
मनीष वैद्य
ग्लोबल साउथ के लिए, एनर्जी सिक्योरिटी अब सिर्फ पॉलिसी पर चर्चा का विषय नहीं रह गई है। यह अस्तित्व का सवाल बन गई है। मिडिल ईस्ट में चल रहे टकराव की वजह से शिपिंग के पारंपरिक रास्ते प्रभावित हुए हैं। इससे विकासशील देशों को बढ़ती लागत, टूटी हुई सप्लाई चेन और ऐसी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिसे उन्होंने खुद पैदा नहीं किया है।
सितंबर 2026 में UN की 81वीं जनरल असेंबली में, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ग्लोबल साउथ के दूसरे नेताओं ने अपनी निराशा साफ तौर पर जाहिर की: गरीब देश एनर्जी, भोजन, फ्यूल, फर्टिलाइजर, फाइनेंस और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में गहरे होते संकट से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने इसे साफ तौर पर कहा: 'हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां युद्ध के लिए तो लॉजिस्टिक्स बेहतरीन हैं, लेकिन खाने-पीने की चीजों के लिए लॉजिस्टिक्स जर्जर हैं। यह सिर्फ नेपाल की ही बदकिस्मती नहीं है। बांग्लादेश से पूछिए। भूटान से पूछिए। भारत से पूछिए। मालदीव से पूछिए। पाकिस्तान से पूछिए। श्रीलंका से पूछिए।
हमारे इलाके के किसी भी दूसरे देश से पूछिए, आपको यही कहानी सुनने को मिलेगी। हम उस मौसम की मार झेल रहे हैं जिसे हमने गर्म नहीं किया, और उन युद्धों की मार भी झेल रहे हैं जिन्हें हमने शुरू नहीं किया।

BRICS में एनर्जी सप्लाई की सुरक्षा
पिछले महीने भारत में पहुंचे ब्रिक्स नेताओं ने इसी समस्या को रणनीतिक नजरिए से देखा था। उनके शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में स्थिर एनर्जी मार्केट, 'अलग-अलग सोर्स से एनर्जी की बिना रुकावट सप्लाई' और अहम बुनियादी ढांचे की बेहतर सुरक्षा की मांग की गई थी। जल्द ही कुछ घटनाओं ने इस लक्ष्य पर दबाव डाल दिया। ड्रोन हमलों ने सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को बाधित कर दिया।
यह पाइपलाइन स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरे बिना लाल सागर तक कच्चा तेल पहुंचाने का एक अहम रास्ता है। यानबू (Yanbu) में लोडिंग पर असर पड़ने के कारण, सऊदी अरब ने ओमान के पास 'शिप-टू-शिप ट्रांसफर' के जरिए एशियाई खरीदारों को अधिक कच्चा तेल देना शुरू कर दिया। इस घटना ने दिखाया कि कैसे कोई वैकल्पिक रास्ता भी कितनी तेजी से असुरक्षित हो सकता है।
ब्रिक्स में अब दुनिया के कुछ सबसे बड़े तेल उत्पादक और बड़े आयातक देश शामिल हैं। फिर भी, सिर्फ सदस्य होने से ही इस बात की गारंटी नहीं मिलती कि सप्लाई कम होने पर किसी दूसरे सदस्य देश का तेल मिल ही जाएगा।
उत्पादक देशों के पास दूसरे खरीदार भी हो सकते हैं। कीमतें और ट्रांसपोर्ट की स्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। इस समूह के पास तेल के बड़े भंडार हैं। मुश्किल काम यह है कि जब सप्लाई का दबाव बढ़े, तो उन स्टोरेज में से कुछ तेल सदस्यों को भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध कराया जाए।
रूस के साथ ट्रेड का असर
रूस इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे ये एनर्जी संबंध सप्लाई की गारंटी दिए बिना भी कमी के समय मदद कर सकते हैं। जब मिडिल ईस्ट से सप्लाई कम भरोसेमंद हो गई, तो रूस के कच्चे तेल ने भारत को कुछ हद तक कमी पूरी करने में मदद की। जुलाई में, भारत के कच्चे तेल के इम्पोर्ट में रूस की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 50.83% रही।
