सऊदी पर हूती हमले, पाकिस्तान-तुर्किये खामोश! ‘इस्लामिक NATO’ की क्या है मजबूरियां?
यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा संकट में है। पाकिस्तान-तुर्किये के साथ मक्का पैक्ट करने वाला सऊदी अब खुद सैन्य अभियान की तैयारी कर रहा है।
सऊदी पर हूती हमले, पाकिस्तान-तुर्किये खामोश! ‘इस्लामिक NATO’ की क्या है मजबूरियां?
सऊदी पर हूतियों के हमले के बाद मक्का समझौते पर सवाल उठ रहे हैं।© SPA

ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के लिए हाल के वर्षों का सबसे बड़ा स्ट्रैटेजिक खतरा पैदा कर दिया है। शनिवार को हूतियों ने दावा किया कि उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको के एक ठिकाने पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया है। हूतियों ने इसे यमन की राजधानी सना पर सऊदी हमले का जवाब बताया। 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि सऊदी अरब अब यमन की सरकारी सेना के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहा है, जिससे संघर्ष और बढ़ने का खतरा है। सऊदी को रणनीतिक के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। इसी को देखते हुए अब सऊदी अरब इस अभियान के लिए एक लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को जुटाने पर विचार कर रहा है। 

सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों का झगड़ा वैसे तो बहुत पुराना है, लेकिन सितंबर से इसमें नई तेजी आ गई है। हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की तेल सप्लाई को निशाना बनाया। सऊदी समर्थित यमनी सेना को कई इलाकों में चुनौती दी। रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा समेत लाल सागर के अहम समुद्री चोकपॉइंट बाब-अल-मंदेब पर दबाव बढ़ा दिया।  

इस पूरे घटनाक्रम में एक सवाल अहम हो गया है-

सऊदी अरब के साथ खड़े होने का दावा करने वाले पाकिस्तान और तुर्किये कहां हैं?

7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का में एक जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट किया था। इसमें कहा गया था कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। समझौते को पश्चिमी देशों के रक्षा समूह NATO के आर्टिकल पांच जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के तौर पर देखा गया और इसे 'इस्लामिक NATO' तक कहा गया।

लेकिन अब जब हूती सऊदी अरब को निशाना बना रहे हैं और उसके समुद्री हितों के लिए खतरा बढ़ रहा है, पाकिस्तान ने अभी तक हूती हमलों की आलोचना के अलावा कुछ नहीं किया।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि ईरान ने यमन के हूतियों के साथ राजनीतिक बातचीत शुरू करने का सुझाव दिया है। मक्का रक्षा समझौते की एक समिति अगले हफ्ते रियाद में होने वाली आपात बैठक में इस प्रस्ताव पर चर्चा करेगी।

अपनी समस्याओं में घिरा है पाकिस्तान 

इसे लेकर पाकिस्तान के ही एक्सपर्ट्स का कहना है कि पाकिस्तान अपनी घरेलू परेशानियों में उलझा है।

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार शकील चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान के दो सूबे- खैबर-पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान गंभीर रूप से अस्थिर है और पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय पीसमेकर बनने का दावा कर रहा है। वह कहते हैं कि पाकिस्तान इस काबिल नहीं कि वो सऊदी-हूती समस्या का हल निकाल पाए।

मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए हूतियों या ईरान के खिलाफ सीधे उतरना आसान नहीं है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के ईरान के साथ जटिल रिश्ते हैं। उसे ये भी डर है कि मिडिल ईस्ट की जंग उसके अपने इलाके तक पहुंच सकती है। साथ ही देश में बड़ी शिया आबादी है। उनका भी ध्यान रखना है। ऊपर से TTP, बलूच विद्रोह और इमरान खान समर्थकों के विरोध जैसे घरेलू संकट पहले से पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।

तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में पाकिस्तान स्टडीज की रिसर्च एनालिस्ट ऐश्वर्या सोनावणे ने एक इंटरव्यू में कहा

Houthi
हूतियों को व्यापक तौर पर ईरान का प्रॉक्सी माना जाता है। ऐसे में पाकिस्तान के पास सऊदी-ईरान विवाद में सीधे कूदने की बहुत कम वजह है। यह घबराहट से ज्यादा रणनीतिक सावधानी का मामला है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमले की निंदा तो की, लेकिन हूतियों या ईरान का नाम नहीं लिया, जो पाकिस्तान के रुख को काफी हद तक साफ करता है।
ऐश्वर्या सोनावणे
ऐश्वर्या सोनावणे
तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में पाकिस्तान स्टडीज की रिसर्च एनालिस्ट

