
'मेरेपड़ोस के लोगों ने मुझे यूनिवर्सिटी भेजने के लिए चंदा दिया था।'
यूनिवर्सिटी में अश्वेत लोगों के लिए क्लासेस सुबह-सुबह या रात में होती थीं, अक्सर मेरे पास क्लास के बीच घर जाने के लिए बस का किराया नहीं होता था।
'हम आपको नौकरी पर नहीं रख सकते क्योंकि हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते, जहां एक गोरी सेक्रेटरी को किसी अश्वेत व्यक्ति से निर्देश लेने पड़ें... तब यही कहा गया था।'
संघर्ष की ये कहानियां भारतवंशी तमिल परिवार में जन्मी उस लड़की के जीवन की हैं, जो आज प्रेरणा बन चुकी है। उनके दादा को ब्रिटेन के अफसर भारत से गुलाम के रूप में मजदूरी कराने दक्षिण अफ्रीका ले गए थे। बचपन से कॉलेज तक कदम-कदम पर इस लड़की ने भेदभाव का सामना किया। आज इस लड़की को पूरी दुनिया जानना चाहती है।

अभी जज हैं नवी पिल्लै
दक्षिण अफ्रीका की रहने वाली भारतीय मूल की नवी पिल्लै को नोबेल पीस प्राइज देने की घोषणा की गई है। नॉर्वे की नोबेल समिति ने शुक्रवार को नवनेथम 'नवी' पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया। नोबेल कमेटी के अनुसार, वह अभी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में उस मामले की जज हैं जिसमें म्यांमार पर नरसंहार का आरोप है।
क्यों मिला नोबेल पीस प्राइज?
नोबेल समिति ने शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए यह पुरस्कार दिया है। कमेटी ने कहा कि ये सम्मान पाने वाली पिल्लै ने कई देशों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह ठहराया है और हिंसा व संघर्ष के पीड़ितों के लिए उम्मीद जगाई है। नवी पिल्लै हमारे समय में अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांतों की महान पैरोकारों में से एक हैं। उनका शानदार करियर वैश्विक स्तर पर कानून के शासन का समर्थन करने, उसे मजबूत करने और उसका विस्तार करने की जरूरत की याद दिलाता है।
वीडियो :@AgnesCallamard/X
न्याय और मानवीय गरिमा के प्रति 85 साल की नवी पिल्लै की प्रतिबद्धता उन सभी लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत है जो एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया बनाना चाहते हैं। पिल्लै अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को विकसित करने में सबसे आगे रही हैं। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और जल्द ही रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं का बचाव करना शुरू कर दिया।
More and more conflicts are being addressed through diplomacy, treaties and legal mechanisms, rather than threats, violence and warfare. International law is a foundation for a more peaceful world. At a time of existential challenges – including more wars and conflicts than the world has seen in a long time – international law is no longer just a supplement to peace and security. It is an absolute necessity. Today Navi Pillay has been awarded the 2026 Nobel Peace Prize for her efforts to promote peace and international law. Read more about the 2026 #NobelPeacePrize: https://t.co/JMjpp1jPKc
— The Nobel Prize (@NobelPrize) October 9, 2026
पिल्लै का इंडिया कनेक्शन
पिल्लै दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में पली-बढ़ीं। इनका जन्म 1941 में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके दादाजी को भारत से मजदूरी के लिए दक्षिण अफ्रीका लाया गया था। वे यहां गन्ने के खेतों में काम करते थे। पिल्लै को तीन तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा। पहला- एक महिला के तौर पर, दूसरा- भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी होने के नाते और तीसरा- एक कामकाजी वर्ग की पृष्ठभूमि से होने के कारण।
पढ़ाई का संघर्ष भी आसान नहीं था
पिल्लै अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए अपने माता-पिता को श्रेय देती हैं। माता-पिता ने उन्हें तब पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जब प्राइमरी स्कूल के उनके दोस्त अचानक पढ़ाई छोड़ गए क्योंकि उन्हें जबरन अरेंज्ड मैरिज में धकेल दिया गया था। उस दौर में पिल्लै का सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी जाना एक असामान्य बात थी।
बस का किराया नहीं होता था
'डिप्लोमैटिक कूरियर' को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, 'एक मानवाधिकार वकील के तौर पर मेरे काम पर उस अनुभव का असर पड़ा जो मैंने रंगभेद के दौर में देखा था। मैं उन पार्कों या बीच पर नहीं जा सकती थी, जो सिर्फ गोरों के लिए थे। मैंने नटाल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। वहां का शेड्यूल उन गोरे छात्रों की मदद के लिए बनाया गया था, जो लॉ फर्मों में काम करते थे, इसलिए क्लासें सुबह-सुबह या रात में होती थीं। अक्सर मेरे पास क्लास के बीच घर जाने के लिए बस का किराया नहीं होता था, इसलिए मैं लाइब्रेरी में बैठकर नूर्नबर्ग केस के बारे में पढ़ती थी।'
लॉ फर्म्स में सिर्फ गोरे लोग करते थे काम
ग्रेजुएशन के बाद पिल्लै ने नौकरी के लिए अप्लाई करना शुरू किया। अधिकतर लॉ फर्म्स में सिर्फ गोरे लोग ही काम करते थे। 'सबसे पहले तो उन्होंने कहा, ‘नहीं, हम आपको नौकरी पर नहीं रख सकते क्योंकि हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते जहां एक गोरी सेक्रेटरी को किसी अश्वेत व्यक्ति से निर्देश लेने पड़ें।’ तो यह नस्ल का मामला था। और क्लास या सामाजिक स्तर का भेदभाव भी था... उन्होंने पूछा, ‘आप किस तरह का बिजनेस लाएंगी? क्या आपके पिता बिजनेस करते हैं?’

पिल्लै ने बताया कि सबसे ज्यादा दुख तब हुआ जब उन्होंने मेरी नई-नई शादी का जिक्र करते हुए कहा, ‘अगर आप प्रेग्नेंट हो गईं तो क्या होगा?’ इसलिए पिल्लै ने अकेले ही आगे बढ़ने का फैसला किया। उनके साथ काम करने वाले पुरुष उन्हें घमंडी या हद से अधिक महत्वाकांक्षी समझते थे। वे कहते थे- एक औरत लॉ फर्म शुरू कर रही है? वह ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगी। हालांकि, पिल्लै के पास कोई चारा भी नहीं था।
कानून की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने 1967 में अपनी लॉ फर्म शुरू की। 1980 के दशक में उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। 1988 में हॉर्वर्ड से ही 'डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस' की डिग्री हासिल की।
इंटरनेशनल कोर्ट में बनीं जज
डॉ. पिल्लै को 1995 में दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में नियुक्त किया गया था। चार साल बाद, वह रवांडा के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल (ICTR) की जज और प्रेसिडेंट बनीं। यहां उन्होंने यह साबित करने में अहम भूमिका निभाई कि यौन हिंसा, रेप और प्रोपेगैंडा फैलाने जैसे कामों के लिए मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का आरोप लगाया जा सकता है। इसके बाद इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) में जज के तौर पर नियुक्त किया गया।
2008 से 2014 तक उन्होंने यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स (OHCHR) के तौर पर काम किया। नवी पिल्लै ने 2021 से 2025 तक कब्जे वाले फिलिस्तीनी इलाकों पर UN के इंडिपेंडेंट इंटरनेशनल कमीशन ऑफ इंक्वायरी की अध्यक्षता भी की। साथ ही, 2019 में वह इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में उस मामले के लिए एड-हॉक जज बनीं, जिसमें म्यांमार पर नरसंहार का आरोप है।






