कैंपस से कोर्ट की चौखट तक नापी, पर 20 साल से जामिया में छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं हो पाए?
1981-82 में पहली बार जामिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। 16 साल बाद 1997 में छात्रसंघ चुनाव रोक दिए गए। करीब 8 साल बाद, 2005 में जामिया में चुनाव हुए, लेकिन एक साल बाद ही छात्र संघ को भंग कर दिया गया। तब से चुनाव नहीं हो पाए हैं।
भारत
कैंपस से कोर्ट की चौखट तक नापी, पर 20 साल से जामिया में छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं हो पाए?
जामिया में क्यों नहीं हो पा रहे चुनाव

जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI), देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में इसकी गिनती होती है। देश के कोने-कोने से स्टूडेंट्स यहां पढ़ने आते हैं। दिल्ली के नक्शे में देखेंगे तो यह बिल्डिंग आपको दक्षिणी पूर्वी हिस्से में दिखेगी। पहुंचने के लिए मेट्रो और सड़क पर चलते ढेरों पब्लिक ट्रांसपोर्ट हैं, लेकिन जामिया के अंदर इस वक्त एक आंदोलन चल रहा है। आंदोलन करने वाले छात्रों के एक बड़े वर्ग की शिकायत है कि जामिया प्रशासन पिछले 20 साल से छात्र संघ चुनाव नहीं करा रहा है। इसके लिए स्टूडेंट्स ने पुलिस की लाठियां खाईं, झड़पें हुईं और 5, 6 छात्र तो भूख हड़ताल पर बैठ गए।

12 अक्टूबर से जारी इस गतिरोध पर 26 अक्टूबर यानी सोमवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों की मांगें मान लीं। जामिया छात्रसंघ चुनाव कराने पर राजी हो गया, लेकिन छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने के बाद। प्रशासन का कहना है कि हमने यह फैसला भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों और उनके प्रतिनिधियों की मांगों पर विचार करने के बाद लिया है। इसके बावजूद छात्रों ने आंदोलन खत्म नहीं किया क्योंकि प्रशासन की तरफ से उन्हें चुनाव की तारीख अभी भी नहीं बताई गई है।

बात सिर्फ इतनी नहीं है। इस आंदोलन के तार साल 2005 और उससे पहले हुए छात्रसंघ चुनाव से जुड़े हैं। आखिर जामिया में 20 साल से छात्र संघ चुनाव क्यों नहीं हो रहे, यूनिवर्सिटी के कैंपस से मामला कैसे कोर्ट की चौखट तक भी गया, फिर भी एक चुनाव में इतना लंबा वक्त क्यों लग रहा है?

पहले ताजा अपडेट्स जान लीजिए

ताजा खबर ये है कि दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया ने छात्र संघ चुनाव (JMISU) कराने पर सहमति दे दी है। यह चुनाव छात्र संघ के संविधान (नियमावली) को आधिकारिक मंजूरी मिलने के बाद कराए जाएंगे। विश्वविद्यालय ने यह फैसला पांच छात्रों की दो हफ्ते से जारी भूख हड़ताल के मद्देनजर लिया। हालांकि घोषणा के कुछ ही घंटों बाद, प्रदर्शनकारी छात्रों के एक समूह ने कुलपति मजहर आसिफ को पत्र लिखकर आदेश में बदलाव की मांग कर दी। छात्रों का कहना है कि उनकी मांगें पूरी तरह से नहीं मानी गई हैं। 12 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठे पांच में से तीन छात्रों ने अपनी हड़ताल जारी रखने का ऐलान कर दिया।

रजिस्ट्रार कार्यालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है,

“छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने की तारीख से 15 दिनों के अंदर जामिया मिलिया इस्लामिया छात्र संघ (JMISU) के चुनाव कराए जाएंगे।' लेकिन इस आदेश में मंजूरी के लिए कोई तय समय-सीमा नहीं दी गई है, जो कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों की मुख्य मांग रही है।

इस बीच, विश्वविद्यालय के नए आदेश में छात्रों को दो और आश्वासन दिए गए हैं। इनमें विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों को जारी किए गए निलंबन (सस्पेंशन) और कारण बताओ (शोकॉज) नोटिस को रद्द करना शामिल है। आदेश में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई की जांच के लिए एक समिति गठित की जाएगी।

जामिया का आदेश

विश्वविद्यालय का यह कदम भूख हड़ताल कर रहे छात्रों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा रविवार को सौंपे गए मांग पत्र के बाद आया है। छात्रों ने अपने पत्र में साफ कर दिया था कि प्रदर्शन खत्म करने के लिए उन्हें लिखित में आश्वासन चाहिए।

पत्र में कहा गया, “हम भूख हड़ताल और धरना प्रदर्शन तभी खत्म करेंगे, जब विश्वविद्यालय प्रशासन हमारी मांगों को स्वीकार करते हुए लिखित में सहमति देगा।”

जामिया में प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर

जामिया में 20 साल से क्यों रुके थे चुनाव?

