
रूस और उससे तेल-गैस खरीदने वालों पर नए प्रतिबंधों की पूरी तैयारी थी। तारीख तय थी। भारत समेत कई देशों पर 100% तक टैरिफ का खतरा मंडरा रहा था। लेकिन ऐन वक्त पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यू-टर्न लिया। उन्होंने ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।
लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 को अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त और प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को मंजूरी दी थी। ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर दस्तखत करके इसे कानून बना दिया। इसके तहत नए प्रतिबंध 18 अक्टूबर से लागू होने थे, लेकिन 16 अक्टूबर को ही ट्रंप ने इसके कई प्रावधानों पर रोक लगा दी।
आखिर रूस पर सख्ती की तैयारी के बीच ट्रंप ने आखिरी वक्त पर कदम क्यों खींचे? क्या मॉस्को और वॉशिंगटन के बीच सचमुच बर्फ पिघलने लगी है? रूसी डीजल की डील से लेकर परमाणु ऊर्जा और डेटा सेंटरों में संभावित साझेदारी तक, हाल के दिनों में कई नए संकेत मिले हैं। इन बदलते समीकरणों का भारत पर क्या असर होगा? आइए समझते हैं।

डीजल से डेटा सेंटर तक, रूस-US के बीच क्या बदल रहा है?
रूस पर प्रतिबंधों में नरमी से पहले, ट्रंप के सबसे सकारात्मक संकेतों में डीजल आपूर्ति समझौता सबसे अहम है। ट्रंप ने पिछले हफ्ते रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के बाद इस समझौते का जिक्र करते हुए कहा था कि रूस अमेरिका और वैश्विक बाजारों के लिए डीजल की आपूर्ति करेगा। उनके मुताबिक, रूस शुरुआत में 3 लाख टन से अधिक डीजल देगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर अतिरिक्त खेप भेजने की योजना है।
इस पहल का घोषित मकसद वैश्विक ऊर्जा कीमतों को कम करना बताया गया। हालांकि, कुछ तबकों में इसकी आलोचना भी हुई। यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने भी इस समझौते पर आपत्ति जताई। इस आपत्ति पर ट्रंप ने खुद जेलेंस्की को फटकार लगाई। यहां तक कह दिया कि अब यूक्रेन में नए राष्ट्रपति का वक्त आ गया है।
❗️ ‘The Ice Has Broken’: Putin Aide Hails ‘Very Large Synergy’ Between Russia-US Kirill Dmitriev believes there could be some more announcements soon on other joint initiatives following the diesel deal. https://t.co/USLin7xf9x
— RT_India (@RT_India_news) October 16, 2026
'बर्फ पिघलने लगी है...'
इस बीच रूसी राष्ट्रपति के निवेश मामलों के विशेष दूत किरिल दिमित्रिएव ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका और रूस के बीच सहयोग की संभावनाएं बढ़ रही हैं। उन्होंने संकेत दिए कि डीजल समझौते के बाद अब कुछ और महत्वपूर्ण संयुक्त पहलों की घोषणा जल्द हो सकती है।
दिमित्रिएव के मुताबिक, रूस और अमेरिका परमाणु ऊर्जा से चलने वाले डेटा सेंटर बनाने जैसी परियोजनाओं पर भी चर्चा कर रहे हैं। इनमें छोटे मॉड्यूलर परमाणु ऊर्जा प्लांटों के इस्तेमाल की संभावना शामिल है। उन्होंने खनिज और ऊर्जा क्षेत्र में संभावित समझौतों की दिशा में भी सहयोग का संकेत दिया।
दिमित्रिएव ने रूस-अमेरिका संबंधों में आ रहे बदलाव को इन शब्दों में व्यक्त किया, “बर्फ पिघलने लगी है।” हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की राह में अमेरिकी प्रतिबंध बड़ी बाधा हैं।
कौन-से नए प्रतिबंध लगने वाले थे?
ट्रंप के नए कदम के केंद्र में लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 है। दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर पारित इस कानून को कांग्रेस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सांसदों का व्यापक समर्थन मिला था। ट्रंप ने 18 सितंबर को इस कानून पर हस्ताक्षर किए थे।
इस कानून का उद्देश्य रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसके वित्तीय संसाधनों को सीमित करना था। इसकी वजह से भारत और चीन जैसे कई देशों पर सीधा प्रभाव पड़ना था। इसमें रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और सरकारी नियंत्रण वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ रूस के ऊर्जा कारोबार को सीमित करने के प्रावधान शामिल थे।
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इस कानून का एक अहम हिस्सा रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दूसरे देशों को निशाना बनाने की अनुमति देता था। इसके तहत रूस से निकलने वाले कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस की खरीद जारी रखने वाले टॉप पांच आयातक देशों (जिसमें भारत भी शामिल है) से अमेरिका आने वाले सामान पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। रूस से जुड़े प्रतिबंधों को दरकिनार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले देशों पर भी ऐसे टैरिफ लगाने का प्रावधान था।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि कानून में टैरिफ की अधिकतम दर 100% तक रखने का प्रावधान था। इसका मतलब यह नहीं था कि सभी संबंधित देशों पर अपने आप 100% टैरिफ लग जाता। इसके लिए संबंधित शर्तों और अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई की भूमिका अहम थी।
ट्रंप के फैसले से क्या बदलेगा?
