
दवाओं की कीमतों में मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) के नाम पर किस कदर लूटखसोट होती है, इसका उदाहरण मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में दिखा। अदालत ने आवश्यक दवाओं की कीमतों में अत्यधिक मुनाफाखोरी को लेकर केंद्र सरकार और प्राइवेट अस्पतालों से तीखे सवाल पूछे। रिटेल कीमतें तय करने के मौजूदा सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने अस्पतालों के भारी-भरकम मार्जिन को “लूट” और “डकैती” करार दिया। पूरा मामला बताएंगे और ये भी समझाएंगे कि 10, 20 और 50, 100 रुपये की दवाएं किस तरह मरीजों तक पहुंचते-पहुंचते हजारों और लाखों रुपये की हो जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा, ये 'लूट' और 'डकैती'
पहले जानए कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय में मंगलवार को गैर-अनुसूचित दवाओं यानी ऐसी दवाएं जिनकी कीमतों पर सरकार का सीधा कंट्रोल नहीं होता, और मेडिकल सामान की कीमतों व मुनाफे की लिमिट तय करने वाली याचिका पर सुनवाई हो रही थी। कोर्ट ने सुनवाई पूरी करके अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, लेकिन इससे पहले सरकार और प्राइवेट अस्पतालों को आईना दिखाया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक दवा डीलर के साथ हुई घटना का उदाहरण दिया। डीलर की पत्नी का एक नामी प्राइवेट अस्पताल में कैंसर का इलाज चल रहा था। उसने अस्पताल से गुजारिश की कि मैं खुद एक डीलर हूं और मुझे कीमोथेरेपी का ये इंजेक्शन 11,000 रुपये के डीलर प्राइस पर मिलता है। इसके बावजूद अस्पताल ने बाहर से लाया गया वह इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए 1,30,000 रुपये वसूले। कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या आप इस 'डकैती' का कोई वाजिब कारण बता सकते हैं? कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों है? यह सारा पैसा किसकी जेब में जा रहा है?
रिटेलर मूल्य और MRP में इतना अंतर क्यों?
जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि सरकार मूल्य निर्धारण नीतियों को लगातार कैलिब्रेट (संतुलित) करती रहती है। इस पर बेंच ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि आपका यह कैलिब्रेशन किस काम का है? 11 हजार रुपये से सीधे 1,30,000 रुपये कर देना कोई संतुलन नहीं कहलाता। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह अस्पताल डाका नहीं डाल सकते। दवाओं का बेस प्राइस यानी रिटेलर मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में इतना भारी अंतर क्यों हो जाता है? पूरा तंत्र मरीजों के बजाय दवा निर्माताओं की मदद करता क्यों नजर आ रहा है?
सुप्रीम कोर्ट ने बाजार में दवाओं की कीमतों को ठीक से नियंत्रित न कर पाने के लिए सरकार की खिंचाई की। कहा कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) पूरी तरह से निष्क्रिय दिखता है। इस सवाल पर जब सरकार का पक्ष रख रहीं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि भारत में दुनिया की सबसे सस्ती दवाएं मिलती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट और नाराज हो गया। कोर्ट ने कहा कि देश की कम प्रति व्यक्ति आय को ध्यान में रखे बिना इस बात का आकलन नहीं किया जा सकता। जस्टिस मेहता ने कहा, “मरीजों की तुलना व्यापार से मत कीजिए।”
15 रुपये की ड्रिप 250 में क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक ड्रिप लाइन का उदाहरण दिया, जिसे दुकानदार मात्र ₹15 में खरीदते हैं और उसे मरीजों को ₹250 में बेचते हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि जब इतना बड़ा अंतर है, तो ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) का क्या मतलब रह जाता है? कोर्ट ने कहा कि अस्पताल डाका डालकर नहीं चल सकते।”
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में कहा गया है कि देश की लगभग 82% दवाएं Scheduled Category से बाहर हैं, जिससे कंपनियों को अपनी मर्जी से मनमाना MRP तय करने की छूट मिल जाती है। याचिका में मांग की गई है कि नॉन-शेड्यूल दवाओं की शुरुआती कीमतों को नियंत्रित किया जाए, मेडिकल डिवाइसेज (उपकरणों) की कीमतें तय हों, और डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना जरूरी किया जाए। अदालत ने इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
शेड्यूल्ड और नॉन शेड्यूल्ड कैटेगरी का खेल क्या है?