तुर्किए ने भी हूती हमलों की 'कड़ी निंदा' के अलावा कुछ नहीं किया। तुर्किए के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ऐसे हमले बंद होने चाहिए, क्योंकि इनसे क्षेत्र की स्थिरता को खतरा पैदा हो रहा है।

मंत्रालय के मुताबिक, लाल सागर और बाब अल-मंदेब में हूतियों का लगातार बना हुआ खतरा सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ही चिंता की बात नहीं है, बल्कि इससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक स्थिरता पर भी असर पड़ रहा है।

मक्का पैक्ट क्या सिर्फ कागजों पर? 

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मक्का पैक्ट भी इस्लामिक देशों के उन पुराने रक्षा समझौतों की तरह सिर्फ कागज पर रह जाएगा, जो संकट की घड़ी में एक-दूसरे की मदद नहीं कर पाए?

शकील चौधरी ने आरजू काजमी को दिए एक इंटरव्यू में कहा

Shakeel
सऊदी अरब के लिए बहुत खतरनाक स्थिति पैदा हो गई है। मेरा मानना है कि सऊदी अपने रक्षा सहयोगियों ने नाराज है। मक्का समझौता सऊदी की उम्मीदों पर पूरा नहीं उतरा है।
शकील चौधरी
शकील चौधरी
पाकिस्तानी पत्रकार

नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज की प्रोफेसर डॉ. सुजाता एश्वर्या कहती हैं कि यह समझौता 'अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर उठे शक का महज एक रिएक्शन' था। वह कहती हैं कि सऊदी अरब को आज अपने रक्षा सहयोगियों की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन कोई भी आगे नहीं आ रहा है।

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार यासिर अली मिर्जा भी कहते हैं कि यह समझौता बस कागज पर ही मजबूत दिखा था।

yasir
यह समझौता, एक पर हमला सब पर हमला, जैसी भाषा का इस्तेमाल करता है लेकिन यह एक राजनीतिक बयान से ज्यादा कुछ नहीं है और अब यह बात साबित होती दिख रही है।
यासिर अली मिर्जा
यासिर अली मिर्जा
जामिया मिलिया इस्लामिया में रिसर्च एसोसिएट

यह पहली बार नहीं है जब इस्लामिक देशों ने पश्चिमी देशों के रक्षा समूह NATO की तरह डिफेंस पैक्ट बनाया हो। पहले भी कई प्रयोग हुए हैं, हालांकि, कोई भी गठबंधन कोई ठोस काम नहीं कर पाया।

इस्लामिक देशों का नाटो स्टाइल पहला प्रयोग बुरी तरह हुआ था फेल

1948 की अरब-इजरायल जंग में शर्मनाक हार के बाद अरब देशों ने मिलकर पहला नाटो स्टाइल इस्लामिक गठबंधन बनाया था जिसे ‘ज्वॉइंट डिफेंस एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन ट्रीटी' नाम दिया गया। 17 जून 1950 को काहिरा में अरब लीग के सात संस्थापक सदस्यों- जॉर्डन, सीरिया, इराक, सऊदी अरब, लेबनान, मिस्र और यमन ने 'ज्वॉइंट डिफेंस एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन ट्रीटी' पर हस्ताक्षर किए।

इसमें जॉइंट डिफेंस काउंसिल और परमानेंट मिलिट्री कमीशन की स्थापना का प्रावधान था। अरब देशों की यह संधि नाटो जितनी ही मजबूत भाषा में लिखी गई थी कि किसी भी एक देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा और सभी देश मिलकर उसका जवाब देंगे।

इसके बाद जनवरी 1964 में काहिरा में हुए पहले अरब लीग शिखर सम्मेलन में 'यूनाइटेड अरब कमांड' (UAC) की औपचारिक स्थापना हुई। तब तक इसमें पांच और सदस्य जुड़ चुके थे।

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लेकिन 1967 में इजरायल के साथ छह-दिवसीय युद्ध में अरब देशों का यह ढांचा भरभरा कर गिर गया। जॉर्डन और मिस्र ने पारस्परिक रक्षा समझौते के तहत मई 1967 में जॉइंट अरब कमांड को मिस्री सेना के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल अब्दुल मुनीम रियाद के हवाले कर दिया।

