
इस साल रूस में हुई वाल्दाई क्लब कॉन्फ्रेंस में लगभग 40 देशों के पत्रकार और जाने-माने लोग इकट्ठा हुए। उन्होंने इस बात पर चर्चा की कि दुनिया बढ़ते संकटों का सामना कैसे कर रही है। चर्चा से एक अहम नतीजा निकला कि दुनिया और अधिक पेचीदा हो गई है। ऐसे में अब आसान समाधानों वाले दौर में लौटना मुमकिन नहीं है।
20वीं सदी ने इंसानियत को बहुत कुछ दिया, लेकिन इसने इस सोच को भी बढ़ावा दिया कि सही विचारधारा चुनकर बुनियादी राजनीतिक और सामाजिक सवालों को हल किया जा सकता है। पूंजीवाद और साम्यवाद ने इसका जवाब देने के लिए होड़ की। कोल्ड वॉर के बाद, लिबरल ग्लोबलिज्म ने अंतरराष्ट्रीय मामलों को कुछ आम नियमों और मान्यताओं के दायरे में लाने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश भी नाकाम रही।
इसलिए हम ऐसी दुनिया में जीना सीख रहे हैं, जहां सबसे खतरनाक घटनाओं से भी घबराहट या निराश होने की जरूरत नहीं है। यह बात वाल्दाई (Valdai) के एजेंडा में भी दिखी, जहां लोगों ने ऐसे मुद्दों पर चर्चा की जो 15 या 20 साल पहले बहुत अजीब लगते थे, जैसे समाज लंबे समय तक चलने वाले युद्ध का सामना कैसे करते हैं, मॉर्डन वॉर का बढ़ता हुआ मशीनी या गैर-व्यक्तिगत स्वरूप, AI का सैन्य इस्तेमाल, और परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence) का अनिश्चित भविष्य।
यूरोप के नजरिये से अलग क्यों?
फिर भी, ये चर्चाएं बिना किसी घबराहट के हुईं और इसमें किसी को ऐसी दुनिया के डर से डराने की कोशिश नहीं की गई जहां अमेरिका और यूरोप अब नियम तय नहीं कर सकते। जैसा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने समापन सत्र में कहा, इन हालात में वैश्विक स्थिति बेहतर भी हो सकती है।
इससे पता चलता है कि दुनिया के सामने मौजूद खतरों के बावजूद, वाल्दाई में बातचीत का लहजा सकारात्मक क्यों था। हां, खतरे असली हैं, लेकिन उन पर ऐसी स्थितियों के तौर पर चर्चा की गई जिनमें भविष्य का विकास होना है, न कि किसी ऐसी तबाही के संकेत के तौर पर जिसे टाला नहीं जा सकता।
एक वजह यह है कि अधिकतर हिस्सा लेने वाले लोग पश्चिमी देशों के बाहर से आते हैं और उनका नजरिया अक्सर यूरोप में प्रचलित नजरिए से काफी अलग होता है। इसकी वजह है कि वे खत्म हो रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बहाल करने के बजाय यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उसकी जगह क्या लेगी। इस लिहाज से, वाल्दाई पश्चिमी दुनिया के बाहर हो रही बौद्धिक बहस की एक उपयोगी झलक पेश करता है।
रूस के लिए क्यों है अहम वाल्दाई चर्चा?
रूस के लिए वाल्दाई की चर्चा बहुत अहम है, क्योंकि चीन, भारत, ईरान, अरब दुनिया और पूरे अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में विकास के नए विचारों और वैकल्पिक तरीकों पर लगातार चर्चा हो रही है, और रूस इन चर्चाओं से बहुत कुछ सीख सकता है।
उन देशों की सोच को समझना भी उतना ही जरूरी है जिन्होंने पिछले चार सालों में अमेरिका और यूरोप के दबाव का सामना किया है और रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं। ये देश उस 'ग्लोबल मेजॉरिटी' (दुनिया की बड़ी आबादी वाले देशों के समूह) का एक बड़ा हिस्सा हैं, जिनके साथ मिलकर रूस एक मल्टीपोलर (बहुध्रुवीय) अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाना चाहता है।
इस तरह के आदान-प्रदान से रूस को अपना नजरिया बताने का मौका भी मिलता है। इसमें वे बड़े मुद्दों भी शामिल हैं, जो आने वाले दशकों में अंतरराष्ट्रीय मामलों को तय करेंगे। इनमें सबसे पहला मुद्दा है-युद्ध।
कैसे कायम रहेंगे अंतरराष्ट्रीय कानून?