इससे पता चलता है कि सप्लाई में रुकावट आने पर खरीद के तरीके कितनी तेजी से बदल सकते हैं। हालांकि, रूस से सप्लाई बढ़ने का मतलब यह नहीं था कि तेल मिलना पक्का हो गया। जैसे ही चीन की रिफाइनरियों ने खरीद बढ़ाई, रूसी तेल के लिए कॉम्पिटिशन और बढ़ गया।
एक अलग एनालिसिस के अनुसार, अगस्त में भारत का रूस से कच्चा तेल इम्पोर्ट जुलाई के 2.79 मिलियन बैरल से घटकर 1.87 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया। भले ही ब्रिक्स सप्लाई का कोई और जरिया खोल दे, फिर भी इसके सदस्य उन्हीं बैरल के लिए एक-दूसरे से बोली लगा सकते हैं।
हालांकि, रूसी तेल के सामने अब एक और मुश्किल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में एक कानून पर साइन किए। इसके तहत रूसी एनर्जी के बड़े खरीदारों (जिनमें भारत और चीन भी शामिल हो सकते हैं) के सामान पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों के लिए, प्रतिबंधों की वजह से रूसी तेल हासिल करने को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।

अब ट्रेड की दिशा उल्टी हो गई है। रूसी रिफाइनरियों पर यूक्रेन के लगातार हमलों की वजह से देश में फ्यूल की कमी हो गई। इसके बाद रूस ने भारत से पेट्रोल मंगाना शुरू कर दिया। Kpler के डेटा के मुताबिक, रूस के मुरमान्स्क पोर्ट पर नायरा एनर्जी से 40,000 टन पेट्रोल पहुंचा।
नायरा एनर्जी में 49% हिस्सेदारी रोसनेफ्ट की है। अगस्त के आखिर तक, रूस में पेट्रोल का प्रोडक्शन घरेलू खपत के मुकाबले लगभग 70% तक गिर गया था। इसकी वजह थी कि कई रिफाइनरियों को या तो कुछ समय के लिए कामकाज रोकना पड़ा या प्रोडक्शन कम करना पड़ा।
भारत का ज्यादा रूसी कच्चा तेल खरीदने की ओर बढ़ना और बाद में मॉस्को का भारतीय पेट्रोल खरीदना, दोनों ही सप्लाई में आई रुकावटों के जवाब में उठाए गए कदम थे। इनसे पता चलता है कि हालात बदलने पर एनर्जी सप्लाई कितनी तेजी से बदल सकती है। BRICS इस लचीलेपन को पहले से ही व्यवस्थित करने की कोशिश कर सकता है, बजाय इसके कि सदस्य देशों को सप्लाई में रुकावट आने के बाद विकल्पों के लिए भाग-दौड़ करनी पड़े। इससे ग्रुप का एनर्जी सहयोग अचानक किए जाने वाले बदलावों पर कम निर्भर रहेगा।
क्राइसिस के समय रिजर्व तेल का यूज
ऐसी आनन-फानन में की जाने वाली व्यवस्थाओं को कम करने का एक तरीका यह है कि तेल की जरूरत पड़ने से पहले ही उसे खरीदार के नजदीक पहुंचा दिया जाए। भारत के पास पहले से ही ऐसा एक द्विपक्षीय उदाहरण मौजूद है। अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) और इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड के बीच मैंगलोर में तेल जमा करने को लेकर पहले से ही एक समझौता है।
मई 2026 के एक समझौते में भारत में जमा ADNOC के कच्चे तेल की मात्रा को 30 मिलियन बैरल तक बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। इसमें विशाखापत्तनम और चंडीखोल में नए स्टोरेज की संभावना भी शामिल है। इसमें फुजैराह(UAE) में भारत के स्ट्रैटेजिक कच्चे तेल के स्टोरेज पर भी विचार किया जा रहा है।
यह व्यवस्था दोनों देशों के बीच है और इससे भारत को संकट के समय स्टोर किए गए सभी कच्चे तेल पर अधिकार की गारंटी नहीं मिलती। फिर भी, इससे यह पता चलता है कि तेल का प्रोडक्शन करने वाला देश, कमी होने से पहले ही तेल को इम्पोर्ट करने वाले देश में रख सकता है। मुश्किल काम यह तय करना है कि खरीदार उस तेल में से कितना तेल इस्तेमाल कर सकता है।

