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समुद्री व्यापार का ये रूट कैसे बन रहा रूस की नई ताकत, देखिए
आर्कटिक के बर्फीले पानी से होकर गुजरने वाला ये रास्ता अब सिर्फ एक वैकल्पिक मार्ग नहीं रह गया है, ये एशियाई देशों के लिए व्यापार का नया केंद्र बनता जा रहा है।
दुनिया

पिछले कुछ समय से दुनिया में समुद्री व्यापार के कई पारंपरिक रास्तों पर संकट के बादल छाए हुए हैं। कहीं जंग की तपिश है, तो कहीं हमलों का खतरा, ऐसे में दुनिया के नक्शे पर एक समुद्री रास्ता तेजी से अपनी अहमियत बढ़ा रहा है। ये रास्ता बर्फ से ढका है, कठिन है लेकिन सुरक्षित है, छोटा है इसलिए जल्दी से एक से दूसरे देश तक माल पहुंचाने में मददगार साबित हो रहा है। ये है रूस का नॉर्दर्न सी रूट।

आर्कटिक के बर्फीले पानी से होकर गुजरने वाला ये रास्ता अब सिर्फ एक वैकल्पिक मार्ग नहीं रह गया है, ये एशियाई देशों के लिए व्यापार का नया केंद्र बनता जा रहा है। इस साल जुलाई से लेकर अब तक रूस ने नॉर्दर्न सी रूट के ज़रिए करीब 2 करोड़ बैरल तेल सप्लाई किया है, जो कि पिछले साल के कुल आंकड़े से लगभग 50 फीसदी ज्यादा है। लेकिन तेल तो इसकी कहानी का महज एक हिस्सा भर है।

रूस का कार्गो ट्रैफिक रिकॉर्ड स्तर पर

आर्कटिक के रास्ते रूस का कार्गो ट्रैफिक भी रिकॉर्ड स्तर को छू रहा है। रोसाटॉम के डायरेक्टर जनरल एलेक्सी लिखाचेव के मुताबिक, नॉर्दर्न सी रूट के जरिए 3.5 करोड़ टन से ज्यादा का एक्सपोर्ट अभी तक हो चुका है। इस साल यह 4 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। इतना तो सोवियत संघ के सबसे अच्छे दौर में भी कभी नहीं हुआ था। ये उससे कई गुना ज्यादा है।

नॉर्दर्न सी रूट की अहमियत कितनी बढ़ रही है, आंकड़ों के जरिए से आसानी से समझ सकते हैं।

जहाजों की आवाजाही: सितंबर के अंत तक इस रूट से 104 जहाज गुजर चुके हैं, जबकि 2025 में सिर्फ 103 शिप निकले थे। इस साल इनकी संख्या 150 तक पहुंचने का अनुमान है।
रिकॉर्ड तेल सप्लाई: 2026 में जुलाई से अक्तूबर तक रूस ने इस रास्ते से करीब 2 करोड़ बैरल तेल एशियाई देशों को भेजा है। यह पिछले साल के कुल तेल ट्रांसपोर्ट से लगभग 50 फीसदी ज्यादा है।
रिकॉर्ड माल ढुलाई: सिर्फ तेल ही नहीं, बाकी वस्तुओं का भी रिकॉर्ड ट्रेड हुआ है। नॉर्दर्न सी रूट से रोसाटॉम की कुल माल ढुलाई 3.5 करोड़ टन को पार कर चुकी है। इस साल इसके 4 करोड़ टन के आंकड़े को छूने की उम्मीद है।

आइसब्रेकर बने रूस की ताकत

आने वाले वक्त में रूस के व्यापार को नए पंख लग सकते हैं। ऐसे में इस आर्कटिक रूट पर रूस की सबसे बड़ी ताकत उसके परमाणु ऊर्जा से चलने वाले शक्तिशाली आइसब्रेकर जहाज बन रहे हैं। ये विशालकाय आइसब्रेकर बर्फ की मोटी-मोटी परतों को काटकर कार्गो जहाजों के लिए रास्ता बनाते हैं और उन्हें सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाते हैं। रूस के पास दुनिया की सबसे बड़े न्यूक्लियर आइसब्रेकर फ्लीट है। इसमें 43 ऑपरेशनल जहाज हैं, जिनमें से 8 परमाणु ऊर्जा से चलते हैं। इनके अलावा 35 डीजल इलेक्ट्रिक आइसब्रेकर हैं।

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नॉर्दर्न सी रूट क्या है?

