
यमन में जिस जंग की आग कुछ समय पहले तक ठंडी पड़ी हुई थी, वह एक बार फिर भड़क उठी है। एक तरफ ईरान समर्थित हूती विद्रोही हैं, तो दूसरी तरफ यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार और उसके साथ खड़े सऊदी अरब और कुछ अन्य देश।
इस बार लड़ाई का केंद्र लाल सागर के आसपास का इलाका और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट है। इसी स्ट्रेट यानी समुद्री रास्ते से होकर दुनिया का लगभग 10-12% व्यापार होता है।
आइए यमन की लड़ाई को 10 सवालों के जवाब में समझते हैं-
1. यमन में लड़ाई आखिर किस बात को लेकर हो रही है?
मौजूदा हालात को समझने के लिए हमें साल 2011 और उसके बाद हुए घटनाक्रमों को समझना होगा। उस दौरान अरब देशों में सरकारों के खिलाफ बड़े जन-आंदोलन चल रहे थे। यमन में लंबे समय से सत्ता में रहे राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए। सालेह को पद छोड़ना पड़ा और उनकी जगह अब्द-रब्बू मंसूर हादी राष्ट्रपति बने।
हादी से उम्मीद थी कि वह देश में लोकतांत्रिक बदलाव लाएंगे, लेकिन सरकार कमजोर थी। अर्थव्यवस्था खराब थी। बेरोजगारी और गरीबी बहुत अधिक थी, भ्रष्टाचार बढ़ रहा था और अलग-अलग क्षेत्रों के लोग केंद्र सरकार से नाराज थे।

उत्तरी यमन में हूती नाम का एक शक्तिशाली आंदोलन पहले से सक्रिय था। उन्हें लगता था कि उनकी धार्मिक और क्षेत्रीय पहचान को दबाया जा रहा है और राजधानी सना में बैठी यमन सरकार उनके इलाके की उपेक्षा कर रही है।
हादी सरकार की कमजोरी का फायदा उठाकर 2014 में हूती लड़ाके सना पर कब्जा करने में सफल हो गए। राष्ट्रपति हादी अपनी जान बचाकर सऊदी अरब भाग गए। इसके बाद संघर्ष स्थानीय विद्रोह से निकलकर बड़े गृहयुद्ध में बदल गया।
इस गृहयुद्ध में एक तरफ हूती विद्रोही हैं तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार है, जो देश में अपनी सत्ता बहाल करना चाहती है। सऊदी अरब इस सरकार का समर्थन करता है, जबकि ईरान वैचारिक रूप से हूतियों को सपोर्ट करता है।
2. हूती विद्रोही कौन हैं और उनका नेता कौन है?
हूती आंदोलन को अरबी में अंसार अल्लाह भी कहा जाता है। यह यमन के उत्तर में उभरा एक राजनीतिक और सशस्त्र आंदोलन है, जिसका संबंध जैदी शिया समुदाय से है। आंदोलन का नाम इसके संस्थापक परिवार के नाम पर पड़ा।
आंदोलन की शुरुआत हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती ने की थी। 2004 में उनकी मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई अब्दुल मलिक अल-हूती आंदोलन के नेता बने। उनके सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी को संगठन के चेहरे के रूप में पेश किया जाता है और वो यमनी आर्म्ड फोर्सेज के प्रमुख भी हैं।
हूती खुद को यमन की संप्रभुता और विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ लड़ने वाला आंदोलन बताते हैं। वे अमेरिका, इजरायल और पश्चिमी देशों के विरोध में हैं। हूतियों को ईरान समर्थित सशस्त्र संगठन माना जाता है।