लेकिन मिस्र के जनरल के नेतृत्व में अरब सेना इजरायल के हाथों बुरी तरह हार गई। पूर्वी येरुशलम और वेस्ट बैंक सिर्फ 72 घंटों में इजरायल के कब्जे में चले गए और इसी के साथ ही गठबंधन का अस्तित्व भी खत्म हो गया।

1955 का बगदाद पैक्ट: पश्चिम समर्थित गठबंधन भी नहीं टिक पाया

शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन के समर्थन से एक और सैन्य गठबंधन बनाया गया था- बगदाद पैक्ट। इसे 'मिडिल ईस्ट ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन' (METO) भी कहा जाता था।

24 फरवरी 1955 को इराक और तुर्किये ने बगदाद में इस संधि पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद ब्रिटेन, पाकिस्तान और ईरान भी इसमें शामिल हो गए। अमेरिका इसका सदस्य नहीं था, लेकिन उसने गठबंधन को सैन्य और आर्थिक समर्थन दिया और इसकी मिलिट्री कमेटी में भी हिस्सा लिया।

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बगदाद पैक्ट का मकसद सोवियत प्रभाव को मध्य-पूर्व तक फैलने से रोकना और सदस्य देशों के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाना था। लेकिन यह गठबंधन शुरू से ही अरब देशों के बीच विवाद का कारण बन गया। मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने इसे पश्चिमी देशों के प्रभाव को बढ़ाने वाला गठबंधन बताया और इसका विरोध किया।

नतीजा यह हुआ कि इराक पश्चिम समर्थित इस सुरक्षा व्यवस्था में शामिल हुआ, जबकि मिस्र, सीरिया और सऊदी अरब जैसे प्रमुख अरब देश इससे दूर रहे।

गठबंधन को सबसे बड़ा झटका 1958 में इराक की क्रांति से लगा। सैन्य तख्तापलट में राजा फैसल द्वितीय की हत्या कर दी गई और नई सरकार ने पश्चिमी देशों से दूरी बनानी शुरू कर दी। मार्च 1959 में इराक बगदाद पैक्ट से बाहर हो गया।

इसके बाद संगठन का मुख्यालय बगदाद से अंकारा शिफ्ट किया गया और इसका नाम बदलकर 'सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन' (CENTO) कर दिया गया। यानी जिस देश के नाम पर यह गठबंधन बना था, वही कुछ साल में इससे बाहर हो गया।

बगदाद समझौते से पाकिस्तान का मोहभंग

पाकिस्तान बगदाद पैक्ट में इसलिए शामिल हुआ था ताकि भारत के साथ अपना पावर-बैलेंस ठीक कर सके। लेकिन जब उसे भारत के खिलाफ अपने सहयोगियों की मदद की जरूरत थी, कोई नहीं आया। चाहे वो 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध हो या फिर 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम जिसमें पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया, उसके रक्षा सहयोगी चुप बैठे रहे।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के डिक्लासिफाइड दस्तावेजों के मुताबिक, 1974 में वाशिंगटन में हुई CENTO की मंत्रिस्तरीय बैठक में, पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री अजीज अहमद ने खुले तौर पर इस गठबंधन की आलोचना की थी।

अहमद ने कहा कि 'CENTO पाकिस्तान को उसके इकलौते असली खतरे, भारत से बचाने में पूरी तरह नाकाम रहा है। CENTO ने अपने 19 साल के अस्तित्व में कुछ भी हासिल नहीं किया। जब पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया, तब भी यह चुपचाप बैठा रहा।’

इसके अगले ही साल 12 मार्च 1979 में पाकिस्तान बगदाद पैक्ट से बाहर हो गया। इससे एक दिन पहले 11 मार्च को ईरान पैक्ट से बाहर हुआ था क्योंकि इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने अमेरिका से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। फिर 13 मार्च को तुर्किए भी CENTO से अलग हो गया यानी समूह के तीन देशों ने 48 घंटे के भीतर ही इसे छोड़ दिया जिसके बाद इसका नामोनिशान मिट गया।

