
दूसरे देशों से जाकर बसे परदेसियों ने ही अपने खून-पसीने से अमेरिका के ग्रोथ की कहानी लिखी है। उपराष्ट्रपति ने उनके लिए 'बंधुआ मजदूर' शब्द का इस्तेमाल किया तो भारत ने ऐतराज जताया।शायद ट्रंप प्रशासन परदेसियों के योगदान को भूल रहा था, भारत ने स्पष्ट शब्दों में याद दिलाया है।
दरअसल हुआ यूं कि अमेरिका ने आठ IT कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) से सस्पेंड किया तो पूरी दुनिया में डिबेट छिड़ गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा पर काम करने वाले विदेशी आईटी प्रोफेशनल्स को ‘बंधुआ मजदूर’ कह दिया था। भारत ने वेंस की इस टिप्पणी की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘अनुचित’ और ‘बेहद आपत्तिजनक’ बताया है।
’अमेरिका का इतिहास प्रवासियों ने बनाया है’
विदेश मंत्रालय ने कहा कि वेंस की टिप्पणियां इस तथ्य को नजरअंदाज करती हैं कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल हैं। वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और इनोवेशन से जुड़े तंत्र में अहम योगदान देते हैं।
वेंस ने कहा क्या था?
वीजा धोखाधड़ी रोकने को लेकर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने H-1B वीजा प्रोग्राम के कथित दुरुपयोग को लेकर बड़ी टेक कंपनियों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि H-1B वीजा प्रोग्राम का मकसद अमेरिका के बाहर से ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को लाना है, जिनकी जगह अमेरिकी कर्मचारियों को रखना संभव नहीं है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि यह प्रोग्राम अब धोखाधड़ी से भरा हुआ है।
वेंस ने दावा किया कि माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, जबकि इसी दौरान कंपनी को 6,300 H-1B वीजा और करीब 3,000 ग्रीन कार्ड मिले।
’टैलेंट मोबिलिटी से दोनों देशों को फायदा’
विदेश मंत्रालय ने कहा कि प्रतिभाशाली पेशेवरों की एक देश से दूसरे देश में आवाजाही यानी टैलेंट मोबिलिटी से भारत और अमेरिका, दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को फायदा होता है। इससे भारतीय पेशेवरों को अवसर मिलते हैं, वहीं अमेरिकी कंपनियों को भी कुशल प्रतिभाएं मिलती हैं। इससे इनोवेशन, रिसर्च, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलता है। साथ ही, अमेरिका में रोजगार पैदा करने और कंपनियों के शेयरधारकों की संपत्ति बढ़ाने में भी मदद मिलती है।
मंत्रालय ने कहा कि यह दोनों देशों के लिए आपसी फायदे वाला क्षेत्र है। उसे उम्मीद है कि इस प्रक्रिया से जुड़े सभी पक्ष इस बात को समझेंगे। मंत्रालय के मुताबिक, अमेरिका की ओर से घोषित कदम दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाते।
’ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है’
विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि कुछ कंपनियों के लिए PERM प्रोग्राम के तहत एप्लीकेशन पर रोक लगाने के अमेरिकी फैसले से मौजूदा H-1B वीजा की वैधता या वीजा धारकों और उनके आश्रितों के स्टेटस पर अपने आप कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, इससे प्रभावित कंपनियों के पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
इस फैसले के तहत अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ कंपनियों के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रोग्राम के तहत पहले से पेंडिंग एप्लीकेशन की प्रोसेसिंग रोक दी है और नई एप्लीकेशन स्वीकार करना भी बंद कर दिया है। इन कंपनियों में भारतीय आईटी कंपनियां इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो और HCL टेक्नोलॉजीज शामिल हैं। इनके अलावा कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी भी इस सूची में हैं।
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