तेल पर ट्रंप का गजब खेल: दूसरों पर टैरिफ और अपनी टंकी फुल
अमेरिका ने रूस से डीजल खरीदने को लेकर समझौता किया है। इसके पीछे उसकी कई मजबूरियां हैं। ये वही अमेरिका है, जो रूस से तेल खरीदने पर दूसरे देशों पर टैरिफ का चाबुक चलाता है।
तेल पर ट्रंप का गजब खेल: दूसरों पर टैरिफ और अपनी टंकी फुल
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ग्लोबल डिप्लोमेसी में दूसरों को उपदेश देने और अपना काम निकालने के बीच का फासला कितना बारीक होता है, इसका सबसे ताजा उदाहरण अमेरिका की सियासत है। कल तक जिस रूस से तेल खरीदना वॉशिंगटन की नजर में 'रूस की मदद करना' और 'आर्थिक अपराध' था, आज वही रूसी तेल अमेरिका की मजबूरी बन चुका है।

मध्यावधि चुनावों की दहलीज पर खड़े अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जब घरेलू राजनीति और महंगाई की मार परेशान करने लगी तो उन्होंने रूस से डीजल खरीदने में देर नहीं लगाई। दूसरों की जरूरतों पर पाबंदियों का हंटर चलाने वाले अमेरिका का यह कदम उसकी विदेश नीति के उस चरित्र को उजागर करता है, जहां सिद्धांत केवल दुनिया को नसीहत देने के लिए गढ़े जाते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें चुपचाप किनारे रख दिया जाता है।

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जब भारत अपनी सवा अरब आबादी की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदता है, तो पश्चिम से उसे 'आक्रामकता का पोषण' करार दिया जाता है, लेकिन जब अमेरिकी पंपों पर डीजल के दाम से घरेलू चुनावों का समीकरण बिगड़ने लगता है, तो वही रूसी तेल 'राष्ट्रहित' बन जाता है।

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भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए 100 पर्सेंट तक टैरिफ थोपने का कानून बनाने वाले अमेरिका की कथनी और करनी का अंतर एक बार फिर खुलकर सामने आया है। 

रूस से डीजल खरीदने की डील

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल खरीदने की डील का ऐलान किया है। यह कदम यूक्रेन संघर्ष को लेकर मॉस्को पर अमेरिकी दबाव की बरसों पुरानी नीति में एक बड़ा बदलाव है। इसका फौरी मकसद अमेरिका में मध्यावधि चुनावों से पहले तेल की ऊंची कीमतों की समस्या को हल करना है। ट्रंप ने भारतीय समयानुसार शुक्रवार देर रात सोशल मीडिया पर बताया कि उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर बातचीत के दौरान यह समझौता किया।

बातचीत के बाद ट्रंप ने बताया कि रूस तुरंत 3 लाख टन से अधिक डीजल की सप्लाई करेगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और उसके तुरंत बाद 10 लाख टन डीजल की सप्लाई की जाएगी। उन्होंने लिखा कि इसके बाद रूस कुछ ही समय के भीतर अतिरिक्त 30 लाख टन डीजल की सप्लाई करेगा।

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डीजल खरीदना ट्रंप की मजबूरी क्यों?

ईरान में चल रहे युद्ध की वजह से एनर्जी सेक्टर में उथल-पुथल मची है। दुनिया भर में गैस की कीमतें बढ़ गई हैं। अमेरिका में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। ऐसे में ट्रंप यूरोपीय यूनियन से लेकर रूस तक डीजल के लिए हाथ फैला रहे हैं।

दबाव का दांव फेलः डीजल की कीमतों को कम करने में मदद के लिए अमेरिका ने कुछ दिन पहले ही G7 से समझौता किया है। समझौते के बाद जी7 देश अगले 4 महीने में 10 करोड़ बैरल तक डीजल और तेल का रिजर्व जारी करेंगे। यूएस मिड टर्म इलेक्शन के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय देशों को अपना ऑयल रिजर्व मार्केट में जारी करने का दबाव डालना शुरू किया था।

डीजल 70% तक महंगाः ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका में डीजल की कीमतों में 70% की बढ़ोतरी हो चुकी है। US में मोटर क्लब AAA के अनुसार, 22 सितंबर को अमेरिका में एक गैलन डीजल की कीमत $6.53 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। शुक्रवार को इसकी औसत कीमत लगभग $6.28 प्रति गैलन थी, जबकि पिछले साल इसी समय यह लगभग $3.68 थी। यूरोप में भी डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं।

