भारत में नवरात्रि का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है और मंगलवार को दशहरा मनाया जाएगा। दशहरा, बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। रावण का पुतला जलाया जाता है। जगह-जगह दस सिरों वाले दशानन के पुतले बनाए गए हैं, जिन्हें बुराई के प्रतीक के रूप में जला दिया जाएगा। भारत से दूर रूस में भी इसी तरह का एक त्योहार मनाया जाता है। उसमें भी पुतले को जलाया जाता है।
हां, रूस में इस त्योहार को मस्लेनित्सा कहा जाता है। इसे सर्दियों को विदाई देने और वसंत के स्वागत के तौर पर मनाया जाता है। यह प्यारा वीडियो देखिए।
सर्दियों को विदा करने का रूसी अंदाज
मस्लेनित्सा रूस का एक बहुत पुराना लोक त्योहार है। यह सात दिन तक मनाया जाता है और लेंट यानी ईसाई धर्म में उपवास का समय शुरू होने से ठीक पहले आता है।
इस दौरान पारंपरिक तौर पर मक्खन, दूध और अंडों से बने पैनकेक खूब खाए जाते हैं। यही वजह है कि मस्लेनित्सा को कई जगह 'पैनकेक वीक' या 'बटर वीक' भी कहा जाता है।
इस दौरान लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और परिवार के साथ बैठकर खाना खाते हैं।
इस त्योहार में ईसाई और ईसाई धर्म से पहले की मान्यताओं, दोनों की झलक मिलती है। इसकी तारीख हर साल ईस्टर की तारीख के हिसाब से बदलती है। साल 2026 में मस्लेनित्सा 16 से 22 फरवरी तक मनाया गया था। यह वीडियो भी देखिए।
400 साल पुराना कनेक्शन
मस्लेनित्सा का सबसे पुराना लिखित जिक्र 16वीं सदी में मिलता है। पुराने समय में लोग इस त्योहार की तैयारियां एक हफ्ते पहले से ही शुरू कर देते थे। मस्लेनित्सा वीक से पहले आने वाले शनिवार को 'छोटी मस्लेनित्सा' कहा जाता था। इस दिन लोग अपने पूर्वजों को याद करते थे।

बदलते समय के साथ मस्लेनित्सा वीक का रंग-रूप बदला है। बर्फ पर फिसलने वाली स्लेज की सवारी, घोड़ों की गाड़ी में घूमना, मुक्केबाजी जैसे मुकाबले और सास-दामाद के बीच हंसी-मजाक ने इसे रूस के सबसे दिलचस्प रूसी त्योहारों में शामिल कर दिया है।
सात दिन तक चलने वाले इस उत्सव में कहीं पैनकेक बनते हैं, कहीं लोकगीत गूंजते हैं, तो कहीं लोग बर्फ पर फिसलने और खुले मैदानों में होने वाले खेलों का मजा लेते हैं। आखिर में पुआल से बने पुतले को आग के हवाले किया जाता है, जो सर्दियों को अलविदा कहने की परंपरा का हिस्सा है।
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पैनकेक क्यों हैं इस त्योहार की पहचान?
दरअसल, मस्लेनित्सा में पैनकेक यानी रूसी भाषा में 'ब्लिनी' सिर्फ एक पकवान नहीं, बल्कि इस त्योहार की पहचान हैं। मस्लेनित्सा वीक में रूसी घरों में पैनकेक बनाए जाते हैं और परिवार-दोस्त मिलकर खाते हैं। इसे सूरज की तरह गोल और सुनहरा बनाया जाता है जो वसंत के आने का प्रतीक है।
मॉस्को स्थित सांस्कृतिक केंद्र 'द नेशनल सेंटर रशिया' के मुताबिक, पैनकेक सूरज, एकता और नई शुरुआत का प्रतीक है।
रूस में इसे बनाने का तरीका भी अलग-अलग है। कहीं इसे शहद और बेरी के साथ मिलाकर बनाया जाता है तो कहीं मछली, मशरूम या दूसरी चीजों की फिलिंग भरकर तैयार किया जाता है।

7 दिन, 7 रंग: हर दिन की अपनी परंपरा
मस्लेनित्सा का हर दिन एक खास नाम और रीति-रिवाज से जुड़ा है। पुराने समय में यह सप्ताह सिर्फ मौज-मस्ती तक सीमित नहीं था। रिश्तेदारों से मिलना, शादी के लिए रिश्ते तलाशना और परिवार के साथ वक्त बिताना भी इसकी परंपराओं का हिस्सा था।
रूस के दक्षिण यूराल स्टेट यूनिवर्सिटी और ITMO यूनिवर्सिटी के लेखों में इन परंपराओं का जिक्र मिलता है।

सोमवार: त्योहार की शुरुआत
इस दिन मस्लेनित्सा के स्वागत की परंपरा है। कई जगह पुआल से बना पुतला तैयार किया जाता है और लोग त्योहार की तैयारियों में जुट जाते हैं। घरों में पैनकेक बनने भी शुरू हो जाते हैं।
मंगलवार: खेल और मेल-मिलाप
पुराने समय में युवक-युवतियां बर्फीली पहाड़ियों पर स्लेजिंग करते थे। शादी के लिए रिश्ते तलाशने और संभावित जीवनसाथी से मिलने-जुलने की परंपराएं भी इस दिन से जुड़ी थीं।

बुधवार: सास के घर दावत
इस दिन दामाद के अपनी सास के घर जाकर पैनकेक खाने की परंपरा रही है। घरों में मेहमानों के लिए पकवान बनाए जाते थे और मिल-बैठकर जश्न मनाया जाता था।
गुरुवार: जश्न जोरदार
गुरुवार से त्योहार का बड़ा सार्वजनिक उत्सव शुरू होता था। लोग रोजमर्रा के कामों से वक्त निकालकर बाहर निकलते, खेलों में हिस्सा लेते और लोकगीतों व नृत्य का आनंद लेते थे।
शुक्रवार: दामाद के घर सास की दावत
बुधवार को दामाद सास के घर जाता था, जबकि शुक्रवार को सास के दामाद के घर आने की परंपरा थी। यह दिन रिश्तों में मेल-जोल बढ़ाने का मौका माना जाता था।
शनिवार: रिश्तेदारों के साथ समय
इस दिन पत्नी अपने पति की बहनों और दूसरे रिश्तेदारों को घर बुलाती थी। साथ खाना खाने और बातचीत करने के जरिए परिवार के रिश्तों को मजबूत करने पर जोर रहता था।
रविवार: पुतला दहन
संडे को 'फॉरगिवनेस संडे' कहा जाता है। लोग एक-दूसरे से माफी मांगते हैं। कई जगह लोक उत्सवों के बाद पुआल से बने पुतले को जलाया जाता है, जो सर्दियों को विदा करने का प्रतीक है।