सफारी क्लब, अमेरिकी समर्थन से बना खुफिया समूह भी हुआ फेल

सफारी क्लब 1976 में बना एक गुप्त खुफिया सहयोगी समूह था, जिसमें फ्रांस, सऊदी अरब, मिस्र, ईरान (तब शाह का शासन) और मोरक्को शामिल थे। इसे फ्रांसीसी खुफिया प्रमुख अलेक्जेंडर डी मारेंश ने आगे बढ़ाया था।

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ फ्रांसीसी खुफिया प्रमुख अलेक्जेंडर डी मारेंश© Wikimedia Commons

इसका मकसद अफ्रीका और मध्य-पूर्व में बढ़ते सोवियत प्रभाव और कम्युनिस्ट आंदोलनों को रोकना था। उस समय वाटरगेट कांड के बाद अमेरिकी कांग्रेस ने सीआईए की गुप्त गतिविधियों पर काफी नियंत्रण लगा दिया था। इसलिए अमेरिका औपचारिक सदस्य बने बिना इस नेटवर्क से सहयोग कर सकता था। काहिरा में इसका ऑपरेशनल सेंटर बनाया गया।

सफारी क्लब की सबसे बड़ी कामयाबी अफ्रीका में सोवियत समर्थित ताकतों को रोकने में रही। इसमें सऊदी अरब पैसा देता था, फ्रांस तकनीक और कम्युनिकेशन सिस्टम संभालता था, जबकि मिस्र और मोरक्को हथियार और सैनिक मुहैया कराते थे। 1977-78 के शाबा संकट में मोरक्को की सैन्य मदद को इसकी अहम सफलता माना जाता है।

लेकिन सदस्य देशों के अलग-अलग हित इसकी कमजोरी बने। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद शाह का शासन खत्म हुआ और ईरान पश्चिम-विरोधी हो गया, जिससे क्लब की मूल संरचना टूट गई। साथ ही यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं था, इसलिए इसका स्थायी संस्थागत ढांचा भी नहीं था। 1979 के बाद इसकी गतिविधियां कमजोर पड़ गईं और 1980 के दशक की शुरुआत तक यह पूरी तरह से खत्म हो गया।

मिस्र-सीरिया के साथ 6 खाड़ी देशों का गठजोड़

1990-91 का खाड़ी युद्ध (कुवैत को इराकी कब्जे से आजाद कराने के लिए हुआ युद्ध) खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के लिए एक कड़वा सबक साबित हुआ था। जीसीसी के पास अपनी 'पेनिनसुला शील्ड फोर्स' थी, लेकिन इराकी हमले के आगे यह नाकाम साबित हुई। आखिर में अमेरिकी नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय सेना ने ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्ट्रोम' चलाकर कुवैत को आजाद कराया।

© Wikimedia Commons

इसी कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए, 6 मार्च 1991 को दमिश्क में GCC के छह सदस्य देशों-बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, UAE के साथ मिस्र और सीरिया के विदेश मंत्रियों ने ‘दमिश्क घोषणा’ पर हस्ताक्षर किए, जिसे ‘6+2 फॉर्मूला’ भी कहा जाता है।

इसका मकसद खाड़ी देशों की सुरक्षा को पूरे अरब जगत के हितों से जोड़ना था। साथ ही, खाड़ी युद्ध में साथ आए इन आठ अरब देशों की एकता को स्थायी सुरक्षा व्यवस्था में बदलना था। इसके तहत मिस्र और सीरिया के सैनिकों को खाड़ी क्षेत्र में स्थायी रूप से तैनात करने की भी योजना थी।

लेकिन यह योजना जल्दी ही बिखर गई। रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) के मुताबिक, खाड़ी में मिस्री-सीरियाई सैनिकों की स्थायी तैनाती का विचार जल्द ही ठंडे बस्ते में चला गया।

इसकी वजहें कई थीं -यमन-इरिट्रिया के द्वीप विवाद और UAE-ईरान के बीच के द्वीप विवाद जैसे क्षेत्रीय मुद्दे सुलझ नहीं पा रहे थे, खाड़ी के राजतंत्र सीरिया और मिस्र जैसी बड़ी अरब सैन्य ताकतों को अपनी जमीन पर स्थायी रूप से रखने से हिचक रहे थे, और सबसे बड़ी बात, अमेरिका ने गल्फ वॉर के बाद खुद क्षेत्र में स्थायी सैन्य अड्डे बना लिए, जिससे क्षेत्रीय गठबंधन की जरूरत ही कमजोर पड़ गई।