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महंगाई की मारः डीजल की कीमतें बढ़ने का मतलब है रोजमर्रा की कई चीज़ों के ट्रांसपोर्टेशन का महंगा होना। ऐसा इसलिए क्योंकि डीजल का इस्तेमाल कई तरह के माल ढुलाई और डिलीवरी नेटवर्क में किया जाता है। और कुछ कंपनियों ने तो बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालना भी शुरू कर दिया है। वे ऑनलाइन ऑर्डर और डाक से भेजे जाने वाले पैकेजों पर अतिरिक्त शुल्क ले रही हैं।

डीजल क्यों जरूरीः अमेरिकी जनता पर महंगे डीजल की सीधी मार पड़ रही है। खासकर किराने का सामान खरीदते समय उन्हें ज्यादा रकम चुकानी पड़ रही है। मीट और ताज़ी उपज जैसी जल्दी खराब होने वाली चीजों पर सबसे अधिक और तुरंत असर होता है, क्योंकि इन्हें बार-बार लाने और स्टॉक करने की जरूरत होती है। ये काम ट्रकों से किया जाता है, जो डीजल से चलते हैं। फसलों की कटाई-छंटाई में ऐसे खेती के उपकरणों का इस्तेमाल होता है जो इसी फ्यूल से चलते हैं।

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डीजल पाबंदी में 6 महीने के लिए छूट

US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने रूस डीजल फ्यूल पर लगी पाबंदियों में छह महीने के लिए ढील देने का फैसला किया है। ट्रंप के ऐलान के कुछ ही समय बाद, ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा कि वह तुरंत एक अस्थायी लाइसेंस जारी कर रहा है, जिससे रूसी डीजल की सप्लाई ग्लोबल मार्केट में की जा सकेगी।

इस साल की शुरुआत में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से रूसी फ़्यूल शिपमेंट के बारे में US ट्रेजरी द्वारा जारी किया गया यह सबसे नया लाइसेंस है। हालांकि, फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह पहला ऐसा लाइसेंस है जो डीजल पर लगी पाबंदियों में आम तौर पर मिलने वाली 30 दिन की छूट से अधिक समय के लिए ढील देता है।

इस लाइसेंस का मतलब है कि शुक्रवार तक टैंकरों में लोड किए गए रूसी डीजल की डिलीवरी पर अप्रैल 2027 तक U.S. की पाबंदियां लागू नहीं होंगी। इस छूट से पता चलता है कि ईरान युद्ध के असर ने मॉस्को की एनर्जी एक्सपोर्ट से मुनाफा कमाने की क्षमता को कैसे बढ़ाया है।

क्रूड का रिकॉर्ड उत्पादन तो डीजल की कमी क्यों?

अमेरिका इस वक्त पहले से कहीं अधिक क्रूड ऑयल प्रोड्यूस कर रहा है। वह कच्चे तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है। एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, अमेरिका में कच्चे तेल का प्रोडक्शन 2026 में औसतन रिकॉर्ड 13.8 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंचने की राह पर है। EIA के लेटेस्ट डेटा के अनुसार यह एक साल पहले के मुकाबले 3,50,000 bpd (बैरल प्रति दिन) अधिक है।

अमेरिका में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, जबकि डीजल का स्टॉक असामान्य रूप से कम बना हुआ है। EIA का अनुमान है कि 2027 के अधिकतर समय तक यह स्टॉक पांच साल की रेंज से नीचे रहेगा। दो दशकों से अधिक समय में पहली बार स्टॉक 100 मिलियन बैरल से नीचे गिर जाएगा। पहली नजर में, यह बात विरोधाभासी लगती है। अगर अमेरिका के पास पहले से कहीं अधिक तेल है, तो रिफाइनर अधिक डीजल क्यों नहीं बना सकते?

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रिफाइनरी में डीजल बनाने की सीमित क्षमता

कच्चा तेल और डीजल दरअसल एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल होने वाली चीजें नहीं हैं। क्रूड ऑयल से डीजल, पेट्रोल, जेट फ्यूल, हीटिंग ऑयल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट बनते हैं। ये काम रिफाइनरियों में होता है। किसी देश में कच्चे तेल का रिकॉर्ड उत्पादन हो सकता है, लेकिन रिफाइन किए गए प्रोडक्ट की बाजार में कमी भी हो सकती है। अमेरिका में अभी ऐसा ही हो रहा है। इसका गणित समझिए।

