
“मुझे एक बड़ा फैसला लेना है:
जब डील हो सकती हो, तब क्या हम इस देश का पुनर्निर्माण करते हुए पहले से भी कहीं महान बनाएं, शायद मध्य-पूर्व या यहां तक कि पूरी दुनिया के सबसे महान देशों में से एक?
...या फिर मैं इसका सर्वनाश कर दूं? और क्या मैं इसका सर्वनाश इतनी तेजी से करूं कि उसे लोगों और देशों को मारने या तबाह करने का मौका ही न मिले? क्या मैं उन्हें सीधे नरक में धकेल दूं, जहां उनके बचने की कोई गुंजाइश न हो और भविष्य में किसी महानता या सम्मान की कोई उम्मीद न बचे?"
आपको शायद जानकर हैरानी होगी कि ये बात एक ऐसे देश का राष्ट्रपति कह रहा है, जो खुद को दुनिया की सुपरपावर कहता है। वह भी उस मंच से जिसे दुनिया की सबसे बड़ी वैश्विक संसद कहा जाता है और जिसके आंगन में बैठकर 193 देश दुनिया के प्रमुख मुद्दों पर विचार-विमर्श और नीतियों पर चर्चा करते हैं। वही मंच जो दुनिया भर में शांति, बहुपक्षवाद और संवाद को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में जिस देश के लिए ये बात कही, वो तो आप समझ ही गए होंगे, नाम है- ईरान। वही ईरान जिसके साथ पिछले करीब 7 महीने से ट्रंप पूरे जी-जान से जंग में जुटे हुए हैं। और हर तरह के दांवपेंचों, तमाम तिकड़मों, प्रतिबंधों के बावजूद उससे अपनी बात मनवाने में अब तक सफल होते नहीं दिख रहे। अब ईरान को 'नरक में धकेलने' और 'सर्वनाश' की धमकी उस गहरी बौखलाहट और छटपटाहट को दिखाती है, जिससे अमेरिका इस वक्त गुजर रहा है।
.@POTUS: I have a big decision to make. Will a deal be made with Iran that lets them rebuild and create a far greater country than it ever was before — maybe one of the greatest in the Middle East or even the world? Or do I annihilate the Islamic Republic, and do it quickly,… https://t.co/RxA76o2HKUpic.twitter.com/0IWfkVxTyj
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) September 22, 2026
ईरान पर ट्रंप के अधिकतर दांव फेल
अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर अचानक हमला बोला था और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई नेता-अधिकारियों की हत्या कर दी थी। उस वक्त ट्रंप ने इसे महज एक-दो हफ्तों का युद्ध बताया था और कहा था कि तेहरान जल्द ही सरेंडर कर देगा।
मगर ईरान ने सरेंडर नहीं, पलटवार किया। उसने मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना तो बनाया ही, दुनिया के समुद्री व्यापार की मजबूत नब्ज दबा दी। इससे पूरी दुनिया, यहां तक कि अमेरिका खुद बिलबिला उठा। ट्रंप ने इस युद्ध को अपने मन-मुताबिक अंजाम तक पहुंचाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद हर नीति आजमाई, लेकिन नतीजा क्या रहा, ये दुनिया के सामने है।
फिलहाल यह युद्ध अनंत हो चुका है, जिसका फिलहाल कोई अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है। ये सिलसिला कब तक चलेगा, कोई ठीक-ठाक नहीं कह सकता। खुद अमेरिका इस युद्ध में गहरे तक धंस चुका है और इससे बाहर निकलने के लिए बेचैन हो रहा है। ये बेचैनी गाहे-बगाहे ट्रंप के फैसलों में नजर आ रही है।
ट्रंप ने ईरान के सभी स्ट्रैटेजिक ठिकानों पर हमले से लेकर बैन और सेकेंडरी बैन लगाने जैसे सभी तरीके इस्तेमाल किए, लेकिन अब तक उनको वह रास्ता नहीं मिला जो इस युद्ध से बाहर निकाल दे। लिहाजा ईरान युद्ध में बुरी तरह फंस चुके अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार फिर उस देश की सभ्यता मिटाने की धमकी दी है।
ईरान को नरक में धकेलने की धमकी
