गलवान संघर्ष से चीन को क्या समझ में आ गया? जनरल नरवणे का Exclusive इंटरव्यू
RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में जनरल नरवणे ने गलवान संघर्ष से मिले सबक, सीमा विवाद की जड़ और दोनों देशों के बीच जारी बातचीत पर विस्तार से बात की।
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गलवान संघर्ष से चीन को क्या समझ में आ गया? जनरल नरवणे का Exclusive इंटरव्यू
जनरल नरवणे की RT इंडिया से खास बातचीत

भारत और चीन के रिश्तों में तनाव की एक बड़ी वजह सीमा विवाद रहा है। जून 2020 में गलवान घाटी में हुए संघर्ष ने इस विवाद को एक नया मोड़ दिया। अब भारत और चीन के बीच रिश्तों को स्थिर करने और सीमा पर तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक बातचीत जारी है। भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे का मानना है कि गलवान संघर्ष से चीन को यह समझ आया कि सैन्य ताकत के इस्तेमाल से सीमा विवाद का समाधान नहीं निकाला जा सकता। इसका रास्ता बातचीत और कूटनीति से ही निकलेगा। RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में नरवणे ने गलवान संघर्ष से मिले सबक, सीमा विवाद की जड़ और दोनों देशों के बीच जारी बातचीत पर विस्तार से बात की।

गलवान से चीन ने क्या सीखा?

गलवान संघर्ष से मिले सबक के बारे में पूछे जाने पर जनरल नरवणे ने कहा कि रणनीतिक स्तर पर सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी स्थिति को हल्के में नहीं लेना चाहिए। दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही हो, तब भी सुरक्षा के मोर्चे पर सतर्कता बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, उनके मुताबिक इस संघर्ष से भारत के मुकाबले चीन ने ज्यादा बड़ा सबक सीखा है।

जनरल एमएम नरवणे
चीन ने समझ लिया कि सीमा विवाद को सुलझाने के लिए सैन्य विकल्प अब रास्ता नहीं है। इसे सैन्य तरीके से हल नहीं किया जा सकता।
जनरल एमएम नरवणे
जनरल एमएम नरवणे
भारत के पूर्व सेना प्रमुख

उनके मुताबिक, गलवान संघर्ष से निकला सबसे बड़ा सबक यही है कि सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कूटनीतिक माध्यमों और बातचीत को आगे बढ़ाना होगा।

भारत-चीन सीमा विवाद में समस्या क्या है?

नरवणे ने भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की बुनियादी समस्या समझाते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा का पूरी तरह निर्धारण नहीं हुआ है। उन्होंने बाउंड्री और बॉर्डर के बीच अंतर पर जोर दिया। उनके मुताबिक, दोनों शब्दों का इस्तेमाल अक्सर एक-दूसरे की जगह किया जाता है, जबकि दोनों देशों के बीच वास्तविक समस्या सीमा के निर्धारण की है।

उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच सीमा स्पष्ट रूप से चिह्नित नहीं है। इसे दोनों देशों ने द्विपक्षीय रूप से अंतिम रूप देकर औपचारिक मंजूरी भी नहीं दी है। जब तक सीमा विवाद का समाधान नहीं होता, तब तक दोनों देशों के बीच अलग-अलग इलाकों में तनाव और टकराव की आशंका बनी रहेगी।

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NSA स्तर की बातचीत से क्या उम्मीद जगी?

जनरल नरवणे ने कहा कि भारत और चीन के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) स्तर की हालिया बातचीत में सीमा विवाद के समाधान का मुद्दा फिर से प्राथमिकता के तौर पर सामने आया है। उन्होंने इसे सकारात्मक संकेत बताया। उनके मुताबिक, लंबे समय बाद सीमा निर्धारण का मुद्दा भी चर्चा में आया है। किसी भी सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में यह पहला कदम होता है। नरवणे को उम्मीद है कि इस मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ने से भविष्य में सकारात्मक नतीजे सामने आ सकते हैं।

हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि बातचीत और सीमा पर तनाव में कमी का मतलब यह नहीं है कि भारत को अपनी सतर्कता कम कर देनी चाहिए।

RT इंडिया की एक्सक्लूसिव बातचीत

बातचीत से जवानों की जिम्मेदारी नहीं बदलती

भारत और चीन के बीच रिश्ते सामान्य करने की कोशिशों का लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तैनात जवानों पर क्या असर पड़ता है? इस सवाल पर नरवणे ने स्पष्ट किया कि कूटनीतिक स्तर पर होने वाली बातचीत से जमीन पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारियां नहीं बदलतीं। उन्होंने कहा कि जवानों को पहले की तरह सीमा की सुरक्षा करनी होती है, निगरानी रखनी होती है और गश्त जारी रखनी होती है। दोनों देशों के बीच बातचीत चलने से सैनिकों के रोजमर्रा के काम पर बहुत कम असर पड़ता है। हालांकि, उनके मुताबिक, यह अच्छी बात है कि दोनों देश बातचीत कर रहे हैं।

नरवणे ने जोर दिया कि भारत को सीमा पर सतर्क रहना होगा। तनाव कम होने और बातचीत आगे बढ़ने के बावजूद सुरक्षा के मोर्चे पर किसी तरह की लापरवाही नहीं बरती जा सकती।

चीन से प्रतिस्पर्धा, पर हर मुद्दे पर टकराव जरूरी नहीं

भारत और चीन के रिश्तों पर बात करते हुए नरवणे ने कहा कि दोनों बड़े देशों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। व्यापार, अर्थव्यवस्था, संसाधनों पर नियंत्रण और अफ्रीका में निवेश जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं। उनके मुताबिक, इस प्रतिस्पर्धा को हमेशा दुश्मनी के नजरिये से देखने की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा कि सीमा विवाद दोनों देशों के रिश्तों को एक अलग आयाम देता है, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं को इससे अलग रखकर भी देखा जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पर्यावरण और वैश्विक उत्सर्जन जैसे मुद्दों का जिक्र किया, जिन पर भारत और चीन के हित कई मामलों में एक जैसे हैं।

नरवणे के मुताबिक, यदि हर मुद्दे को टकराव के नजरिये से देखा जाएगा, तो बातचीत और सहयोग की गुंजाइश कम हो जाएगी। मतभेदों के बावजूद दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहना चाहिए।

चीन पर कही बड़ी बात

जनरल नरवणे की बातों से स्पष्ट है कि भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव कम करने के लिए बातचीत जरूरी है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा के मोर्चे पर सतर्कता भी बनाए रखनी होगी। गलवान संघर्ष से मिले सबक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सैन्य ताकत सीमा विवाद का स्थायी समाधान नहीं दे सकती। इसके लिए दोनों देशों को कूटनीतिक बातचीत और सीमा निर्धारण की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

उनके मुताबिक, भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सीमा विवाद को समझते हुए अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन हर क्षेत्र में टकराव को रिश्तों का आधार नहीं बनने देना चाहिए।

यहां देखें पूरी बातचीत-

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