संसद और सुप्रीम कोर्ट भी जले, क्यों भड़की हिंसा, क्या है ट्रंप कनेक्शन... अल्बानिया की पूरी कहानी
अल्बानिया से फ्रांस तक, इटली से बेल्जियम तक देश सुलग रहे हैं। यूरोप के देशों में हिंसा की यह आग फैलती जा रही है। अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट के कुछ हिस्से और संसद परिसर में भी आग लगा दी गई। आइए जानते हैं इसकी वजह क्या है।
संसद और सुप्रीम कोर्ट भी जले, क्यों भड़की हिंसा, क्या है ट्रंप कनेक्शन... अल्बानिया की पूरी कहानी
20 अक्टूबर को तिराना में सरकार विरोधी प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर गुस्सा निकालती प्रदर्शनकारी।© AP

दुनिया का मैप घुमाइए। दक्षिण-पूर्वी यूरोप का एक छोटा सा देश अल्बानिया देखिए। राजधानी तिराना, 70 फीसदी इलाका पहाड़ी क्षेत्र, प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर, ऊंची चोटियां और गहरी घाटियां, झरने, छोटे-छोटे नीले पानी वाले समुद्री तट और ओटोमन साम्राज्य के दौरान पहाड़ों पर बने घरों की खिड़कियां जो दूर से हजारों की संख्या में दिखती हैं। यह सब इस देश की खूबसूरती के प्रतीक हैं, जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं। इस देश की आबादी महज 20 से 25 लाख है। ज्यादातर लोग इस्लाम को मानते  हैं।

इसे यूरोप का छिपा हुआ रत्न कहा जाता है, लेकिन अब यह खूबसूरत देश हिंसा और विरोध की आग में जल रहा है। कई दिनों से लाखों प्रदर्शनकारी सड़क पर हैं। आंदोलनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश की प्रमुख सरकारी इमारतों, संसद परिसर, बैंकों और ऐतिहासिक स्मारकों में आग लगा दी। पुलिस के साथ भीषण झड़पें हुई हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि अल्बानिया में लगी इस आग की चिंगारी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ी है।

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ट्रंप के दामाद की कंपनी और जल उठा अल्बानिया

हां, अल्बानिया में चल रहा आंदोलन फ्लेमिंगो क्रांति से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत मई 2026 के आखिर में हुई थी। इस आंदोलन की कहानी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जरेड कुश्नर के एक प्रोजेक्ट से जुड़ी है। दरअसल, अल्बानिया के दक्षिणी तट वेलोरा के पास साजान द्वीप और संरक्षित वेटलैंड एरिया पर जरेड कुश्नर के प्रोजेक्ट से जुड़ी कंपनी Affinity Partners लग्जरी रिजॉर्ट बनाना चाहती थी।

हालांकि, पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों ने माना कि इससे वातावरण को नुकसान पहुंचने के साथ अल्बानिया की फ्लेमिंगो प्रजातियों को खतरा हो जाएगा। फ्लेमिंगो जीनस एंकारिनी के पक्षी हैं, जो दुनिया में हंसों की 6-7 प्रजातियों में आते हैं। इसके अलावा इस प्रोजेक्ट के जमीनी सौदे में हुए कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आंदोलन शुरू हुआ, जो पहले शांतिपूर्ण चल रहा था। अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में इसमें छात्रों के शामिल हो जाने से इसने व्यापक रूप ले लिया। छात्र विश्वविद्यालयों और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा से जुड़ी तमाम शिकायतों को लेकर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे हैं।

'ट्रंप शुद्ध रूप से व्यापारी'

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट शांतेश कुमार सिंह ने RT हिंदी से बातचीत में कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शुद्ध रूप से व्यापारी हैं। उनका पूरा परिवार ही बिजनेस से जुड़ा है। भारत में भी ट्रंप टावर जैसे उनके प्रोजेक्ट हैं, जो दुनिया के कई अन्य देशों में हैं। अभी वह राष्ट्रपति हैं तो उनका पूरा फोकस है कि जो पैसा चुनावों में खर्च किया है, उसे पूरी तरह से कहीं से निकाला जाए। सरकार का इस्तेमाल अपने परिवार के लोगों को दूसरे देशों में प्रोजेक्ट दिलाने तक में कर रहे हैं।

अल्बानिया में भी ट्रंप ने यही काम किया है। तभी उनके दामाद को इतना बड़ा प्रोजेक्ट मिला। मगर स्थानीय विरोध इतना ज्यादा हावी हो गया है कि उसने मौजूदा अल्बानिया सरकार को ही संकट में डाल दिया है। अल्बानिया में जो आग लगी है, उसके लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और उनके दामाद जरेड कुश्नर भी जिम्मेदार हैं। 

Foreign Expert
ट्रंप की धमकी या आदेश को कोई देश माने तब भी और न माने तब भी उसे इसका परिणाम किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ता है। वेनेजुएला से लेकर ग्रीनलैंड, कनाडा, मेक्सिको और अब अल्बानिया आदि इसके उदाहरण हैं। 
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

पर्यटकों को क्यों आकर्षित करता है अल्बानिया

  • खूबसूरत समुद्र तट।
  • मेडिटेरेनियन की सबसे किफायती और कम भीड़ वाली जगहों में से एक।
  • समुद्र तट से लेकर बर्फ से ढके पहाड़ एक ही देश में।
  • ओटोमन और प्राचीन इतिहास।
  • सस्ता पर्यटन।
  • भोजन, आवास और यात्रा बहुत सस्ती।
  • एडवेंचर से भरपूर।
  • नीले पानी वाला स्वच्छ समुद्री तट।
  • जंगली पहाड़।
  • इतिहास से भरे पत्थर के शहर और गांव
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कैसे भड़का आंदोलन?

