
'स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और इसने भारत सरकार के हर नियम और जरूरत को पूरा करने में पांच साल बिताए हैं, तो फिर अभी तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला? दुर्भाग्य से, हमें (Starlink) कुछ खास अमीर उद्योगपतियों (ओलिगार्क्स) द्वारा रोका जा रहा है ताकि वे भारतीय लोगों पर अपना एकाधिकार बनाए रख सकें। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं... यह भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है।'
ये शब्द (आरोप) SpaceX के फाउंडर और CEO एलन मस्क के हैं। उन्होंने ये बातें हाल ही में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के जरिये कही हैं। दरअसल, इन बातों के जरिये मस्क अपने दर्द को दिखा रहे हैं लेकिन सच्चाई से मुंह भी मोड़ रहे हैं। स्टारलिंक की एंट्री पर चर्चा के बीच सरकार यह क्लियर कर चुकी है कि नियमों के अंतर्गत प्रोसेस चल रहा और इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। अब दूसरी तस्वीर देखते हैं।
BYD को लेकर US का दोहरा रवैया
अमेरिका में, जब सिक्योरिटी का एक नियम मस्क की इलेक्ट्रिक कंपनी टेस्ला को विदेशी कंपनियों के साथ कंपटीशन से बचाता है, तब मस्क कुछ नहीं बोलते हैं। हां, चीन की कंपनी BYD दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनी है। दुनिया के 121 देशों में कंपनी अपनी इलेक्ट्रिक कारें बेचती है। हैरानी की बात है कि अमेरिका में कंपनी की एक भी कार नहीं बिकती है। वजह है ट्रंप और अमेरिका का डबल स्टैंडर्ड।
ट्रंप प्रशासन ने BYD कंपनी पर 100 फीसदी टैरिफ तो लगाया ही है, साथ ही सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कार में लगे चीनी सॉफ्टवेयर पर भी बैन लगा दिया। ऐसे में अगर कंपनी 100 फीसदी टैरिफ देने को तैयार हो जाए, तो भी वह अमेरिका में अपनी कार नहीं बेच सकती है।
ट्रंप प्रशासन की तरफ से यह कदम सिर्फ और सिर्फ संरक्षणवाद (Protectionism) के तहत उठाया गया है। ट्रंप अमेरिकी कंपनियों, अमेरिकी फैक्ट्रियों, अमेरिकी वर्कर्स और अमेरिकी की ईवी इंडस्ट्रीज को बचाना चाहते हैं। ऐसे में इसका पूरा फायदा टेस्ला को मिल रहा है।
मस्क पर ट्रंप की मेहरबानी
अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक दिन पहले ही मस्क को नेशनल मेडल ऑफ साइंस से सम्मानित किया है। ट्रंप ने उन्हें 'आज के समय का थॉमस एडिसन' कह दिया। ट्रंप ने टेस्ला को बीते 75 साल में पहली सफल नई कार निर्माता कंपनी भी बताया। वह टेस्ला को कमर्शियली सफल इलेक्ट्रिक कारें और कंज्यूमर के लिए सेल्फ-ड्राइविंग टेक्नोलॉजी बनाने का क्रेडिट दे चुके हैं।
अंदर की बात ये है कि ट्रंप के टेस्ला प्रेम की कीमत चीन की इलेक्ट्रिक कार कंपनी चुका रही है।

बैन की क्रोनोलॉजी: 2018 में हुवावे फिर ZTE
वाइट हाउस ने 2018 में आधिकारिक तौर पर चीनी कंपनियों ZTE और हुआवेई के हार्डवेयर के सरकारी इस्तेमाल पर रोक लगा दी। इसमें स्मार्टफोन, राउटर और इसी तरह के दूसरे डिवाइस शामिल थे। ट्रंप प्रशासन का यह कदम इन दोनों कंपनियों और उनके हार्डवेयर से कथित राष्ट्रीय सुरक्षा को हो सकने वाले संभावित खतरों को देखते हुए उठाया गया है। यह बैन राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से उस समय साइन किए गए 716 अरब डॉलर के रक्षा नीति बिल का हिस्सा था।
TikTok पर कानून बनाकर रोक
अमेरिका में टिकटॉक (TikTok) पर प्रतिबंध किसी एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) से नहीं, बल्कि संसद (U.S. Congress) की तरफ से पारित सख्त संघीय कानून, अदालती मुकदमों और राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा की प्रक्रिया के तहत लगा। इस कानून का स्वरूप 'डायरेक्ट' न होकर 'प्रतिबंध' का था। अमेरिकी संसद ने Protecting Americans from Foreign Adversary Controlled Applications Act पारित किया। 24 अप्रैल 2024 को जो बाइडेन के साइन के बाद यह कानून बना।
americanbar.org की रिपोर्ट के अनुसार इस कानून के तहत टिकटॉक की मूल चीनी कंपनी ByteDance को निर्देश दिया गया कि वह तय समय सीमा के भीतर टिकटॉक के अमेरिकी कारोबार का मालिकाना हक किसी गैर-विदेशी प्रतिद्वंद्वी (गैर-चीनी) कंपनी को बेच दे। कंपनी ऐसा करने में फेल रही, तो Apple App Store, Google Play Store और अमेरिकी वेब होस्टिंग सेवाओं के लिए टिकटॉक को होस्ट या अपडेट करना गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
इसी तर्ज पर SMIC और YMTC पर भी अमेरिकी वाणिज्य विभाग (U.S. Department of Commerce) के ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड सिक्योरिटी (BIS) द्वारा रोक लगाई गई है। दोनों कंपनियों को अमेरिका की 'एंटिटी लिस्ट' (Trade Blacklist) में डाला गया है। इससे अमेरिकी कंपनियां या अमेरिकी तकनीक इस्तेमाल करने वाली कंपनियां बिना विशेष सरकारी लाइसेंस के इन्हें कोई भी एडवांस उपकरण, सॉफ्टवेयर या तकनीक नहीं बेच सकतीं। YMTC चीन की सबसे बड़ी फ्लैश मेमोरी कंपनी है।
ड्रोन बनाने वाली कंपनी DJI ड्रोन और एरियल टेक से जुड़ी है। अमेरिका ने कंपनी पर सरकारी खरीद पर रोक और अमेरिकी कंपोनेंट्स खरीदने पर पाबंदियां लगाई है। इसके अलावा जापान की निप्पॉन स्टील पर US Steel के अधिग्रहण प्रस्ताव पर राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू उत्पादन की रक्षा का हवाला देकर भारी राजनीतिक विरोध व जांच चल रही है।