हूती केवल लड़ाकों का समूह नहीं हैं, बल्कि जिन इलाकों पर उनका नियंत्रण है, वहां वे प्रशासन भी चलाते हैं। उनके पास सैनिक हैं, मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी है।
3. हूतियों के खिलाफ कौन लड़ रहा है?
हूतियों के सामने कोई एकजुट सेना नहीं है। उनके विरोध में कई गुट हैं, जिनके लक्ष्य एक-दूसरे से अलग हैं।
सबसे बड़ा विरोधी गुट यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार है। यह सरकार अब मुख्य रूप से दक्षिणी शहर अदन और सऊदी अरब से काम करती है। 2022 में इस सरकार को चलाने के लिए प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल, यानी PLC बनाई गई।
PLC के अध्यक्ष रशद अल-अलीमी हैं। यह परिषद कई अलग-अलग सैन्य और राजनीतिक गुटों को साथ रखने की कोशिश करती है। परिषद में तारेक सालेह, सुल्तान अल-अरादा और अन्य प्रभावशाली नेता शामिल रहे हैं।
हूतियों के खिलाफ लड़ने वाले प्रमुख गुटों में ये शामिल हैं:
- सऊदी अरब समर्थित सरकारी सेना।
- तारेक सालेह के नेतृत्व वाली नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज।
- दक्षिणी यमन की आजादी की मांग कर रहा सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) जिसे यूएई का सपोर्ट है।
- मारिब और कुछ अन्य इलाकों में प्रभाव रखने वाला सुन्नी इस्लामी संगठन अल-इस्लाह।
- स्थानीय कबायली और क्षेत्रीय सैन्य बल।
4. ईरान का हूतियों से क्या संबंध है?
संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में ईरान और हूती विद्रोहियों के बीच राजनीतिक और सैन्य संबंध होने की बात कही गई है। हूतियों और ईरान के बीच सहयोग सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र की विशेषज्ञों की रिपोर्ट के मुताबिक, हूतियों को आधुनिक हथियार तैयार करने और इस्तेमाल करने से जुड़ी तकनीकी जानकारी भी मिली है। इससे उनकी मिसाइल और ड्रोन बनाने या उन्हें ज्यादा प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ी है।
अमेरिका भी यही आरोप लगाता है। हालांकि हूती नेतृत्व दावा करता है कि वह ईरान का कठपुतली संगठन नहीं है और अपने फैसले खुद लेता है। ईरान भी हूतियों को हथियार देने से इनकार करता है।
5. यमन के गृहयुद्ध में सऊदी अरब क्या कर रहा?
जब हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा किया, तब पड़ोसी सऊदी अरब की चिंताएं बढ़ गईं। सऊदी अरब एक सुन्नी बहुल देश है और उसकी सीमा यमन से मिलती है। उसे डर था कि उसकी सीमा पर एक शिया विद्रोही गुट का राज हो जाएगा, जो उसके कट्टर दुश्मन ईरान का साथी है।
मार्च 2015 में सऊदी अरब ने यूएई (UAE) और अन्य सुन्नी अरब देशों के साथ मिलकर यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ 'Operation Decisive Storm' किया। उनका मकसद राष्ट्रपति हादी को दोबारा गद्दी पर बिठाना था।
इस तरह यमन का संघर्ष स्थानीय युद्ध होते हुए भी क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष बन गया।
6. अभी यमन के किस हिस्से पर किसका कब्जा है?
इसे आप मैप से कुछ इस तरह समझ सकते हैं-

हूतियों का नियंत्रण मुख्य रूप से:
- राजधानी सना।
- उत्तरी यमन का बड़ा हिस्सा।
- सादा प्रांत, जो हूती आंदोलन का पारंपरिक गढ़ है।
- पश्चिमी यमन के बड़े इलाके।
- लाल सागर के तट के कई हिस्से।
- अल-हुदैदाह जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाह क्षेत्र।
इन इलाकों में यमन की बड़ी आबादी रहती है। अलग-अलग आकलनों के मुताबिक, हूतियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में देश की लगभग 60–65 प्रतिशत आबादी रहती है।
यमन सरकार तथा उसके सहयोगी मुख्य रूप से:
- दक्षिणी शहर अदन।
- मारिब का बड़ा हिस्सा।
- दक्षिण और दक्षिण-पूर्व के कई क्षेत्र।
- हद्रामौत और अल-महरा जैसे बड़े लेकिन कम आबादी वाले पूर्वी इलाके।
- पश्चिमी तट के कुछ क्षेत्र।
- ताइज के कुछ हिस्से।
विवादित इलाके, जहां दोनों के बीच लड़ाई चलती रहती है
- ताइज
- मारिब
- पश्चिमी तट का इलाका
- अल-हुदैदाह के आसपास का क्षेत्र
- बाब अल-मंदेब की ओर जाने वाले इलाके।
पिछले कुछ महीनों में हूतियों और सरकारी बलों के बीच पश्चिमी तट, मोखा और बाब अल-मंदेब के आसपास लड़ाई तेज हुई है। पहले हूतियों की बढ़त की खबर आई कि उन्होंने मोखा, पेरिम द्वीप, धुबाब पर कब्जा कर लिया है, लेकिन अब PLC भी इन क्षेत्रों में अपनी बढ़त का दावा कर रहा है।
7. लाल सागर और बाब अल-मंदेब पर लड़ाई का असर कितना?
यमन के पश्चिम में लाल सागर है और दक्षिण-पश्चिम में बाब अल-मंदेब स्ट्रेट। यह स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है।
यूरोप और एशिया के बीच आने-जाने वाले व्यापारिक जहाजों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण रास्ता है। तेल, गैस, खाद्य सामग्री और अन्य सामान ले जाने वाले जहाज इस क्षेत्र से गुजरते हैं।