नॉर्दर्न सी रूट (NSR) आर्कटिक महासागर में स्थित एक प्रमुख समुद्री रास्ता है। यह रूस के उत्तरी तट के साथ-साथ आर्कटिक से गुजरता है और अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। यह रूस के मुरमांस्क से शुरू होकर बेरिंग स्ट्रेट तक जाता है। यह पूरा रास्ता रूस के एक्सक्लूसिव इकनोमिक जोन में आता है।

भारत के लिहाज से देखें तो अगर मालवाहक जहाज चेन्नई या भारत के पूर्वी तट से निकलकर व्लादिवोस्तोक पहुंचे तो वहां से नॉर्दर्न सी रूट के जरिए उत्तरी यूरोप तक जा सकता है। यह हिंद महासागर से होते हुए पूर्वी रूस, आर्कटिक महासागर और फिर यूरोप तक कनेक्टिविटी देता है।

छोटा रास्ता, समय की बचत

रूस का कहना है कि एशिया और उत्तरी यूरोप के बीच कुछ समुद्री मार्गों पर NSR के जरिए यात्रा की दूरी लगभग 30-40% तक कम हो सकती है। स्वेज नहर के जरिए जहां जहाजों को लगभग 35-40 दिन लग सकते हैं, वहीं आर्कटिक के रास्ते कई मामलों में कुछ रूट्स पर ट्रैवल टाइम 10-15 दिन तक घट सकता है। हालांकि इसमें मौसम, बर्फ और जहाज के प्रकार पर काफी कुछ निर्भर करता है।

दूरी कम, सुरक्षा ज्यादा

हमलों के खतरे से बचने के लिए जहाजों को जब अफ़्रीका का चक्कर काटकर लंबे रास्ते से जाना होता है तो उनका समय और ईंधन दोनों बहुत ज्यादा खर्च होते हैं। इसके मुकाबले, आर्कटिक का रास्ता यूरोप और एशिया के बीच काफी छोटा और सीधा पड़ता है।

लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं

  • सबसे बड़ी चुनौती ये है कि ये पूरा रास्ता बर्फ से घिरा है। बर्फ की वजह से ये पूरे साल खुला नहीं रहता। आमतौर पर ये जुलाई से अक्तूबर तक ही खुला रहता है।
  • यहां बर्फ की मोटी चट्टानें होती हैं। उनके बीच से रास्ता बनाने के लिए अधिकांश समय जहाजों को आइसब्रेकर की जरूरत पड़ती है।
  • बर्फ में चलने वाले Ice-Class जहाज सामान्य जहाजों से कहीं ज्यादा महंगे होते हैं। इन्हें ऑपरेट करने की लागत भी बहुत ज्यादा होती है।
  • आर्कटिक समुद्र में दुर्घटनाओं का जोखिम ज्यादा होता है, इसलिए बीमा कंपनियां यहां से निकलने वाले जहाजों से ज्यादा प्रीमियम वसूलती हैं।

डर के साये में पारंपरिक रास्ते

दुनिया के तमाम प्रचलित समुद्री मार्ग इस वक्त भारी असुरक्षा और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।

  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: 28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद से ही यह प्रमुख मार्ग लगभग ठप है। यह दुनिया की लगभग 20 फीसदी तेल सप्लाई का अहम रूट हुआ करता था।
  • लाल सागर-स्वेज नहर: यहां से दुनिया का करीब 12 प्रतिशत व्यापार होता रहा है। लेकिन यमन के हूती विद्रोहियों की सक्रियता ने इसे संकट में डाल दिया है। बाब अल मंदेब से आवाजाही रोकने, आए दिन के हमलों से जहाज यहां से निकलने में कतराने लगे हैं।
  • काला सागर: यहां यूक्रेन के हमलों ने तेल टैंकरों को लेकर सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। कुछ महीने पहले काला सागर में जहाजों पर कई हमले हो चुके हैं।

महंगा बीमा बढ़ा रहा लागत

युद्ध और तनाव का असर सिर्फ जहाजों की आवाजाही पर ही नहीं पड़ता, उनके जरिए ट्रांसपोर्ट होने वाला माल भी महंगा हो जाता है। दरअसल जब जहाज जोखिम भरे रास्तों से गुजरते हैं तो उनका इंश्योरेंस महंगा हो जाता है। उसमें War Risk Insurance भी जोड़ दिया जाता है। होर्मुज के उदाहरण से समझें तो युद्ध की वजह से यहां जुलाई 2026 में जहाजों का अतिरिक्त बीमा प्रीमियम 7.5 से 10 फीसदी बढ़ गया था। ऐसे में दुनिया के देशों के व्यापार में नॉर्दन सी रूट एक सस्ता, सुरक्षित और भरोसेमंद रास्ते के रूप में जगह बना रहा है।