
कुछ ही दिन पहले की बात है। एलन मस्क अपने प्लेटफॉर्म X पर भारत सरकार को घेर रहे थे और अपने स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट को भारत में अप्रूवल दिलाने की दुहाई दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने 'Oligarchs' (ऑलिगार्क्स) जैसे टर्म का भी इस्तेमाल किया। एलन मस्क यहीं नहीं रुके। दो दिन बाद एक और पोस्ट किया और मुकेश अंबानी पर तंज कसते हुए ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ कह डाला। ये तो थी एलन मस्क की सोशल बुलीइंग की कोशिश। अब अमेरिका की पिक्चर देखते हैं।

वहां मिडटर्म के चुनाव हैं। Reuters की एप्रूवल रेटिंग देखें तो ईरान युद्ध के चलते ट्रंप की स्थिति कुछ खास अच्छी दिख नहीं रही है। ऐसे में ट्रंप के दोस्त एलन मस्क उनके लिए एक बार फिर मसीहा बनकर उभरे हैं। दरअसल, मस्क ने अपनी पसंद की पार्टी यानी रिपब्लिकन को मजबूत करने के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च कर डाले हैं।
फंडिंग के बारे में क्या पता चला?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने 2026 के मिडटर्म चुनाव में अब तक करीब 366 मिलियन डॉलर राजनीतिक गतिविधियों पर खर्च किए हैं। इनमें से 276 मिलियन डॉलर से ज्यादा रकम जुलाई के बाद रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े ग्रुप्स को दी गई है। रॉयटर्स ने 12 अक्टूबर की रिपोर्ट में चुनावी फंडिंग के इन आंकड़ों की जानकारी दी। इसके साथ ही मस्क इस चुनाव सीजन में अमेरिका के सबसे बड़े व्यक्तिगत राजनीतिक दानदाताओं में सबसे आगे आ गए हैं।
अब जानिए ओलिगार्क होता क्या है?
ओलिगार्क (Oligarch) ऐसे बेहद अमीर और ताकतवर कारोबारी को कहते हैं, जिसका देश की सरकार और राजनीति पर भी काफी प्रभाव हो। मस्क भारत के बारे में सोशल मीडिया पर लिख रहे थे, लेकिन असली बात तो अब पूरे अमेरिका को पता चल गई है।
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अमेरिका में अरबों का राजनीतिक दांव
असल में, मस्क और भारत के उद्योगपतियों के बीच ताजा विवाद स्टारलिंक की भारतीय बाजार में एंट्री को लेकर है। स्टारलिंक एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा है। भारत में इस सेवा की शुरुआत को लेकर रेगुलेटरी मंजूरियों और कारोबारी प्रतिस्पर्धा के बीच मस्क ने आरोप लगा दिया कि ताकतवर कारोबारी हित उनकी कंपनी के रास्ते में बाधा डाल रहे हैं।
इसी विवाद के दौरान मस्क ने भारत के ‘ओलिगार्क्स’ का जिक्र किया और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी को ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ कहकर निशाना साधा। ‘ओलिगार्क’ शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर ऐसे प्रभावशाली लोगों के लिए होता है जिनका सत्ता और नीतिगत फैसलों पर असाधारण प्रभाव माना जाता है।
लेकिन सच तो ये है कि मस्क के अपने राजनीतिक खर्च के आंकड़े इस बहस को उनके दरवाजे तक ले आते हैं। अमेरिकी राजनीति में उनका पैसा रिपब्लिकन उम्मीदवारों और पार्टी के पक्ष में काम करने वाले समूहों को मजबूत कर रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि अमेरिका में दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल मस्क अपनी आर्थिक ताकत से राजनीतिक मुकाबले को किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं।
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रिपब्लिकन पार्टी को कहां-कहां दिया पैसा?