अमेरिकी रिफाइनरियों में प्रोसेस किए जाने वाले एक बैरल कच्चे तेल में करीब 42 गैलन तेल होता है। इसकी प्रोसेसिंग से लगभग 19-20 गैलन गैसोलीन निकलता है और 11 से 13 गैलन अल्ट्रा-लो-सल्फर डीजल बनता है। इसमें से अधिकतर डीजल या हीटिंग ऑयल बनता है। बाकी बचे हिस्से से जेट फ्यूल, पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक, डामर, पेट्रोलियम कोक और दूसरे प्रोडक्ट तैयार होते है।

ये अनुपात थोड़े-बहुत बदल सकते हैं क्योंकि रिफाइनरी की परिस्थितियों में अंतर रहता है। अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस करने का तरीका भी अलग रहता है। बाजार की जरूरतों के हिसाब से काम करते हैं। लेकिन जो रिफाइनरी कच्चे तेल से लगभग 30% डीजल बनाने के लिए बनाई गई है, वह सिर्फ जरूरत पड़ने पर उस हिस्से को दोगुना नहीं कर सकती। यही वजह है कि 2025 में, US की रिफाइनरी से मिलने वाले कुल प्रोडक्शन में डीजल का हिस्सा लगभग 30% था, जबकि तैयार गैसोलीन का हिस्सा लगभग 46% था।

तूफान ने भी दिया झटका, प्रोडक्शन बंद

तूफान इसैयास से अमेरिका के गल्फ इलाके में तेल का प्रोडक्शन पर बहुत बुरा असर पड़ा है। मरीन मिनरल्स एडमिनिस्ट्रेशन की ताजा रिपोर्ट बताती है कि लगभग 1.46 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) प्रोडक्शन बंद हो गया है। यह गल्फ में तेल के मौजूदा उत्पादन का 71.51% है। 

तीन दिन पहले 185,120 bpd की कटौती शुरू हुई थी, जो अब बढ़कर 1,458,814 bpd तक पहुंच गई है। सिर्फ तेल ही नहीं, 1.26 बिलियन क्यूबिक फीट प्रति दिन प्राकृतिक गैस प्रोडक्शन का भी नुकसान हो रहा है, जो गल्फ में गैस उत्पादन का 58.84% है।

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अगर रूस अब डीजल का एक्सपोर्ट फिर से शुरू करने की स्थिति में है, तो इससे ग्लोबल डीजल की कीमतों को स्थिर करने में मदद मिलेगी। हालांकि, कुल मिलाकर कीमतें अधिक बनी रहने की आशंका है क्योंकि मिडिल ईस्ट में रिफाइनिंग की बहुत सारी क्षमता वर्ल्ड मार्केट के लिए उपलब्ध नहीं है। ऐसा US-ईरान के बीच चल रहे तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावटों की वजह से हो रहा है।
डैनियल स्टर्नॉफ
डैनियल स्टर्नॉफ
सीनियर फेलो, कोलंबिया सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी

दूसरों पर 100% टैरिफ, अपने लिए छूट  

डोनाल्ड ट्रंप की ये घोषणा इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि पिछले महीने ही उन्होंने लिंडसे ग्राहम सैंक्शंस एक्ट  नाम से एक कानून बनवाया है, जिसके तहत रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले भारत, चीन जैसे देशों पर वह 100 तक टैरिफ लगा सकते हैं। इस कानून का एक पहलू ये है कि इसमें रूस से तेल खरीदने वाले टॉप देशों पर एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने का जिक्र है, लेकिन अमेरिका को लेकर कुछ नहीं कहा गया है।     

इसमें उन देशों को भी छूट दी गई है जो रूस के नेचुरल गैस 15% से कम इंपोर्ट करते हैं। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति को ये अधिकार भी दिया गया है कि वह चाहें तो प्रक्रिया का पालन करके टैरिफ से देशों को छूट भी दे सकते हैं।  

U.S. एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, 2022 में यूक्रेन पर रूस की सैन्य कार्रवाई के बाद बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ से बैन लगाए जाने के बाद से अमेरिका ने रूस से तेल या गैस का इंपोर्ट नहीं किया है।

ट्रंप की लोकप्रियता में सबसे निचले स्तर पर

रूस से तेल खरीदना अमेरिका की इसलिए भी मजबूरी बन गई क्योंकि मध्यावधि चुनाव में ट्रंप और उनकी पार्टी की रेटिंग निचले स्तर पर पहुंच गई है। ये चुनाव जीतना रिपब्लिकन पार्टी के लिए जरूरी है, वरना संसद में उनका बहुमत नहीं रह पाएगा। ट्रंप जनता को लुभाने के लिए हर दांव आजमा रहे हैं। 

