
अमेरिका ने कई बड़ी IT कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़ी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रक्रिया से सस्पेंड कर दिया है। इससे इन कंपनियों के जरिए विदेशी विशेषज्ञों के लिए अमेरिका में स्थायी रूप से बसने और काम करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसका असर भारतीय पेशेवरों पर खास तौर पर पड़ सकता है, क्योंकि लेबर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करने वालों में 50% से ज्यादा भारतीय हैं।
हालांकि, भारत के नजरिए से इस फैसले को सकारात्मक रूप में भी देखा जा रहा है। जानकारों की मानें तो यह भारत के 'मिशन 2047' के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। कैसे? इसकी एक वजह रिवर्स ब्रेन ड्रेन है। विदेशों में काम कर रहे प्रतिभाशाली भारतीयों की देश वापसी को बढ़ावा मिल सकता है।
भारत और बेंगलुरु के लिए अवसर
समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कर्नाटक के IT मंत्री प्रियांक खड़गे ने इस फैसले के एक संभावित फायदे का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “मैं इस स्थिति का एक सकारात्मक पहलू भी देख रहा हूं। इससे हम वैल्यू चेन में और ऊपर जा सकते हैं। हाई-एंड नौकरियां वहां आ सकती हैं, जहां टैलेंट मौजूद है यानी भारत और खास तौर पर बेंगलुरु में।”
खड़गे ने यह भी कहा कि अमेरिकी प्रशासन का फैसला एक जटिल मुद्दा है। उन्होंने कहा, “भले ही फिलहाल इसका कोई बड़ा असर न दिखे, लेकिन भारतीय IT कंपनियों को आगे की चुनौतियों के लिए बेहतर तैयारी करनी होगी। इससे कंपनियों में कुशल प्रतिभाओं को बनाए रखने (स्किल रिटेंशन) की दर बढ़ सकती है। हालांकि, विदेशों में काम करना निश्चित रूप से और महंगा हो जाएगा।”
'अमेरिका की नीतियों से भारत के मिशन को बढ़ावा'
इस मुद्दे पर RT इंडिया ने कोरोवर और भारतजीपीटी के संस्थापक अंकुश सभरवाल से बात की। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सरकार की नीतियां भारत के अपने मिशन को आगे बढ़ाने में मदद कर रही हैं। इससे रिवर्स ब्रेन ड्रेन यानी विदेशों में काम कर रहे भारतीय प्रतिभाशाली लोगों की देश वापसी को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपना सॉवरेन AI इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है।
भारत के लिए फायदे का सौदा
वॉशिंगटन का यह कदम भारत के लिए कैसे फायदेमंद साबित हो सकता है? इस पर सभरवाल ने कहा कि भारतीय टेक कंपनियों में पहले से ही उत्पाद बनाने की क्षमता है। अब उन्हें भारत की समस्याओं पर ध्यान देकर यहीं बौद्धिक संपदा (IP) विकसित करनी चाहिए, ताकि दुनिया भी भारत में बने उत्पादों का इस्तेमाल कर सके।
सभरवाल ने बताया कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विप्रो टेक्नोलॉजी से की थी। सर्विस इंडस्ट्री में काम करने के बाद अब वह अपनी कंपनी के जरिए उत्पाद तैयार कर रहे हैं। उनके मुताबिक, भारतीय सर्विस कंपनियों ने नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (NDA) के तहत शुरुआत से ही कई बड़े उत्पाद विकसित किए हैं।
उन्होंने कहा, “जब हम भारत की ओर रुख करेंगे, तो यह देश खुद IT दिग्गजों के लिए एक बड़ा बाजार साबित हो सकता है। हो सकता है कि शुरुआत में पश्चिमी देशों जितना पैसा यहां न मिले, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन अंततः हम यहां फलेंगे-फूलेंगे।”
भारत में मजबूत इकोसिस्टम
भारत में अब काम करने और कारोबार बढ़ाने के लिए भी मजबूत इकोसिस्टम मौजूद है। देश में 2,000 से ज्यादा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) हैं। इनमें करीब 24 लाख लोग काम करते हैं और इनसे लगभग 100 अरब डॉलर का रेवेन्यू मिलता है।
इनमें से ज्यादातर GCCs छह शहरों में स्थित हैं। बेंगलुरु में देश के एक-तिहाई से ज्यादा टैलेंट की मौजूदगी है। इसके अलावा हैदराबाद, पुणे, मुंबई, चेन्नई और दिल्ली-NCR में भी बड़ी संख्या में GCCs हैं।
सभरवाल ने भारत में GCCs के विस्तार का जिक्र करते हुए कहा कि ये केंद्र सिर्फ कम लागत के कारण भारत नहीं आ रहे हैं, बल्कि यहां उपलब्ध प्रतिभा भी इसकी एक बड़ी वजह है।
इसके साथ ही सभरवाल ने भारत में स्टार्टअप और डीप-टेक कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की योजनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकार रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), डीप टेक, ग्रांट, इक्विटी फंडिंग और अन्य प्रोत्साहनों के जरिए मदद दे रही है।
सभरवाल ने स्टार्टअप इंडिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नई कंपनियों को सरकारी टेंडर या प्रस्तावों (RFP) में हिस्सा लेने का मौका देने के लिए पहले के टर्नओवर, अनुभव और अन्य शर्तों में छूट दी जाती है। उनके मुताबिक, अब भारतीय IT कंपनियों को अपनी सोच बदलकर देश में मौजूद अवसरों का फायदा उठाना चाहिए।
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