रूस पर प्रतिबंधों को लेकर ट्रंप का यू-टर्न, भारत के लिए क्या संकेत? एक्सपर्ट से समझिए
पहले रूस पर सख्ती की तैयारी, फिर डीजल डील और अब प्रतिबंधों पर रोक... ट्रंप के पल-पल बदलते फैसले कई सवाल खड़े करते हैं। आखिर इस यू-टर्न के पीछे क्या है और भारत-रूस के रिश्तों से लेकर अमेरिका से ट्रेड डील तक, इसका क्या असर हो सकता है? समझिए
रूस पर प्रतिबंधों को लेकर ट्रंप का यू-टर्न, भारत के लिए क्या संकेत? एक्सपर्ट से समझिए
रूसी राष्ट्रपति पुतिन, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

एक तरफ रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी, दूसरी तरफ उसी रूस से डीजल खरीदने का ऐलान, और फिर उन प्रतिबंधों पर रोक, जिनकी चपेट में भारत जैसे देश भी आ सकते थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया फैसलों में यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि वॉशिंगटन ने मॉस्को के खिलाफ अपने कदम पीछे क्यों खींचे, बल्कि यह भी है कि क्या अमेरिका अब अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के बीच नया संतुलन तलाश रहा है?

इस बदलाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है। रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर अतिरिक्त टैरिफ का खतरा था। अब उस खतरे को फिलहाल टाल दिया गया है। लेकिन क्या यह केवल अमेरिका की ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा फैसला है या भारत-अमेरिका रिश्तों में भी नरमी की गुंजाइश बन रही है?

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और रूस की सदर्न फेडरल यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. संदीप त्रिपाठी के मुताबिक, ट्रंप के इस यू-टर्न को केवल रूस के साथ रिश्तों के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह अमेरिका की व्यापक वैश्विक रणनीति में व्यावहारिक बदलाव का संकेत भी हो सकता है। हालांकि, इसे स्थायी नीतिगत परिवर्तन मानना अभी जल्दबाजी होगी।

रूस पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है। (फाइल फोटो)AP

पहले डीजल डील, फिर प्रतिबंधों पर रोक

आगे बढ़ने से पहले अमेरिका और रूस के बीच हालिया घटनाक्रम पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ दिलचस्प नजर आती है।

9 अक्टूबर को ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के तुरंत बाद रूस से डीजल की आपूर्ति का  ऐलान किया। ट्रंप के मुताबिक, रूस अमेरिका और वैश्विक बाजारों के लिए तुरंत 3 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा डीजल उपलब्ध कराएगा। इसके बाद भी अतिरिक्त आपूर्ति की योजना बताई गई। यह कदम ऐसे समय आया, जब अमेरिका में ईंधन की कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं।

इसके कुछ ही दिनों बाद ट्रंप ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े कानून के कई प्रावधानों पर रोक लगा दी। 18 सितंबर को उन्होंने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के आर्थिक और वित्तीय संसाधनों पर दबाव बढ़ाना था।

कानून में रूस के अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा कारोबार से जुड़े लोगों पर प्रतिबंध लगाने के साथ रूसी तेल-गैस खरीदने वाले कुछ देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान भी था। भारत जैसे बड़े रूसी ऊर्जा आयातकों के लिए यह गंभीर चिंता का विषय था। हालांकि भारत ने साफ कर दिया कि वह अपने नागरिकों के हितों को देखकर फैसले लेता है। 

लेकिन 16 अक्टूबर के कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने रशियन सैंक्शन एक्ट के कई प्रतिबंधों और टैरिफ प्रावधानों पर छूट दे दी। उन्होंने इसे अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया। इसका मतलब यह नहीं कि रूस पर पहले से लागू सभी प्रतिबंध खत्म हो गए हैं या नए उपायों का खतरा हमेशा के लिए टल गया है। फिलहाल नए कानून के कई अहम प्रावधानों को लागू करने पर रोक है और भविष्य में कार्रवाई की गुंजाइश बनी हुई है। 

यानी एक तरफ रूस पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था तैयार हुई, दूसरी तरफ ऊर्जा जरूरतों और व्यापक आर्थिक हितों के बीच समझौते का रास्ता भी खुला। यही विरोधाभास ट्रंप की रूस नीति को समझने की कुंजी हो सकता है।

अमेरिका-रूस के बदलते संबंधों के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर भी नजर है।AP

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का कितना महत्व?

फोरम फॉर ग्लोबल स्टडीज के संस्थापक निदेशक डॉ. संदीप त्रिपाठी के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम का पहला महत्वपूर्ण पहलू भारत की रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत रूस से तेल खरीदने का फैसला अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करता है, इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि बाहरी दबाव पड़ने पर भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से आसानी से समझौता कर लेगा। ट्रंप भी इस वास्तविकता को समझते हैं कि भारत अपने रणनीतिक फैसले खुद लेना चाहता है। 

भारत के लिए भी चुनौती दोहरे हितों में संतुलन बनाने की है। एक ओर रूस से ऊर्जा आपूर्ति उसके आर्थिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है, दूसरी ओर अमेरिका भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी टैरिफ का खतरा दोनों मोर्चों पर दबाव बढ़ा सकता था। नए प्रतिबंधों पर रोक से भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन के पास आगे कार्रवाई करने का विकल्प मौजूद है। 

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क्या वाकई बदल रही ट्रंप की रणनीति?