इसके लिए 45 साल पहले जाना होगा। 1981-82 में पहली बार जामिया में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। केंद्र में तब इंदिरा गांधी की सरकार थी। 16 साल बाद यानी 1997 में कैंपस के अंदर का माहौल ठीक नहीं है, बताकर जामिया प्रशासन ने छात्रसंघ चुनाव को रोक दिया। तब केंद्र में यूनाइटेड फ्रंट (United Front) सरकार थी। उस साल उसके दो प्रधानमंत्री बने। शुरू में एच. डी. देवगौड़ा, फिर 21 अप्रैल 1997 से इंद्र कुमार गुजराल।

1998 से 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, पर जामिया में कोई चुनाव नहीं हुए। 2005 में जाकर जामिया में चुनाव हो पाए, मतलब करीब 8 साल बाद। तब केंद्र में सरकार भी बदली थी। यूपीए-1 का राज था, लेकिन एक साल बाद जामिया छात्र संघ फिर संकट में आ गया। 31 मार्च 2006 को छात्र संघ को भंग कर दिया गया। कारण दिया गया कि वहां हिंसा के चलते चुनाव कराने की अनुकूल स्थिति नहीं बन रही है।

जामिया चुनाव की टाइमलाइन

2012 में मामला फिर गरमाया। मई महीने में मुद्दा राज्यसभा तक गया, पर नतीजा वही रहा, चुनाव नहीं हुए। उस दौरान वीसी पर हमले के आरोप भी लगे। 2012 में मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने कमेटी बनाने को कहा, पर चुनाव तुरंत कराने पर चुप्पी साध ली। 2017 में छात्रों ने फिर चुनाव कराने की मांग की, मगर जामिया प्रशासन ने कोर्ट का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया। 

याचिका दाखिल होने के 10 साल बाद 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पिटीशन खारिज कर दी, हालांकि चुनाव कराने पर तब भी रोक नहीं लगाई। मुद्दे को यूनिवर्सिटी लेवल पर छोड़ दिया गया।

कोर्ट में क्या-क्या हुआ

कब कौन रहा छात्र संघ अध्यक्ष?

  • 1981-82 जुबैर खान जामिया के पहले निर्वाचित छात्रसंघ अध्यक्ष बने। उस चुनाव में रिजवान अली खान उपाध्यक्ष, आफताब अहमद महासचिव और जलालुद्दीन संयुक्त सचिव चुने गए।
  • 2005-06 शम्स परवेज स्टूडेंट यूनियन प्रेसिडेंट चुने गए। उन्होंने बताया कि उन्हें करीब 1300-1350 वोट मिले थे। उनका कार्यकाल 31 मार्च 2006 तक रहा।

संविधान तैयार करने वाली कमिटी में कौन?

अब छात्रों के आंदोलन को देखते हुए जामिया प्रशासन ने छात्र संघ चुनाव आयोजित करने पर सहमति दे दी है, साथ ही अलग से एक कमिटी भी बनाई है, जो स्टू़डेंट यूनियन का संविधान तैयार करने का काम करेगी। जामिया रजिस्ट्रार की तरफ से 21 अक्टूबर को जारी आदेश में इस कमिटी के अध्यक्ष और सदस्यों की घोषणा की गई। प्रो. जुबैर मीनाई को कमिटी का अध्यक्ष और लुकमान अहमद खान, असलम खान, एम. अमरजीत सिंह और नीलोफर अफजल को सदस्य बनाया गया है।

कमिटी को जामिया छात्र संघ भंग किए जाने की वजहों, विभिन्न अदालतों के इस बारे में फैसलों और 2007 में लिंग्दोह कमिटी की सिफारिशों पर विचार करके अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है। कमिटी से छात्रों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ बातचीत करके 20 दिसंबर 2026 तक संविधान का मसौदा तैयार करके देने को कहा गया है।

जामिया प्रशासन ने छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए कमिटी तो बना दी है, 20 दिसंबर तक ड्राफ्ट तैयार करने का निर्देश भी दिया है, लेकिन ये साफ नहीं है कि संविधान को मंजूरी कब तक मिल पाएगी, चुनाव कब तक हो पाएंगे, तब तक छात्रों का आंदोलन क्या रूप लेगा, ये देखने की बात होगी।

ताज़ा ख़बरें