
अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतें और नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव, इन दो वजहों ने गुजरात के जामनगर में बनी दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के दौरे के केंद्र में ला दिया है। यह रिफाइनरी भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की है।
दिलचस्प बात यह है कि रूबियो जामनगर ऐसे वक्त में जा रहे हैं जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले एलन मस्क और अंबानी के बीच भारत के बाजार में कारोबारी हितों को लेकर खींचतान की चर्चा है।
जामनगर क्यों जा रहे रूबियो?
अमेरिका में डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। इसका सीधा असर ट्रक चालकों, किसानों और माल ढुलाई करने वाले कारोबारियों पर पड़ रहा है और महंगाई बढ़ रही है। ऐसे में ईंधन की बाजार में उपलब्धता और कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए अहम मुद्दा बन गई हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने भी चेतावनी दी है कि डीजल बाजार में सप्लाई की दिक्कतों के कारण अगले साल तक कीमतें ऊंची रह सकती हैं।
SECRETARY RUBIO: I think the President wants to take this 60-day period to analyze what imposing both sanctions and tariffs will mean for the global economy and the U.S. economy. https://t.co/9DXVXnQeb5
— Department of State (@StateDept) October 18, 2026
इसी बीच, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल की सप्लाई को वैश्विक बाजार में जारी रखने के लिए इसी महीने रूसी तेल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी। इससे साफ पता चलता है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और उनकी सप्लाई को लेकर अमेरिका मुश्किल में है।
ऐसे माहौल में जामनगर की अहमियत बढ़ जाती है। रिलायंस के मुताबिक, यहां स्थित उसका रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स दुनिया का सबसे बड़ा और जटिल एकल-स्थल रिफाइनरी परिसर है। इसकी कच्चे तेल को रिफाइन करने की क्षमता प्रतिदिन करीब 14 लाख बैरल है। यहां कच्चे तेल को डीजल समेत कई तरह के पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स में बदला जाता है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग रहती है।
ट्रंप चुनाव से पहले क्यों करना चाहते हैं डील?
मार्च 2026 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविल में ‘अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग’ प्रोजेक्ट के लिए भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ 300 अरब डॉलर की साझेदारी की घोषणा की थी।
इस निवेश से अमेरिका में नई रिफाइनरी बनने, रोजगार पैदा होने और ईंधन की सप्लाई बढ़ने की उम्मीद है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार रोबिंदर सचदेव ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, 'मेरे हिसाब से रूबियो जामनगर दौरे में रिलायंस के साथ अमेरिका में रिफाइनरी लगाने के निवेश समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश करेंगे। प्रोजेक्ट के तहत 300 अरब डॉलर निवेश का आंकड़ा बहुत बड़ा है। यह सिर्फ रिफाइनरी में होने वाला निवेश नहीं है। रिफाइनरी में निवेश करीब 5 अरब डॉलर हो सकता है।'
रोबिंदर सचदेव का मानना है कि इससे टेक्सास में सीनेट चुनाव लड़ रहे रिपब्लिकन उम्मीदवार को भी प्रचार के लिए एक मुद्दा मिल जाएगा। वह मतदाताओं से कह सकेंगे कि उनकी कोशिशों से भारत की रिलायंस कंपनी बड़ा निवेश लेकर आ रही है।
सचदेव के मुताबिक, टेक्सास के ब्राउन्सविल में जहां यह रिफाइनरी स्थापित की जानी है, वहां बड़ी संख्या में लैटिन अमेरिकी मूल के वोटर्स और कंस्ट्रक्शन मजदूर रहते हैं।
उन्होंने कहा, 'ऐसे में संभव है कि अमेरिकी प्रशासन इस रिफाइनरी की घोषणा कर राजनीतिक फायदा उठाना चाहता है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर इस दौरे के दौरान कितनी प्रगति होगी, यह कहना मुश्किल है। लेकिन मुझे लगता है कि रूबियो की यात्रा का मुख्य मकसद रिलायंस के टेक्सास रिफाइनरी में निवेश को अंतिम रूप देना और इसकी आधिकारिक घोषणा करवाना हो सकता है।'
एक तरफ मस्क-अंबानी विवाद, दूसरी तरफ रिलायंस से नजदीकी
इस पूरे घटनाक्रम में ट्रंप के करीबी सहयोगी, अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क का नाम भी चर्चा में है। स्पेसएक्स और स्टारलिंक के संस्थापक मस्क ने भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की शुरुआत में हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कुछ कारोबारी समूह अपना दबदबा बनाए रखने के लिए कंपनी का रास्ता रोक रहे हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मुकेश अंबानी को निशाने पर लेते हुए सवाल किया कि क्या अंबानी भारत के 'असली बॉस' हैं? मस्क का आरोप था कि स्टारलिंक भारत में सेवा शुरू करने के लिए लंबे समय से नियमों का पालन कर रही है, फिर भी उसे आगे बढ़ने की इजाजत नहीं मिल रही।

भारत सरकार ने मस्क के आरोपों को खारिज किया है। संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि स्टारलिंक सहित तीन कंपनियों को सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए लाइसेंस मिल चुका है, लेकिन कमर्शियल सर्विस शुरू करने के लिए सुरक्षा संबंधी मंजूरियां और स्पेक्ट्रम आवंटन जैसी प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं। सरकार का कहना है कि नियम सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं।
स्टारलिंक को लेकर भारत की चिंताएं
स्टारलिंक को भारत की सबसे बड़ी चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा पर नियंत्रण को लेकर है। सैटेलाइट इंटरनेट में डेटा का रास्ता सामान्य मोबाइल नेटवर्क से अलग हो सकता है।
सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा एजेंसियां संचार की निगरानी कर सकें, कानूनी आदेशों के मुताबिक डेटा हासिल कर सकें और किसी संवेदनशील इलाके में सेवा को रोकने या सीमित करने के निर्देश लागू करवा सकें।
इसके लिए भारत में जरूरी नेटवर्क ढांचा, स्थानीय स्तर पर डेटा मैनेजमेंट और निगरानी की व्यवस्था को लेकर नियम तय किए गए हैं।
सरकार की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के पीछे कुछ पुराने मामले भी हैं। नवंबर 2024 में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में नशीले पदार्थों की तस्करी से जुड़े एक मामले में पकड़ी गई नाव से स्टारलिंक मिनी डिवाइस मिलने की खबर आई थी। जांच में पता चला कि म्यांमार के तस्कर समंदर में रास्ता ढूंढने के लिए स्टारलिंक का इस्तेमाल कर रहे थे।
इसके बाद दिसंबर 2024 में मणिपुर में सुरक्षा बलों को एक ऑपरेशन के दौरान स्टारलिंक के लोगो वाला उपकरण मिला। इन घटनाओं ने विदेशी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के दुरुपयोग और उन पर निगरानी रखने से जुड़े सवाल उठाए हैं। सरकार इन सभी चिंताओं पर आश्वस्त हुए बिना आगे नहीं बढ़ना चाहती।
इन देशों में भी स्टारलिंक को लेकर है विवाद
स्टारलिंक को लेकर चिंताएं सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में हैं-

यह सब देखते हुए भारत सरकार स्टारलिंक की कमर्शियल मंजूरी जल्दबाजी में नहीं देना चाहती।