एक विकल्प यह है कि पूरे ग्रुप के लिए एक कॉमन रिजर्व बनाने के बजाय, इच्छुक ब्रिक्स (BRICS) सदस्य आपस में इमरजेंसी के समय तेल की सप्लाई के लिए कोई स्वैच्छिक व्यवस्था करें। साफ तौर पर मालिकाना हक होना इसका सिर्फ एक हिस्सा है। इमरजेंसी की स्थिति में तय मात्रा में तेल लेने का स्पष्ट अधिकार भी इंपोर्ट करने वाले देश के पास होना चाहिए। इन शर्तों में यह तय किया जा सकता है कि कितना तेल शामिल होगा, उसे कहां स्टोर किया जाएगा और उसकी कीमत क्या होगी।
साथ ही, यह भी साफ किया जाएगा कि इसे कौन जारी कर सकता है और स्टॉक को दोबारा कैसे भरा जाएगा। रिफाइनरी की कम्पैटिबिलिटी और ट्रांसपोर्टेशन पर भी काम करना होगा। इससे बाजार के और ज्यादा मुश्किल होने से पहले कुछ अनिश्चितता कम हो जाएगी। भारत या किसी भी दूसरे खरीदार को तब तेल लेने के लिए बातचीत नहीं करनी चाहिए जब जहाजों का रास्ता बदल दिया गया हो और कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हों।
एनर्जी सिक्योरिटी पर क्या कर रहा भारत
भारत पहले से ही ब्रिक्स (BRICS) के बाहर इनमें से कुछ व्यावहारिक सवालों पर काम कर रहा है। जुलाई में एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर भारत और जापान के बीच हुए समझौते में स्टॉक जमा करने, इमरजेंसी स्थिति में कार्रवाई, तीसरे देशों से सप्लाई और समुद्री ट्रांसपोर्टेशन जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है।
भारत-जापान का ढांचा अलग है, लेकिन इससे पता चलता है कि इनमें से कई व्यावहारिक सवालों पर पहले से ही काम किया जा सकता है। इसलिए, नई दिल्ली को सब कुछ शुरू से शुरू करने की जरूरत नहीं है। अब उन कुछ विचारों को ब्रिक्स के प्रोड्यूसर और इम्पोर्टर देशों के बीच अपनी मन से सहयोग के लिए अपनाया जा सकता है।

अगले शिखर सम्मेलन से पहले की चुनौती
सिर्फ तेल हासिल करना ही समस्या का एक हिस्सा है। पेमेंट का पूरा होना भी जरूरी है। ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों ने पहले ही बेहतर क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम की मांग की है। अगर जरूरत पड़ने पर पेमेंट क्लियर न हो सके, तो तेल के वादे का कोई खास फायदा नहीं है। कंपनियों और बैंकों को तय रास्ते से पहले ही पेमेंट की प्रक्रिया आजमा लेनी चाहिए और एक बैकअप भी तैयार रखना चाहिए।
इसके बाद इस व्यवस्था को असल में आजमाकर देखा जाना चाहिए। नई दिल्ली घोषणापत्र में खास तौर पर ब्रिक्स एनर्जी रिसर्च कोऑपरेशन प्लेटफॉर्म के काम का स्वागत किया गया है। कोई और संस्था बनाने की जरूरत नहीं है। यह प्लेटफॉर्म शामिल तेल मंत्रालयों, राष्ट्रीय तेल कंपनियों और स्टोरेज ऑपरेटरों के साथ मिलकर एक या दो पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर सकता है।
मान लीजिए कि होर्मुज़ से होने वाला ट्रैफिक और कम हो जाता है, ठीक उसी समय जब एक बाईपास पाइपलाइन खराब हो जाती है और वॉर-रिस्क इंश्योरेंस मिलना बंद हो जाता है। अगर कोई इम्पोर्टर तेल पर अपने तय अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो स्टोर किए गए कच्चे तेल को रिफाइनरी तक पहुंचने में कितना समय लगेगा? इसमें लगने वाला समय यह बताएगा कि क्या यह व्यवस्था असल इमरजेंसी में काम की है या नहीं।
नई दिल्ली में किया गया वादा तब अधिक मायने रखेगा जब सप्लाई कम होने पर भी यह काम करे। जिस सदस्य देश में कमी हो, वह बिना दोबारा शर्तें तय किए तय मात्रा में तेल ले सके। यहीं से ब्रिक्स एनर्जी सप्लाई को मजबूत बनाए रखने के अपने वादे को ऐसी चीज में बदलना शुरू कर सकता है जिसका सदस्य देश इस्तेमाल कर सकें।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में जूनियर रिसर्च फेलो हैं। इनकी रिसर्च में रणनीतिक ऊर्जा संबंधी जानकारी और ग्रीन ट्रांजिशन जैसे विषय शामिल हैं।)
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