
'दोहरा रवैया साफ दिख रहा है... जो अमेरिका भारत को रूसी तेल खरीदने से रोकने की कोशिश कर रहा है वही, रूस के साथ व्यापार कर रहा है। वो रूस से यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स ले रहा है।'
जियोपॉलिटिक्स एक्सपर्ट कर्नल रोहित देव अमेरिका के नए बिल की आलोचना करते हुए यह बात कहते हैं। अमेरिकी संसद में पास हुए नए बिल के तहत भारत और चीन जैसे रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 100% का टैरिफ लगा सकता है।
नए रूस-ईरान प्रतिबंध कानून में रूस से जुड़े कई कारोबारी और ऊर्जा लेन-देन पर अमेरिका ने सख्ती का प्रावधान तो किया है लेकिन खुद को बड़ी छूट दे दी है।
अमेरिका रूस से कम संवर्धित यूरेनियम खरीदता है और रूस के साथ उसका नागरिक परमाणु सहयोग समझौता भी है। अमेरिका ने कानून में इन दोनों क्षेत्रों से जुड़े अपने लेन-देन को प्रतिबंधों से छूट दे रखी है।
रूस पर प्रेशर डालने के मकसद से अमेरिका लाया कानून
'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' के नाम से आए इस कानून का मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद यह बिल अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को इसे 262-159 के मतों से पास किया। कानून में राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं या प्रतिबंधों से बचने में रूस की मदद करते हैं। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं।
क्या है यूरेनियम वाला अपवाद?
कानून के सेक्शन 114 में कई तरह के अपवाद दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि प्रतिबंध उन गतिविधियों पर लागू नहीं होंगे जो अमेरिका और रूस के बीच 1954 के एटॉमिक एनर्जी एक्ट की धारा 123 के तहत हुए नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के अंतर्गत आती हैं।
इसके अलावा कुछ कम संवर्धित यूरेनियम के अमेरिका में आयात को भी प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है। मेडिकल आइसोटोप्स के लिए भी कुछ परिस्थितियों में अपवाद का प्रावधान है।
कानून का टेक्स्ट खुद यह दिखाता है कि अमेरिका रूस के साथ हर तरह के आर्थिक और तकनीकी संबंध को एक ही तरीके से खत्म नहीं कर रहा। खासकर नागरिक परमाणु ऊर्जा से जुड़े क्षेत्र में अमेरिकी हितों को ध्यान में रखते हुए छूट रखी गई है।
अमेरिका की परमाणु ऊर्जा व्यवस्था अभी भी विदेशी संवर्धन क्षमता पर काफी निर्भर है और इसमें रूस का बड़ा योगदान है।
भारत की तीखी प्रतिक्रिया
अमेरिका के इस दोहरे रवैये पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
Our statement on passage of the Sanctioning Russia and Iran Act in the US Congress
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) September 17, 2026
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मंत्रालय ने कहा, 'भारत बदलती बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों से आयात जारी रखेगा। पिछले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर कई अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने साफ तौर पर बताया है कि इसके संभावित असर सिर्फ भारत-अमेरिका संबंधों पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकते हैं।
मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में आगे कहा गया, 'भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। सरकार इन घटनाक्रमों के असर से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी।'
अमेरिका के डबल स्टैंडर्ड्स की आलोचना
अमेरिका के इस दोहरे रवैये की काफी आलोचना हो रही है। RT इंडिया से बात करते हुए जियोपॉलिटिक्स एक्सपर्ट कर्नल रोहित देव कहते हैं, 'अमेरिका रूस के साथ व्यापार करता है, यूक्रेन के साथ व्यापार करता है और दुनिया भर के देशों के साथ व्यापार करता है। भारत भी दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार करता है। रूस को इस बात से कोई समस्या नहीं है कि भारत अमेरिका के साथ व्यापार कर रहा है।'
US Sanctions 'Hypocrisy': Geopolitical Expert @RDXThinksThat Explains The Flawed Logic In Washington's Sanctions & Tariffs Over Russian Oil pic.twitter.com/a15hJkVBRe
— RT_India (@RT_India_news) September 17, 2026
वह आगे कहते हैं, 'ट्रंप यह कह रहे हैं कि क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा है, इसलिए भारत रूस के युद्ध प्रयासों को फंड कर रहा है। तो इसी तर्क से देखें तो अमेरिका भी रूस के साथ व्यापार कर रहा है। वह रूस से यूरेनियम और दूसरे दुर्लभ खनिज ले रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका सीधे पैसे देकर यूक्रेन को फंड कर रहा है। भारत ऐसा सीधे नहीं कर रहा है।'
रोहित देव कहते हैं कि भारत 1.47 अरब लोगों के लिए तेल खरीद रहा है। वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने यूक्रेन के युद्ध को फंड किया है। उन्होंने इस युद्ध को बढ़ावा दिया है और अमेरिका यूक्रेन को बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण भी दे रहा है। इसलिए इस युद्ध के असली फंडिंग करने वाले और इसे बढ़ावा देने वाले अमेरिका और यूरोपीय देश हैं, भारत नहीं।'
मार्केट एक्सपर्ट आकाश जिंदल कहते हैं कि यह कानून अमेरिका का दोहरा रवैया दिखाता है। वो कहते हैं, 'ट्रंप खुद ईरान से लेकर वेनेजुएला तक युद्ध को बढ़ावा दे रहे हैं और रूसी तेल को लेकर आरोप भारत पर लगा रहे हैं। अमेरिका यूक्रेन को हथियार और पैसे देकर संघर्ष भड़का रहा है।'
वो कहते हैं कि दबाव के बावजूद, भारत और रूस की दोस्ती कायम रहेगी। भारत रूस से तेल लेता रहेगा।
भारत का शीर्ष तेल सप्लायर है रूस
नए अमेरिकी कानून में उन देशों को निशाना बनाया जाएगा जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की ताकत दे देगा। अमेरिका ने इस प्रावधान के दायरे में भारत और चीन जैसे देशों को रखा है।
भारत के लिए यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि रूसी तेल पिछले कुछ वर्षों में भारतीय तेल आयात का बड़ा हिस्सा बन गया है। भारत अपनी जरूरत का 88% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। अगस्त के महीने में भारत के कुल तेल आयात का 40-45% हिस्सा रूस से आया।

अमेरिकी टैरिफ की धमकी से निर्यातक चिंतित
भारत ने अमेरिकी कानून का कड़ा जवाब दिया है, लेकिन यहां के निर्यातकों में काफी चिंता देखी जा रही है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा, 'यह चिंता का विषय है क्योंकि इससे अनिश्चितता बढ़ती है। साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि जिन उत्पादों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा, उनका निर्यात करना आर्थिक रूप से कितना सही रहेगा।'
अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन ए. शक्तिवेल ने कहा कि यह कानून अमेरिका के पास भारत पर अमेरिकी सामान पर टैरिफ कम करने के लिए दबाव बनाने का एक जरिया है।
TT Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर संजय के. जैन ने कहा कि यह कानून अमेरिका को टैरिफ लगाने के लिए कानूनी आधार और दबाव बनाने की ताकत देता है। हालांकिॉ, अमेरिका खुद महंगाई का सामना कर रहा है और ऐसा कोई भी कदम महंगाई को और बढ़ा सकता है और अनिश्चितता पैदा कर सकता है।