नॉन-शेड्यूल दवाएं वे होती हैं जिन पर सरकार यानी राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) का सीधा नियंत्रण नहीं होता है। असली खेल इन्हीं दवाओं में होता है। एक मेडिकल रिप्रजेंटिव (MR) ने RT हिंदी को अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि दवाओं के मैन्यूफैक्चरिंग मूल्य और एमआरपी में जमीन आसमान का अंतर शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड लिस्टिंग की वजह से होता है। यही दवा बाजार में एक ऐसा बड़ा लूपहोल है, जिससे 50 और 100 रुपये की दवाएं हजारों रुपये में बिकती हैं।
शेड्यूल्ड कैटेगरी मेडिसिन
उन्होंने बताया कि शेड्यूल्ड मेडिसिन में वो ड्रग आती हैं, जिन्हें राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) में शामिल किया गया है। इसमें शुगर, बीपी, हार्ट, बुखार आदि की दवाएं होती हैं। इन पर NPPA का सख्त नियंत्रण होता है और सरकार ही इसकी एमआरपी तय करती है। इसमें रिटेलर का मुनाफा 15-16 फीसदी तक होता है।
नॉन शेड्यूल्ड कैटेगरी मेडिसिन
मेडिकल रिप्रजेंटिव ने बताया कि जो दवाएं NLEM की लिस्ट से बाहर होती हैं वह नॉन-शेड्यूल्ड कैटेगरी में आती हैं। इसमें बाजार में बिकने वाली लगभग 80-82% दवाएं और मेडिकल उपकरण शामिल होते हैं। इनका पेटेंट कंपनियां खुद कराती हैं और वह अपनी मर्जी से MRP भी तय करती हैं। सरकार इसमें सिर्फ यह देखती है कि कंपनी 1 साल में 10% से अधिक MRP न बढ़ा पाए।
कैसे होता है दवाओं की कीमत में खेल?
एमआर ने बताया कि घुटनों के दर्द में राहत देने वाला नॉन शेड्यूल्ड कैटेगरी का एक इंजेक्शन जिसकी मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट करीब 100 रुपये होती है, लेकिन वह लगभग 16,000 रुपये तक की एमआरपी पर बिकता है। इसी तरह कैंसर की एक दवा है, जिसकी मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट 50 रुपये तक आती है और वह बाजार में 14,000 से 15,000 रुपये में बिकती है।
उन्होंने बताया कि यह खेल PTR (Price to Retailer) और MRP (Maximum Retail Price) के भारी अंतर के आधार पर चलता है। इसमें दवा निर्माता और दवा बिक्रेता दोनों ही भारी मुनाफा कमाते हैं। मरीजों की जेब पर इसका बहुत अधिक बोझ पड़ता है।
इसमें PTR वह कीमत होती है, जिस पर दवा कंपनी किसी अस्पताल या रिटेलर को दवा बेचती है। वहीं MRP दवा के डिब्बे या पैकेट पर छपा हुआ अधिकतम मूल्य होता है, जिसे सीधे मरीज से वसूला जाता है। इसमें खेल यह होता है कि दवा कंपनियां पीटीआर बहुत कम रखती हैं और एमआरपी सैकड़ों हजारों गुना बढ़ा देती हैं।
दवाओं की मैन्यूफैक्चरिंग और MRP में कितना अंतर
एमआर ने RT हिंदी से कई दवाओं का मैन्यूफैक्चरिंग मूल्य और एमआरपी बताया।
| मेडिसिन | मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट | MRP (रुपये में) |
| एक कैंसर ड्रग 120 mg | 1000 रुपये | 21,617 |
| कैंसर ड्रग 440 mg | 66,00 रुपये | 57,457 |
| कैंसर ड्रग 400 mg | 5,850 | 62,690 |
| इंसुलिन का इंजेक्शन | 160 | 7,110 |
| चर्म रोग की ड्रग | 118 | 4,416 |
अस्पताल और बड़ी फार्मेसी का क्या गेम?
एमआर ने बताया कि दवाओं की मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट, रिटेलर प्राइस और एमआरपी के इसी खेल के चलते निजी अस्पताल या बड़ी फॉर्मेसी केवल उन्हीं कंपनियों से दवाइयां और उपकरण खरीदना पसंद करते हैं, जो उन्हें सबसे ज्यादा मार्जिन या डिस्काउंट देती हैं। कई बार तो 100-200% से लेकर सैकड़ों गुना दाम पर दवाएं बेची जाती हैं।