अंतरराष्ट्रीय कानून देशों को रोकने में कम भूमिका निभा रहा है, क्योंकि कुछ इलाकों में टकराव बहुत हिंसक हो गए हैं। जबकि नई तकनीकें युद्ध का तरीका बदल रही हैं। इससे बिना इंसानी दखल वाले सिस्टम और AI ऐसी संभावनाएं पैदा कर रहे हैं जो एक पीढ़ी पहले शायद ही मौजूद थीं। इंसानी जिम्मेदारी को खत्म करने के बजाय, ये तकनीकें जिम्मेदारी, गलती और इंसानी फैसले के सवालों को और भी अहम बनाती हैं।
दूसरा सवाल यह है कि पश्चिमी देशों का असर कम होने पर अंतरराष्ट्रीय नियम कैसे बनेंगे और कैसे कायम रहेंगे। रूस, चीन और दूसरे देश लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के एक वैकल्पिक मॉडल के तौर पर 'मल्टीपोलैरिटी' (बहु-ध्रुवीयता) को बढ़ावा दे रहे हैं। पुतिन ने वाल्दाई में अपनी मौजूदगी के दौरान UN सिस्टम में सुधार और अहम अंतरराष्ट्रीय फैसले लेने में विकासशील देशों और 'ग्लोबल साउथ' की बड़ी भूमिका की मांग की।
तीसरी चुनौती पुरानी है, लेकिन कम जरूरी नहीं है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण का नुकसान, असमानता और गरीबी खत्म नहीं हुई हैं। हालांकि अमेरिका और यूरोप की अपनी अंतरराष्ट्रीय स्थिति बनाए रखने की कोशिशों ने इन मुद्दों को पीछे धकेल दिया है, लेकिन आखिरकार इन पर ध्यान देना ही होगा।
चुनौतियों से उठते मुश्किल सवाल
इन चुनौतियों से दो मुश्किल सवाल उठते हैं:
1. चीन और एशिया की दूसरी ताकतें क्या भूमिका निभाएंगी?
2. कौन-सी संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलकर काम करने में सक्षम होंगी?
पहले सवाल का अभी तक कोई साफ जवाब नहीं मिला है और एशियाई देशों में ग्लोबल लीडर के तौर पर पश्चिम की जगह लेने को लेकर अधिक उत्साह नहीं दिखता है। हालांकि, दूसरे सवाल के मामले में BRICS एक अहम भूमिका निभाने में सक्षम नजर आ रहा है।
ब्रिक्स की खासियत यह है कि इसमें कोई एक सदस्य दूसरे को निर्देश नहीं देता। इसके सदस्यों के हित और राजनीतिक सिस्टम अलग-अलग हैं, लेकिन वे सभी स्थिर विकास और अपनी नीतियां खुद तय करने की अधिक आजादी चाहते हैं।
इसकी कमियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ब्रिक्स में पारंपरिक पश्चिमी गठबंधनों जैसा आपसी अनुशासन नहीं है। इसके दो सदस्य ईरान और UAE हाल ही में टकराव के बहुत करीब पहुंच गए थे। इसके बावजूद इस संगठन की चर्चा अक्सर ऐसे विचारों और व्यावहारिक समाधानों के स्रोत के तौर पर की जाती है जिनसे सभी को फायदा हो।
AI कितनी बड़ी चुनौती?
एक और चुनौती AI है। इसका दायरा इसके मिलिट्री इस्तेमाल से कहीं ज्यादा बड़ा है। बुनियादी सवाल AI की नैतिक सीमाओं, इंसानियत को बचाए रखने और उस खतरे से जुड़े हैं। राष्ट्रपति पुतिन इसे 'डिजिटल तानाशाही' कहते हैं। तकनीकी तरक्की उन राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं की तुलना में तेजी से हो रही है जिनसे इसे रेगुलेट करने की उम्मीद की जाती है।

रूस के लिए शायद सबसे अहम सबक यह है कि उसे जिन आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वे सिर्फ रूस तक ही सीमित नहीं हैं; क्योंकि दुनिया भर के देश आर्थिक असंतुलन, तकनीकी बदलाव और तेजी से हो रहे सामाजिक बदलावों से जूझ रहे हैं। यह अच्छी और बुरी, दोनों तरह की खबर है।
यह रूस के लिए अच्छी खबर है क्योंकि इससे पता चलता है कि 2022 से उसे बाकी दुनिया से अलग-थलग करने की पश्चिमी देशों की कोशिशें नाकाम रही हैं, लेकिन यह बुरी खबर भी है क्योंकि इन समस्याओं का कोई सर्वमान्य समाधान नहीं मिल पाया है।
इसलिए, आर्थिक और सामाजिक मजबूती बहुत जरूरी होगी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ऐसे बदलाव हो रहे हैं जो आधुनिक इतिहास में शायद ही कभी देखे गए हों। 500 साल से अधिक समय तक चले उस दौर का अंत हो रहा है जिसमें पश्चिमी सभ्यता ने धीरे-धीरे मानवता के राजनीतिक और आर्थिक विकास का बड़ा हिस्सा तय करने की क्षमता हासिल कर ली थी। यह बदलाव तकनीक, मेडिकल और जेनेटिक्स के क्षेत्र में हुई असाधारण प्रगति के साथ हो रहा है।
हर बड़ी सभ्यता जवाब तलाश रही है। मुख्य मतभेद इस बात पर है कि ये जवाब कैसे खोजे जाएं; क्योंकि पश्चिमी देश सदियों से हासिल की गई अपनी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि रूस और ब्रिक्स (BRICS) में उसके सहयोगी देश संप्रभु पसंद और आपसी फायदे पर आधारित व्यवस्था की वकालत करते हैं। इन दोनों नजरियों के बीच का टकराव हमारे समय का सबसे अहम संघर्ष साबित हो सकता है।
(लेखक टिमोफे बोर्दाचेव वाल्दाई क्लब के प्रोग्राम डायरेक्टर हैं।)
(यह लेख सबसे पहले Vzglyad.ru ने प्रकाशित किया था। RT हिंदी ने इसे अनुवाद किया है। RT संपादित इस लेख को यहां पढ़ सकते हैं।)