16 अक्टूबर की डेट वाले कार्यकारी आदेश में राष्ट्रपति ट्रंप ने लिंडसे ग्राहम एक्ट के कई प्रतिबंधों, पाबंदियों और टैरिफ प्रावधानों पर छूट दी है। उन्होंने बताया कि इसकी जानकारी अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस को देते हुए कहा गया कि यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।
आदेश में स्पष्ट किया गया कि यह छूट तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या संबंधित अमेरिकी अधिकारी आगे कार्रवाई का फैसला नहीं करते। साथ ही, रूस से जुड़ी पहले की अमेरिकी प्रतिबंध वाली व्यवस्था को इस आदेश से पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है। यानी यह रूस के खिलाफ सभी प्रतिबंधों को हटाने का फैसला नहीं, बल्कि नए कानून के तहत प्रस्तावित उपायों पर फिलहाल रोक है।
ट्रंप के इस फैसले से फिलहाल रूस पर नए कानून के तहत दबाव बढ़ाने की योजना टल गई है। साथ ही, अमेरिका और रूस के बीच ऊर्जा कारोबार तथा संभावित तकनीकी परियोजनाओं पर बातचीत के लिए कुछ अतिरिक्त गुंजाइश बनी है। लेकिन ये खतरा कायम है कि भविष्य में प्रतिबंध दोबारा लागू किए जा सकते हैं।

भारत को इससे क्या राहत मिलेगी?
इस फैसले का असर भारत के लिए भी अहम है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में रूस के ऊर्जा कारोबार से जुड़े देशों पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ लगाने का प्रावधान नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय बन सकता था।
ग्राहम कानून के तहत, यदि भारत निर्धारित शर्तों के अनुसार रूसी कच्चे तेल के शीर्ष पांच आयातक देशों में शामिल रहता और 18 अक्टूबर या उसके बाद रूसी मूल के तेल या गैस की नई खरीद करता, तो भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामान पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान लागू हो सकता था। इसके अलावा, रूस के तेल प्रतिबंधों को दरकिनार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले देशों पर भी कार्रवाई की गुंजाइश थी।
ट्रंप के नए आदेश से इन प्रावधानों पर फिलहाल छूट मिलने के कारण भारत पर इस कानून के तहत तत्काल अतिरिक्त टैरिफ लगने का खतरा टल गया है। इससे भारतीय निर्यातकों को संभावित दबाव से राहत मिल सकती है।
भारत के लिए एक और पहलू ऊर्जा बाजार का है। रूस से डीजल की अतिरिक्त आपूर्ति वैश्विक बाजार में ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने में मदद कर सकती है, लेकिन इससे कीमतें कितनी घटेंगी, यह मांग, आपूर्ति और परिवहन की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
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क्या रूस-अमेरिका संबंधों में स्थायी सुधार होगा?
ट्रंप का फैसला रूस के साथ आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को खुला रखने का संकेत देता है। डीजल आपूर्ति और परमाणु ऊर्जा से चलने वाले डेटा सेंटरों पर चर्चा बताती है कि दोनों देश यूक्रेन संघर्ष से जुड़े मतभेदों के बावजूद कुछ क्षेत्रों में साझा हित तलाश रहे हैं।
फिर भी, इसे रिश्तों में स्थायी सुधार मानना जल्दबाजी होगी। यूक्रेन संघर्ष जारी है, अमेरिकी प्रतिबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं और नई परियोजनाओं पर बातचीत अभी समझौतों में बदलनी बाकी है।
फिलहाल इतना जरूर है कि 18 अक्टूबर से लागू होने वाले नए प्रतिबंधों पर ठीक पहले लगाई गई रोक ने कुछ राहत दी है और भारत जैसे देशों के लिए संभावित आर्थिक जोखिम को भी टाला है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या डीजल समझौते के बाद रूस और अमेरिका के बीच दूसरे बड़े कारोबारी समझौते सामने आते हैं या प्रतिबंधों का दबाव फिर बढ़ता है।