हूतियों ने 2023 के बाद लाल सागर में कई व्यापारिक जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। उन्होंने इन हमलों को गाजा युद्ध और फिलिस्तीन के समर्थन से जोड़ा। उनका कहना था कि वे इजरायल से जुड़े सभी जहाजों को निशाना बना रहे हैं। इन हमलों के कारण जहाजों को लंबे और महंगे रास्ते अपनाने पड़े।
सऊदी अरब के साथ हालिया संघर्ष शुरू होने के बाद हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के लिए भी बाब-अल-मंदेब का रास्ता बंद कर दिया है जिससे वैश्विक तेल-गैस सप्लाई पर असर हुआ है।
8. 2022 के युद्धविराम की कहानी क्या है?
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच लंबी लड़ाई के बाद साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ था। इसके बाद यमन में बड़े हवाई हमले कम हुए, कई मोर्चों पर लड़ाई रुक गई और सऊदी अरब और हूतियों के बीच बातचीत का रास्ता खुला। यमन के लोगों को भी कुछ समय के लिए राहत मिली।
लेकिन जून 2026 में हूतियों ने फिर सऊदी अरब के खिलाफ संघर्ष तेज करने का ऐलान किया। 13 जुलाई को सना एयरपोर्ट पर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के हमले के बाद हूतियों ने सऊदी शहर अबहा पर मिसाइलें दागीं।

इसके बाद हूतियों ने सऊदी तेल ठिकानों और लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाया। सऊदी अरब की मुख्य तेल पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचा। सऊदी ने भी हूतियों पर हवाई हमले शुरू कर दिए। अब दोनों पक्षों के बीच लड़ाई तेज हो गई है।
सऊदी ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ 'ऑपरेशन डॉन ऑफ यमन' शुरू किया है। पाकिस्तान और तुर्किये जैसे उसके रक्षा सहयोगी भी उसकी मदद के लिए आगे आए हैं। इन्होंने सैन्य मदद देने की घोषणा की है। हालांकि ये साफ नहीं है कि ये किस तरह की मदद देंगे।
9. अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे देश भी यमन की लड़ाई में शामिल हैं?
अमेरिका और ब्रिटेन पहले सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन को समर्थन देते रहे हैं। बाद के वर्षों में लाल सागर में जहाजों पर हूती हमलों के जवाब में अमेरिका और ब्रिटेन ने हूती ठिकानों पर हमले भी किए। संयुक्त अरब अमीरात ने भी यमन में अलग-अलग स्थानीय सशस्त्र गुटों का समर्थन किया है।
हालांकि इस बार अमेरिका हूती विद्रोहियों पर हमले करने से साफ इनकार कर चुका है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने राष्ट्रपति ट्रंप को खुद फोन करके मदद मांगी थी। लेकिन ट्रंप ने इनकार कर दिया। ट्रंप का कहना था कि हूती विद्रोहियों ने उन्हें फोन करके कहा है कि वह अमेरिका से लड़ाई नहीं चाहते। इसलिए वो हूतियों पर हमला नहीं करेंगे।
10. यमन की आम जनता पर इस युद्ध का क्या असर?

यमन में वर्षों से जारी संघर्ष ने आम लोगों की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यालय OCHA के मुताबिक, 2026 में देश के 2.2 करोड़ से ज्यादा लोगों को मानवीय मदद की जरूरत है।
सितंबर के महीने में फिर से लड़ाई तेज होने के बाद, दो हफ्तों में ही 1.04 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। इनमें 57 हजार से अधिक बच्चे थे। लड़ाई के कारण स्कूल बंद करने पड़े हैं और स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। जंग अभी जारी है, और जिस तरह के संकेत मिल रहे है, इससे इसके तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है।