ट्रंप ने कहा कि या तो ईरान के साथ महान समझौता होगा, या फिर मैं इस इस्लामिक राष्ट्र का पूरी तरह से सफाया कर दूंगा और उन्हें कभी कोई मौका नहीं दूंगा। मैं उन्हें नरक में धकेल दूंगा, जहां उनके बचने का कोई मौका नहीं होगा और भावी पीढ़ियों के लिए महानता की कोई उम्मीद नहीं होगी। मगर मुझे विश्वास है कि हम चुनाव के ठीक बाद एक डील कर लेंगे, क्योंकि उनके लिए समझौता न करना बेवकूफी होगी। वे यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि मैं मिड-टर्म चुनावों में कैसा परफॉर्मेंस देता हूं।
ईरान को लेकर सबसे बड़ा विरोधाभास
ट्रंप ने ऐसा पहली बार नहीं कहा है। याद होगा, वह एक बार पहले भी ईरानी सभ्यता के समूल नाश की बात कह चुके हैं। अब उन्होंने फिर से कुछ ऐसी ही बात दोहराई है।
उनके इस रवैये का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वो उसी ईरान के लोगों के लिए ये बातें कह रहे हैं, जिसकी हिफाजत का उन्होंने वादा किया था। फरवरी में युद्ध छिड़ने से कुछ समय पहले ट्रंप ने ईरान की जनता से कहा था कि वह ईरान की सरकार से उनकी आजादी और खुशहाली में उनके साथ खड़े हैं।
अब UNGA के मंच से ट्रंप का खुद से ये सवाल पूछना कि क्या मैं उन्हें नरक में धकेल दूं और उनका सर्वनाश कर दूं? ये दिखाता है कि उन्होंने ईरानी शासन और आम जनता के बीच का फर्क पूरी तरह मिटा दिया है।
ईरान की सदियों पुरानी महान सभ्यता, वहां के आम वाशिंदे, महिलाएं-बच्चे और आने वाली पीढ़ियां, आखिर उनका क्या कसूर है? एक पूरी सभ्यता और उसकी भावी पीढ़ियों के समूल विनाश की धमकी किसी भी मानवीय या अंतरराष्ट्रीय कानून के पैमाने पर जायज नहीं ठहराई जा सकती।
ईरान के खिलाफ नैरेटिव बनाने का प्रयास
ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपने विचारों को दुनिया पर थोपने की एक और बार कोशिश की। कहा कि मैं सभी देशों से आह्वान करता हूं कि जब तक ईरान कमर्शियल जहाजों पर अपने हमले बंद नहीं कर देता, अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को छोड़ नहीं देता और आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं कर देता, तब तक उसका पूरी तरह आर्थिक बहिष्कार लागू करने में हमारा साथ दें।
उन्होंने कहा कि यदि हम एकजुट खड़े रहे, तो जल्द ही ईरानी आतंक के पिछले 51 साल के खतरे से मुक्त दुनिया देखेंगे और तेल की कीमतें संघर्ष की शुरुआत की तुलना में भी बहुत नीचे गिर जाएंगी, जो अमेरिका में बहुत कम थीं।
घरेलू राजनीति और चुनावी दबाव?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने हमलों को जायज ठहराते हुए आरोप लगाया कि ईरानी शासन ने मिसाइलों और हथियारों का विशाल भंडार बनाना जारी रखा था, जिससे पूरे क्षेत्र में मौजूद हर अमेरिकी सैनिक और बाकी सभी की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया था।
ट्रंप ने कहा कि ईरान ने एक ऐसी क्षमता हासिल कर ली थी, जो यूरोप तक वार करने में सक्षम थी और उन्हें इस पर गर्व था। मुझे उम्मीद है कि यूरोपीय लोगों को यह एहसास होगा। ईरान का लक्ष्य इस पारंपरिक बैलिस्टिक ढाल के पीछे छिपे रहकर परमाणु बम बनाने की अपनी सनक को पूरा करना था, क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें रोकने के किसी भी प्रयास को परमाणु विनाश का सामना करना पड़ेगा। लेकिन अब वो परमाणु बम कभी नहीं बना सकेंगे।
दरअसल, ट्रंप की इस उग्र बयानबाजी के पीछे एक वजह घरेलू राजनीति और चुनावी दबाव भी है। अमेरिका में नवंबर में मिडटर्म इलेक्शन होने हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण बता रहे हैं कि ट्रंप को नापसंद करने वालों की बड़ी संख्या है। अगर ये नापसंदगी वोटों में तब्दील हुई तो ट्रंप की ठसक अमेरिकी कांग्रेस में कमजोर हो जाएगी।
ईरान की सरकार से मतभेद होना, उसकी नीतियों का विरोध करना या उस पर कूटनीतिक दबाव बनाना एक बात है, लेकिन एक पूरे देश, उसकी संस्कृति और उसकी भावी पीढ़ियों के सर्वनाश की धमकी देना उस बौखलाहट को दर्शाता है, जहां हताशा विवेक पर पूरी तरह हावी हो चुकी हो।