स्टारलिंक पर क्यों कर रहे सोशल बुलीइंग?
स्पेसX के फाउंडर और CEO मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत में सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सर्विस देना चाहती है। मस्क के अनुसार कंपनी की तरफ से पिछले 5 साल से इस संबंध में काम किया जा रहा है। वहीं, सुरक्षा नियमों से जुड़े प्रोसेस पूरे नहीं होने की वजह से अभी तक कंपनी को अंतिम मंजूरी नहीं मिल पाई है। मंजूरी में देरी को लेकर ही एलन मस्क पिछले तीन दिन से एक के बाद एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ट्वीट कर रहे हैं।

मस्क को यह समझना चाहिए कि अमेरिका की तरह भारत भी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। लेकिन मस्क भारत की सुरक्षा चिंताओं को समझने, नियमों को मानने की जगह सोशल मीडिया कैंपेन चलाने लगे है। दरअसल, पूरा मामला लाइसेंस, सुरक्षा मंजूरी, स्पेक्ट्रम, डेटा और एक विदेशी कंपनी पर भारत की संचार व्यवस्था की निर्भरता से जुड़ा है।

दूसरी तरफ, मस्क का आरोप है कि स्टारलिंक को भारत में आने से रोकने का मतलब ग्रामीण और दूरदराज के भारतीयों को तेज इंटरनेट से दूर रखना है। मस्क का दावा है कि स्टारलिंक आएगा तो उन इलाकों में भी हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंच सकता है, जहां पारंपरिक नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है। हालांकि, सच्चाई इससे अलग है। TRAI के मार्च 2026 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल 109.28 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर हैं।
सरकार ने खारिज किया दावा

संचार मंत्रालय ने उन दावों को खारिज किया है कि कुछ खास हित Starlink की भारत में योजनाओं को निशाना बना रहे हैं। मंत्रालय का कहना है कि सैटेलाइट कम्युनिकेशन सहित टेलीकॉम सेवाओं के लिए देश का रेगुलेटरी ढांचा निष्पक्ष और भेदभाव-रहित है।
मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि नॉन-जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट ऑर्बिट-बेस्ड सिस्टम के ज़रिए काम करने वाली तीन ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट सर्विस प्रोवाइडर्स को टेलीकॉम लाइसेंस दिए गए हैं।

मंत्रालय के अनुसार सभी लाइसेंस पाने वालों को यूजर्स और उनके डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तय सुरक्षा शर्तों का पालन करना जरूरी था। मंत्रालय ने कहा कि इस प्रक्रिया के तहत तीनों लाइसेंस पाने वालों के लिए सुरक्षा जांच अभी चल रही है।
इसमें आगे कहा गया कि जब किसी लाइसेंस वाली कंपनी की जांच पूरी हो जाएगी, तो वह कंपनी स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट पाने के अगले चरण में जा सकेगी।
बयान में कहा गया कि फिलहाल, तीनों कंपनियां मोटे तौर पर एक ही रेगुलेटरी स्टेज पर हैं। इसलिए, यह सुझाव कि फ्रेमवर्क या उसका इस्तेमाल गलत या भेदभावपूर्ण है, बेबुनियाद और गलतफहमी पर आधारित है।
स्टारलिंक की कितनी तैयारी?
7 अक्टूबर को इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 में बोलते हुए स्टारलिंक की बिजनेस ऑपरेशन्स की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रायर ने कहा कि कंपनी भारतीय यूजर्स का डेटा देश के अंदर ही रख रही है। ड्रायर ने कहा, 'हम भारतीय यूजर्स का डेटा भारत के अंदर ही रख रहे हैं।' ड्रायर के अनुसार, स्टारलिंक पिछले पांच सालों से भारतीय रेगुलेटर्स, इंडस्ट्री के स्टेकहोल्डर्स और ऑपरेटर्स के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि अपने ऑपरेशन को भारत की जरूरतों के हिसाब से ढाला जा सके।
कंपनी का कहना है कि उसने भारतीय बाजार में आने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा इंतजामों में निवेश किया है। वहीं, सरकार का कहना है कि रेगुलेटरी प्रक्रिया सुरक्षा जांच और स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट की जरूरतों के अधीन है।







