुरू हो चुका है। इसकी वजह कुछ देशों द्वारा लगाए जा रहे बेवजह के प्रतिबंध हैं। रुपया-रियाल हो या रुपया-रुबल, कई सिस्टम बन चुके हैं और मजबूत हो रहे है।
पश्चिम व्यापार को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इसे जियोपॉलिटिकल टूल बना दिया गया है। ऐसे में देश अब वित्तीय बैकअप के तरीके ढूंढ रहे हैं। इस पर अतुल अनेजा ने कहा कि ये बात सही है। पहले होर्मुज से व्यापार में पेट्रो डॉलर चलता था। तेल खरीदने के लिए डॉलर का इस्तेमाल होता था। खाड़ी देश इन्हें ट्रेजरी बॉन्ड, एआई सिस्टम, स्टॉक मार्केट में लगाते थे। ये पूरा सिस्टम बना हुआ था। लेकिन अब पैरलल इकोसिस्टम बन रहा है। ये कुछ वक्त की बात है, जल्द ही ये पूरी तरह काम करने लगेगा।