सामरिक मामलों के विश्लेषक डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, दूसरा पहलू रूस-यूक्रेन युद्ध और सैन्य शक्ति की सीमाओं से जुड़ा है। रूस को सैन्य रूप से पराजित मानकर रणनीति बनाना उचित नहीं होगा। किसी टिकाऊ समाधान के लिए कूटनीति जरूरी है।

इस नजरिए से रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और मॉस्को के साथ बातचीत की गुंजाइश बनाए रखना दो अलग-अलग विकल्प नहीं, बल्कि एक साथ चलने वाली रणनीतियां हो सकती हैं। अमेरिका रूस पर दबाव बनाए रखते हुए भी उन क्षेत्रों में समझौता कर सकता है, जहां उसे अपने हित पूरे होते दिखाई दें।

तेल-गैस की राजनीति ने कैसे बदला समीकरण?

ट्रंप के इस कदम का तीसरा पहलू ऊर्जा बाजार से जुड़ा है। डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, तेल और गैस केवल खरीद-बिक्री की वस्तुएं नहीं हैं। ये देशों के आर्थिक हितों और भू-राजनीतिक प्रभाव का भी हिस्सा हैं।

रूस की ऊर्जा आपूर्ति को सीमित करने से मॉस्को की कमाई पर असर पड़ सकता है, लेकिन इसका प्रभाव वैश्विक बाजार और आयातक देशों पर भी पड़ सकता है। अमेरिका को यूक्रेन के समर्थन और रूस पर दबाव की नीति के साथ अपनी ऊर्जा जरूरतों और घरेलू कीमतों का भी ध्यान रखना पड़ता है।

यही वजह है कि रूसी डीजल की खरीद और प्रतिबंधों पर रोक के फैसले को केवल राजनीतिक रुख में बदलाव कहकर नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे आर्थिक हितों की भूमिका भी हो सकती है।

ट्रंप की विदेश नीति का एक अहम पहलू यही है कि वह कई मामलों में व्यावहारिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं। डॉ. त्रिपाठी इसे पारंपरिक गुट आधारित राजनीति के बजाय लेन-देन और रणनीतिक लचीलेपन पर जोर देने वाले दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं।

लेकिन इस तरह के फैसलों से अनिश्चितता भी बढ़ सकती है। आज जिस देश पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी हो, उसके साथ कल किसी खास आर्थिक जरूरत के कारण समझौता किया जा सकता है। दूसरे देशों के लिए चुनौती यह समझना है कि यह बदलाव अस्थायी है या लंबे समय तक अमेरिकी नीति का हिस्सा बनने वाला है।

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अब भारत-अमेरिका रिश्तों और ट्रेड डील का क्या होगा?

यहीं से इस घटनाक्रम का भारत से जुड़ा सबसे अहम सवाल सामने आता है। अगर अमेरिका रूस से ऊर्जा खरीदने के मुद्दे पर कुछ लचीलापन दिखाता है, तो क्या भारत के साथ व्यापार वार्ता में भी ऐसा हो सकता है?

डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, ट्रंप के इस फैसले से भारत को द्विपक्षीय संबंध सुधारने और ट्रेड डील को आगे बढ़ाने के लिए कूटनीतिक गुंजाइश मिल सकती है। रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर तत्काल टैरिफ का खतरा कम होने से दोनों देशों के लिए बातचीत का माहौल बेहतर हो सकता है।

हालांकि, व्यापार समझौते का भविष्य सिर्फ रूस से तेल खरीदने के विवाद पर निर्भर नहीं करेगा। दोनों देशों के बीच टैरिफ, बाजार तक पहुंच और व्यापारिक शर्तों जैसे मुद्दे भी अहम रहेंगे। प्रतिबंधों पर रोक से इन सभी मतभेदों का समाधान अपने आप नहीं हो जाता।

गौर करने वाली बात ये भी है कि अमेरिकी आदेश में रूसी प्रतिबंधों में छूट को स्थायी नहीं बनाया गया है। भविष्य में हालात के मुताबिक प्रतिबंधों और टैरिफ से जुड़े कदम फिर उठाए जा सकते हैं। इसलिए भारत को इस राहत के साथ संभावित अनिश्चितता को भी ध्यान में रखना होगा।

डॉ. त्रिपाठी का आकलन है कि फिलहाल इस घटनाक्रम पर नजर रखने की जरूरत है। असली परीक्षा यह होगी कि ट्रंप का यह यू-टर्न आगे चलकर अमेरिकी नीति में स्थायी बदलाव लाता है या नहीं, और क्या इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में ठोस प्रगति के रूप में दिखाई देता है।

फिलहाल तस्वीर इतनी जरूर बदली है कि रूस पर दबाव बढ़ाने की तैयारी के बीच अमेरिका ने अपने आर्थिक हितों के लिए एक अलग रास्ता चुना है। लेकिन क्या यही व्यावहारिकता भारत के साथ व्यापारिक मतभेद सुलझाने में भी दिखाई देगी? इसका जवाब आने वाले दिनों में अमेरिकी फैसलों और दोनों देशों की बातचीत से ही मिलेगा।

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