डिफेंस पैक्ट बनाने की सऊदी क्राउन प्रिंस की कोशिश भी रही नाकाम

इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC) नाम का यह गठबंधन सऊदी अरब के वास्तविक शासक क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के दिमाग की उपज थी। 2015 में 34 मुस्लिम देशों का यह गठबंधन बनाया गया, जिसका मुख्यालय रियाद में रखा गया।

पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ को इसका पहला कमांडर बनाया गया। 2017 तक इसके सदस्य देशों की संख्या बढ़कर 41 हो गई।

IMCTC की डिफेंस काउंसिल की बैठक© Wikimedia Commons

इसका लक्ष्य आतंकवाद के खिलाफ सदस्य देशों के सैन्य सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने, ट्रेनिंग, आतंकवाद की फंडिंग रोकने और रणनीतिक संचार को मजबूत करना था। लेकिन यह नाटो जैसी साझा सैन्य ताकत या सामूहिक रक्षा व्यवस्था नहीं बन सका। इसके कमजोर पड़ने की बड़ी वजहें थीं:

  • ईरान, इराक और सीरिया जैसे अहम मुस्लिम देश बाहर रहे। इससे गठबंधन पर शुरुआत से ही सुन्नी गुट और ईरान-विरोधी मोर्चा होने का आरोप लगा।
  • इंडोनेशिया और अल्जीरिया जैसे बड़े मुस्लिम देश शामिल नहीं हुए, जिससे इसकी व्यापक प्रतिनिधित्व वाली ‘इस्लामिक’ सैन्य ताकत बनने की क्षमता सीमित रही।
  • सदस्य देशों के अपने आपसी मतभेद थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2017 का कतर संकट था, जब सऊदी अरब, UAE, बहरीन और मिस्र ने कतर से संबंध तोड़ दिए। कतर की मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास को लेकर भी सऊदी खेमे से अलग नीति थी।
  • ‘आतंकवाद’ की परिभाषा पर भी एकराय नहीं थी। सऊदी अरब मुस्लिम ब्रदरहुड और हिजबुल्लाह को आतंकवादी खतरे के तौर पर देखता था, जबकि कुछ सदस्य देशों के इन संगठनों के साथ अलग रिश्ते थे।

9 साल पहले का ‘अरब नाटो’ जो महज कागजों पर रह गया

मिडल ईस्ट स्ट्रैटेजिक अलायंस यानी MESA को 2017 में अमेरिका और उसके अरब सहयोगियों के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए प्रस्तावित किया गया था। इसे अनौपचारिक तौर पर ‘अरब NATO’ भी कहा गया।

इसमें अमेरिका के साथ सऊदी अरब, UAE, कतर, बहरीन, कुवैत, ओमान, मिस्र और जॉर्डन को जोड़ने की योजना थी। इसका मकसद ईरान के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना, आतंकवाद से निपटना, मिसाइल और समुद्री सुरक्षा मजबूत करना और साझा सैन्य अभ्यास व खुफिया सहयोग बढ़ाना था।

MESA के नेताओं के साथ राष्ट्रपति ट्रंप© Wikimedia Commons

लेकिन MESA को सबसे बड़ी चुनौती सदस्य देशों के आपसी मतभेदों से मिली। 2017 में ही सऊदी अरब, UAE, बहरीन और मिस्र ने कतर से संबंध तोड़कर उस पर नाकाबंदी लगा दी। इसके अलावा ईरान को लेकर भी सभी देशों की सोच एक जैसी नहीं थी।

सऊदी अरब और यूएई ईरान को बड़ा खतरा मानते थे, जबकि ओमान और कतर तेहरान के साथ बातचीत के पक्ष में रहे। नतीजतन, MESA किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन या साझा कमान में नहीं बदल पाया।

इन सभी गठबंधनों के विफल होने की वजह बताते हुए यासिर अली मिर्जा कहते हैं, ‘इन पुराने गठबंधनों की विफलता का सबसे बड़ा कारण साझा राष्ट्रीय हितों और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था। बाहरी ताकतों (जैसे अमेरिका) की अरब देशों को विभाजित रखने की कोशिशों ने भी इन गठबंधनों को कमजोर किया। संक्षेप में कहें तो, कागजी समझौतों और भू-राजनीतिक यथार्थ के बीच का अंतर ही इनके विफलता की सबसे बड़ी वजह है।’

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