पिछले सप्ताह जारी AP-NORC पोल के अनुसार, अर्थव्यवस्था के मामले में राष्ट्रपति की लोकप्रियता रेटिंग नए निचले स्तर पर पहुंच गई है। इसकी प्रमुख वजह है कि ईरान युद्ध पर भारी-भरकम खर्च को लेकर जनता की नाराजगी, इस युद्ध की वजह से बढ़ी महंगाई और अन्य देशों के साथ ट्रंप का रवैया।

रॉयटर्स/इप्सोस के एक सर्वे में वोटरों ने महंगाई को सबसे अहम चुनावी मुद्दा बताया है। डीजल की ऊंची कीमतों का खासतौर पर रिपब्लिकन पार्टी के पारंपरिक वोटरों - किसानों, ट्रक ड्राइवरों और ग्रामीण इलाकों के वोटरों पर दबाव पड़ा है। पोल के अनुसार, ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग उनके करियर के सबसे निचले स्तर 32% पर पहुंच गई है।

इन्हीं वजहों से ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस में अपनी मामूली बढ़त को बचाए रखना मुश्किल हो गया है। मध्यावधि चुनावों से पहले बढ़ती कीमतों को संभालने के लिए ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी पर दबाव बढ़ गया है।

US में H-1B वीजा प्रोग्राम पर सख्ती

चुनावों में वोटरों का दिल जीतने के लिए ट्रंप हर तरह का दांव फेंक रहे हैं। महंगाई घटाने के उपायों से लेकर स्थानीय लोगों को रोजगार दिलाने के वादे कर रहे हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ समय में उन्हें विदेशी कामगारों खासकर H-1B वीजा पर नौकरी के लिए अमेरिका आने वाले विदेशी वर्करों पर कई तरह की पाबंदियों का ऐलान किया है। 

सबसे हालिया घोषणा 8 बड़ी टेक कंपनियों पर H-1B वीजा प्रोग्राम के जरिए लाए जाने वाले विदेशी टेक प्रोफेशनल्स को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) में हिस्सा लेने से रोकने का है। इससे इन कर्मचारियों के लिए अमेरिका में स्थायी नौकरी का रास्ता मुश्किल हो जाएगा।  

ग्रीन कार्ड चाहने वाले H-1B वीजा होल्डर्स पर असर डालने वाली पाबंदियां भी लगाई हैं।  H-1B वर्कर्स स्किल्ड प्रोफेशनल हैं जिन्होंने अमेरिकन इकोनॉमी में अहम योगदान दिया। PERM ने इकोनॉमिक इनोवेशन में अमेरिका को ग्लोबल लीडरशिप बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।

तेल की कीमतों पर पड़ेगा असर?

अब एक सवाल ये है कि ट्रंप और रूस के बीच इस डीजल डील का अमेरिका और दुनिया में तेल की कीमतों पर कितना असर पड़ेगा? सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के एनर्जी स्ट्रैटेजिस्ट और एक्सपर्ट क्लेटन सीगल का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि इसका ज्यादा फायदा होगा। सीगल के मुताबिक, यह नई डील रूस और पुतिन के लिए फायदेमंद है, जो अभी अपने समर-ग्रेड डीजल को हटाकर अधिक भारी विंटर और आर्कटिक ग्रेड डीजल लेना चाहते हैं, जिसकी उन्हें आने वाले महीनों में जरूरत होगी।

एनर्जी पॉलिसी रिसर्च फाउंडेशन के माइकल लिंच कहते हैं, ‘यह टाइटैनिक जहाज पर डेक पर कुर्सियों को इधर-उधर करने जैसा ही है।’ उनके मुताबिक, अमेरिका के रूस से डीजल लेने का एक मतलब यह होगा कि उसके मौजूदा ग्राहकों को डीजल नहीं मिल पाएगा और उन्हें कहीं और जाना होगा। इससे कीमतें लगभग वहीं बनी रहेंगी जहां अभी हैं।

कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि डीजल जैसे रिफाइंड प्रोडक्ट्स का स्तर अभी भी युद्ध से पहले के स्तर का मुश्किल से आधा है। इसलिए, भले ही रूस वर्ल्ड मार्केट में थोड़ा और डीजल सप्लाई करे, तो इससे कीमतों में थोड़ी राहत तो मिल सकती है, लेकिन कीमतें बहुत अधिक कम नहीं होंगी।

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