एलन मस्क के राजनीतिक खर्च का हिसाब देखें तो तस्वीर और साफ होती है।
2026 के अमेरिकी चुनाव चक्र में वह अब तक करीब 366 मिलियन डॉलर यानी 3,514 करोड़ रुपये खर्च कर चुके हैं। इसमें से 276 मिलियन डॉलर से ज्यादा रकम जुलाई के बाद रिपब्लिकन समर्थक पॉलिटिकल ग्रुप्स को दी गई। अकेले सीनेट लीडरशिप फंड को करीब 1,517 करोड़ रुपये (158 मिलियन डॉलर) और मस्क के अपने अमेरिका पीएसी को लगभग 730 करोड़ रुपये (76 मिलियन डॉलर) मिले। वहीं, रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन वाले कांग्रेसनल लीडरशिप फंड को 192 करोड़ रुपये (20 मिलियन डॉलर) और दूसरे रिपब्लिकन समर्थक समूहों को करीब 211 करोड़ रुपये (22 मिलियन डॉलर) दिए गए। यानी जुलाई के बाद ही मस्क ने इन ग्रुप्स को करीब 2,650 करोड़ रुपये दिए। भारत में ताकतवर उद्योगपतियों के राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठाने वाले मस्क खुद अमेरिका की चुनावी राजनीति में इतना बड़ा फंड क्यों लगा रहे हैं? सवाल तो उठ रहे हैं।
बताते चलें कि अमेरिका में सुपर पीएसी (Super PAC) ऐसे राजनीतिक संगठन होते हैं जो उम्मीदवारों और चुनावी मुद्दों के समर्थन में असीमित रकम जुटा और खर्च कर सकते हैं। हालांकि, वे उम्मीदवारों के चुनाव अभियानों के साथ सीधे तालमेल करके काम नहीं कर सकते। यानी मस्क का पैसा सीधे सरकारी पद खरीदने का प्रमाण नहीं है, लेकिन इससे राजनीतिक प्रचार और चुनावी मुकाबले में रिपब्लिकन समर्थक संगठनों की वित्तीय ताकत जरूर बढ़ती है।
बर्नी सैंडर्स ने क्रोनोलॉजी समझा दी
Elon Musk spent $290 million to elect Trump. It paid off. Since his election, Musk got $696 billion richer & became the world’s 1st trillionaire. But that’s not enough. Now, Musk is spending $366 million to keep Republicans in control of Congress. STOP MUSK. STOP OLIGARCHY.
— Bernie Sanders (@BernieSanders) October 12, 2026
अमेरिकी सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने एलन मस्क की दौलत और राजनीतिक ताकत के रिश्ते पर सवाल उठाए हैं। सैंडर्स ने X पर लिखा कि डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव जिताने के लिए मस्क ने 290 मिलियन डॉलर खर्च किए और ट्रंप के आने के बाद से मस्क की संपत्ति में 696 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है। सैंडर्स के मुताबिक, मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन गए हैं, लेकिन इसके बावजूद उनका राजनीतिक खर्च थमा नहीं है। अब वह अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण बनाए रखने के लिए 366 मिलियन डॉलर खर्च कर रहे हैं।
सैंडर्स ने लिखा, 'मस्क को रोको, ओलिगार्की को रोको।'
अमेरिका में लीगल है चुनावी चंदा, लेकिन...
गौर करने वाली बात है कि चुनावी चंदा देना अमेरिका में कानूनन राजनीतिक गतिविधि है, लेकिन जब कोई कारोबारी सैकड़ों मिलियन डॉलर अपनी पसंद की पार्टी के समर्थन में खर्च करता है, तो राजनीति में उसकी आर्थिक ताकत और संभावित प्रभाव पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत में उद्योगपतियों के राजनीतिक प्रभाव पर तंज कसने वाले मस्क के अपने चुनावी खर्च ने इस बहस को और दिलचस्प बना दिया है।
ट्रंप प्रशासन में मस्क की भूमिका

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक सांसद मस्क के सरकारी अनुबंधों और ट्रंप प्रशासन में उनकी भूमिका की जांच की मांग कर रहे हैं। खास तौर पर स्पेसएक्स (SpaceX) के सरकारी अनुबंधों और सरकारी खर्च घटाने के लिए बनाई गई संस्था डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) में मस्क की भूमिका जांच के दायरे में रही है। यानी जो मस्क अपनी मनगढंत कहानियों में भारत में 'ओलिगार्क' जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, वही मस्क खुद राजनीति में पैसा बहा रहे हैं, ताकि सिर्फ पॉलिटिकल पावर बनी रहे।
ट्रंप के चुनाव में बहाया पैसा, फिर खर्च कम करने आए
मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप और अन्य रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करने के लिए 290 मिलियन डॉलर (2,760 करोड़ भारतीय रुपये) से ज्यादा खर्च किए थे। ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद मस्क को सरकारी खर्च कम करने के अभियान DOGE की जिम्मेदारी मिली। इस भूमिका के जरिए वह सरकारी कामकाज और खर्च में कटौती से जुड़े फैसलों के केंद्र में आ गए।
मई 2025 में मस्क ने DOGE की भूमिका छोड़ दी। इसके बाद ट्रंप और मस्क के बीच सार्वजनिक मतभेद भी सामने आए, हालांकि बाद में दोनों के संबंध फिर बेहतर होते दिखाई दिए। अब 2026 के मिडटर्म इलेक्शन में मस्क का भारी राजनीतिक खर्च इस सवाल को फिर सामने लाता है कि अमेरिका में बड़े कारोबारी और राजनीतिक सत्ता के रिश्ते किस तरह काम करते हैं।
मस्क के दोहरे मानदंडों पर सवाल क्यों?
मस्क का मामला इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वो भारत में कारोबारी हितों और सत्ता के रिश्ते को लेकर मुखर हैं, लेकिन अमेरिका में खुद अपनी पसंद की राजनीतिक ताकत को मजबूत करने के लिए बड़ी रकम खर्च कर रहे हैं। भारत में अंबानी के राजनीतिक प्रभाव पर तंज और अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के लिए रिकॉर्ड फंडिंग... इन दोनों के बीच का विरोधाभास नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मस्क की फंडिंग एक बुनियादी सवाल जरूर उठाती है। अगर किसी देश में बहुत ज्यादा आर्थिक ताकत रखने वाले कारोबारी राजनीतिक फैसलों और चुनावी मुकाबले को प्रभावित करने की कोशिश करें, तो क्या इसे सिर्फ कारोबार की स्वतंत्रता कहकर छोड़ दिया जाना चाहिए? मस्क भारत में जिस तरह कारोबारियों के राजनीतिक प्रभाव पर मनगढ़ंत सवाल उठाते हैं, वही कसौटी अमेरिका में उनकी अपनी भूमिका पर भी लागू हो सकती है। फर्क इतना है कि भारत में वह इस बहस के आलोचक के रूप में सामने आते हैं, जबकि अमेरिका में उनके अपने राजनीतिक खर्च के आंकड़े उन्हें इसी बहस के केंद्र में खड़ा कर देते हैं।







