अगली जंग यहीं होगी? अमेरिका-यूरोप क्यों आमने-सामने
आर्कटिक में पिघलती बर्फ के साथ अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक होड़ भी तेज हो रही है। पढ़ें लेक्चरर और पूर्वी व मध्य यूरोप मामलों की विशेषज्ञ Ksenia Smertina का एनालिसिस।
विचार
अगली जंग यहीं होगी? अमेरिका-यूरोप क्यों आमने-सामने
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आर्कटिक में बर्फ पिघलने के साथ सिर्फ नए समुद्री रास्ते नहीं खुल रहे, बल्कि दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच रणनीतिक मुकाबला भी तेज हो रहा है। रूस और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बीच अब अमेरिका और यूरोप के हित भी इस इलाके में टकराने लगे हैं। सितंबर में फिनलैंड के लैपलैंड में हुआ आर्कटिक समिट और उसके बाद कनाडा के साथ EU की बातचीत इसी बदलती तस्वीर का संकेत है। यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कनाडा को EU का एसोसिएट सदस्य बनाने का प्रस्ताव दिया। दूसरी तरफ अमेरिका ने ग्रीनलैंड के साथ अपनी नई व्यवस्था के जरिए आर्कटिक में अपनी मौजूदगी और मजबूत की है।

पर्यावरण से 'हार्ड पावर' तक पहुंचा यूरोप

आर्कटिक में EU की स्थिति अमेरिका से कमजोर है। ब्रेक्सिट के बाद EU की अपनी कोई संप्रभु सीमा सीधे आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़ती। नॉर्वे और आइसलैंड EU के सदस्य नहीं हैं, ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, जबकि फिनलैंड और स्वीडन भौगोलिक रूप से आर्कटिक महासागर से कटे हुए हैं। EU के पास अपना स्वतंत्र आर्कटिक आइसब्रेकर बेड़ा भी नहीं है। इसलिए लंबे समय तक उसकी नीति पर्यावरण, जलवायु निगरानी और मूलनिवासी लोगों के अधिकारों तक सीमित रही।

लेकिन 2022 के बाद तस्वीर बदलने लगी। लैपलैंड समिट में आर्कटिक को 'जियोपॉलिटिकल हॉटस्पॉट' माना गया और सैन्य गतिशीलता, सैटेलाइट निगरानी और उत्तरी बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया गया। रूस के 'शैडो फ्लीट' को रोकने की बात भी हुई।

EU की नई आर्कटिक स्ट्रैटजी अक्टूबर 2026 में आने वाली है, यानी ब्रसेल्स की आर्कटिक नीति अब पर्यावरण से आगे बढ़कर सुरक्षा और 'हार्ड पावर' पर केंद्रित हो रही है।

नक्शे पर कहां है आर्कटिक?

अमेरिका का आर्कटिक में मजबूत सैन्य ढांचा

अमेरिका आर्कटिक में कई दशकों से अपना सैन्य ढांचा मजबूत कर रहा है। अलास्का में उसके पास F-35 और F-22 लड़ाकू विमानों के बड़े ठिकाने हैं। अमेरिकी परमाणु पनडुब्बियां बर्फ के नीचे भी काम कर सकती हैं। अमेरिका अब आइसब्रेकर की संख्या भी बढ़ा रहा है। Bollinger शिपयार्ड करीब 50 साल बाद अपना पहला भारी आइसब्रेकर USCGC Polar Sentinel बना रहा है। 2030 तक दो और भारी आइसब्रेकर बनाने की योजना है। इसके अलावा Nome में सैन्य बंदरगाह बनाने और Northwest Passage में अपने जहाजों की आवाजाही का अधिकार मजबूत करने की कोशिश भी हो रही है।

लेकिन अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक कदम ग्रीनलैंड को लेकर है।

ग्रीनलैंड बना असली मोर्चा

सितंबर में अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच हुए समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का रास्ता मिला। Narsarsuaq और Mestersvig में सैन्य ठिकानों को फिर से खोलने और US के Pituffik एयरबेस को आधुनिक बनाने की योजना है। साथ ही गैर-NATO और गैर-यूरोपीय देशों के बड़े निवेशों पर रोक का रास्ता भी बनाया गया है। यानी ग्रीनलैंड तेजी से अमेरिकी रणनीतिक गढ़ में बदल रहा है। यही यूरोप के लिए चुनौती है।

क्या अमेरिका और यूरोप सच में दुश्मन बनेंगे?

अभी अमेरिका और EU NATO के सहयोगी हैं और रूस-चीन का मुकाबला करने में उनके साझा हित हैं। इसलिए इसे सीधी सैन्य जंग कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन आर्कटिक में बंदरगाहों, समुद्री रास्तों, संसाधनों और निवेश को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। अमेरिका ग्रीनलैंड के जरिए सैन्य पकड़ मजबूत कर रहा है, जबकि EU कनाडा और स्कैंडिनेवियाई देशों के जरिए अपनी आर्थिक और राजनीतिक भूमिका बनाए रखना चाहता है।

यह पारंपरिक युद्ध से ज्यादा भू-आर्थिक और रणनीतिक टकराव हो सकता है।

फायदा रूस और चीन को?

अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा रूस और चीन के लिए अवसर पैदा कर सकती है। रूस नॉर्दर्न सी रूट को सुरक्षित, सालभर चलने वाले वैश्विक समुद्री मार्ग के रूप में विकसित कर रहा है। उसके पास दुनिया का एकमात्र परमाणु आइसब्रेकर बेड़ा है। चीन भी 'Ice Silk Road' रणनीति के तहत आर्कटिक में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है और रूस के आर्कटिक LNG प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहा है।

इसलिए आर्कटिक की अगली बड़ी लड़ाई जरूरी नहीं कि मिसाइलों से लड़ी जाए। यह समुद्री रास्तों, बंदरगाहों, संसाधनों, निवेश और रणनीतिक प्रभाव की लड़ाई भी हो सकती है और इस बदलते समीकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और यूरोप अपने साझा NATO हितों को ऊपर रखेंगे, या आर्कटिक दोनों के बीच नई रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान बन जाएगा?

(डिस्क्लेमर: यह लेख RT.com पर प्रकाशित Ksenia Smertina के मूल लेख पर आधारित है। लेखिका HSE Institute for Media में सीनियर लेक्चरर और Russian International Affairs Council में पूर्वी और मध्य यूरोप मामलों की विशेषज्ञ हैं। इसमें व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं।)

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