
जापान में चल रहे एशियन गेम्स में ट्रैक पर मंगलवार को चार भारतीय महिलाएं दौड़ रही थीं, लेकिन उनके साथ सिर्फ देश की उम्मीद नहीं, उनकी अपनी-अपनी लंबी कहानियां भी दौड़ रही थीं। किरण पहल, एमआर पूवम्मा, प्राची चौधरी और विथ्या रामराज ने एशियन गेम्स में महिला 4x400 मीटर रिले का गोल्ड मेडल जीतकर भारत को एथलेटिक्स का बहुप्रतीक्षित गोल्ड दिलाया।
3 मिनट 29.69 सेकेंड में पूरी हुई इस दौड़ में चारों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन इस गोल्ड तक पहुंचने का रास्ता किसी के लिए आसान नहीं था। किसी को दौड़ने के लिए अपने गांव की सोच से लड़ना पड़ा, किसी ने डोपिंग बैन और डिप्रेशन के बाद वापसी की, किसी ने पुलिस की वर्दी का सपना संजोकर ट्रैक पर पसीना बहाया तो किसी ने ऑटो चलाने वाले पिता की बेटी से राष्ट्रीय रिकॉर्ड होल्डर बनने तक का सफर तय किया।

किरण पहल: दौड़ना सिर्फ खेल नहीं, बगावत भी था
सोनीपत की किरण पहल के लिए एथलेटिक्स चुनना इतना आसान नहीं था। उन्हें खेल में आगे बढ़ाने के लिए पूरे गांव के विरोध का सामना करना पड़ा। जहां बेटियों के भविष्य को लेकर समाज की अपनी तय धारणाएं थीं, वहां किरण ने ट्रैक को अपना रास्ता बनाया। आज वही किरण एशियन गेम्स में भारत की गोल्ड जीतने वाली रिले टीम का हिस्सा हैं। उनके लिए यह पदक सिर्फ टाइमिंग और मेडल का आंकड़ा नहीं, उस सोच के खिलाफ भी एक जवाब है जिसने कभी उनके दौड़ने पर सवाल उठाए थे।
प्राची चौधरी: आंखों में पुलिस की वर्दी का सपना
सहारनपुर के किसान परिवार से आने वाली प्राची चौधरी का सपना एथलेटिक्स से भी आगे का है। वह यूपी पुलिस में डीएसपी बनना चाहती हैं। जापान के नागोया जाने होने से पहले उन्होंने अपनी पुलिस वर्दी की माप तक दे दी थी। यानी एक तरफ एशियाई खेलों का ट्रैक था और दूसरी तरफ वह वर्दी, जिसे पहनने का सपना वह लंबे समय से देख रही थीं। प्राची के लिए दौड़ सिर्फ पदक जीतने की कोशिश नहीं थी। वह उस जिंदगी की ओर भी एक कदम थी, जिसमें वह ट्रैक के साथ-साथ वर्दी में भी नजर आना चाहती हैं।
एमआर पूवम्मा: बैन और डिप्रेशन के बाद आया गोल्ड
एमआर पूवम्मा इस टीम की सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में हैं। वह इससे पहले 2014 इंचियोन और 2018 जकार्ता एशियाई खेलों में भी स्वर्ण जीतने वाली टीम का हिस्सा रह चुकी हैं।
लेकिन उनका सफर हमेशा पदक की चमक वाला नहीं रहा। डोपिंग प्रतिबंध और डिप्रेशन के दौर ने उनके करियर को मुश्किल मोड़ पर पहुंचा दिया। वापसी के लिए उन्हें खुद को फिर से तैयार करना पड़ा। इस दौरान उनकी मां और पति ने उनका साथ दिया। कभी ट्रैक से दूर हुईं पूवम्मा ने फिर वापसी की और नागोया में भारत की गोल्ड जीतने वाली टीम का हिस्सा बनीं।
विथ्या रामराज: ऑटो ड्राइवर की बेटी ने 42 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ा

विथ्या रामराज की कहानी शायद इस टीम की सबसे सिनेमाई कहानी है। वह एक ऑटो-रिक्शा चालक की बेटी हैं। छोटे से परिवार से निकलकर उन्होंने एथलेटिक्स में अपनी जगह बनाई और नागोया में उतरने से पहले ही ऐसा रिकॉर्ड बना दिया, जो दशकों से कायम था। महिला 400 मीटर हर्डल्स में विथ्या ने पीटी उषा का 42 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने इसी एशियाई खेल में उस इवेंट में कांस्य पदक जीता और मिक्स्ड 4x400 मीटर रिले में भारत की रजत पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा भी बनीं।
और फिर आया महिला 4x400 मीटर रिले का गोल्ड।
एक तरफ किरण थीं, जिन्होंने समाज से लड़कर दौड़ने की जगह बनाई। दूसरी तरफ प्राची थीं, जिनकी नजर ट्रैक के साथ पुलिस की वर्दी पर भी है। पूवम्मा थीं, जिन्होंने बैन और डिप्रेशन के बाद वापसी की। और विथ्या थीं, जिन्होंने अपने पिता के ऑटो के संघर्ष भरे सफर से निकलकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक का सफर तय किया।
चार दौड़ें, चार संघर्ष और एक गोल्ड
नागोया के ट्रैक पर चारों ने सिर्फ रिले नहीं दौड़ी, अपने-अपने संघर्ष की आखिरी दौड़ भी पूरी की।