अल्बानिया की सरकार पर पूर्व संरक्षित क्षेत्र में ट्रंप के दामाद कुश्नर से जुड़े प्रोजेक्ट को जल्दबाजी में आगे बढ़ाने का आरोप है। यूरोपीय संसद के सदस्यों यानी डच सांसदों का कहना है कि सरकार इस लग्जरी प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरण नियमों से बचने की कोशिश कर रही है। यूरोपीय संसद के सदस्यों ने अल्बानिया पर देश में ट्रंप से जुड़े एक प्रस्तावित लग्जरी रिजॉर्ट के काम को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए “चालाकी भरे” तरीके अपनाने का आरोप लगाया है। इसी के चलते यह विरोध प्रदर्शन हिंसक होता जा रहा है।

जब प्रधानमंत्री एडी रामा ने सड़कों पर उतर रहे 'युवाओं की आवाज सुनने' का संकल्प लिया, तभी इस विवादित परियोजना को लेकर लंबे समय से चल रहे शांतिपूर्वक विरोध पर प्रदर्शनकारियों की अनदेखी करने को लेकर उनकी आलोचनाएं बढ़ने लगीं। इसके बाद छात्र अचानक हिंसक हो गए। इस आंदोलन का नेतृत्व छात्रों ने अपने हाथों में ले लिया, जो पहले यूरोपीय संसद के सदस्यों और आम लोगों तक सीमित था।

तिराना से भड़की आगजनी और हिंसा

छात्रों ने राजधानी तिराना में पुलिस के साथ सीधी मुठभेड़ शुरू कर दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट, शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और कई सरकारी बैंकों व सार्वजनिक संपत्तियों में आग लगा दी गई। आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को काबू में लाने के लिए आंसू गैस, वॉटर कैनन, बैटन और बाद में रबर बुलेट का इस्तेमाल किया। बाद में प्रदर्शन दूसरे शहरों में भी फैल गया। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार डच MEP टिनेके स्ट्रिक ने प्रधानमंत्री एडी रामा पर अमेरिकी राष्ट्रपति के दामाद जरेड कुश्नरकी योजनाओं को जिद के साथ आगे बढ़ाकर स्थिति को भड़काने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा, “अगर अल्बानियाई सरकार ने 'फ्लेमिंगो क्रांति' को गंभीरता से लिया होता, तो हम आज इस स्थिति में न होते। छात्र उन लोगों की निराशा को आवाज दे रहे हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी गई है।”

पूरे यूरोप में क्यों शुरू हो गए विरोध प्रदर्शन?

राजधानी तिराना में हिंसक झड़पों के लगातार छह दिन के बाद, नगरपालिका कार्यकर्ताओं को फुटपाथ के पत्थर हटाते और दुकानदारों को लोहे की चादरों से अपनी दुकानों को सुरक्षित करते देखा गया, क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस स्टेशन में भी आग लगा दी थी। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के प्रयास में रबर की गोलियों और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। छात्रों ने सोशलिस्ट नेता और प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफा देने तक प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प लिया है। महंगाई, भ्रष्टाचार और शिक्षा में सुधारों जैसी मांगों ने इस तरह के आंदोलन को फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल जैसे यूरोप के कई देशों में भड़का दिया है। 

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'संरक्षित क्षेत्रों में विला बनाना चाहते थे ट्रंप के दामाद'

तिराना में छात्रों का कहना है कि महीनों से प्रदर्शनों में शामिल हो रहे युवाओं का नारा था “अल्बानिया बिकाऊ नहीं है”। अब दूसरे मुद्दे भी हैं जो इस आग को भड़का रहे हैं। उनका कहना है कि हम वास्तव में अपने लोकतंत्र की स्थिति, जीवन स्तर और शिक्षा की परवाह करते हैं। ट्रंप के दामाद जरेड कुश्नर की कंपनी से जुड़ी इस विवादित परियोजना के तहत तटीय क्षेत्रों में 10,000 तक विला बनाने की योजना है।

इसे लेकर सरकार ने विवादित कानून भी पारित कर दिया है। लिहाजा लोगों का कहना है कि यह अब पर्यावरण के लिहाज से संरक्षित क्षेत्र नहीं रह गया है। इसी कानून ने “रणनीतिक निवेशकों” को भूमध्य सागर में अंतिम अखंड डेल्टा सिस्टम के आसपास व्योसा-नार्टा (जरेड की कंपनी) को क्षेत्र के हिस्सों में निर्माण करने की अनुमति दी थी।

यूरोपीय सांसदों ने की कानून निरस्त करने की मांग

आंदोलन के हिंसक होने से पहले यूरोपीय संसद ने यूरोपीय संघ के लिए कई साल से उम्मीदवार पेश करने वाले अल्बानिया से इस कानून को निरस्त करने का आह्वान किया और कहा कि यह पर्यावरण मानकों के लिए यह प्रोजेक्ट एक सीधा खतरा है। इसे यूरोपीय संघ की सदस्यता पाने के लिए गैर-समझौता योग्य शर्तें भी बताया गया। बावजूद इस प्रोजेक्ट को रोका नहीं गया। बाद में पता चला कि प्राकृतिक सैंक्चुरी तक पहुंचने के लिए रास्ता बनाने में प्राचीन टीलों और जंगलों को भी नष्ट कर दिया गया तो इससे लोग और खफा हो गए।

एडी रामा का क्या था टारगेट?

अल्बानिया में 2025 में हुए चुनाव में लगातार चौथे कार्यकाल के लिए चुने गए एडी रामा इस बालकन राज्य को 2030 तक यूरोपीय संघ के 27-सदस्यीय ब्लॉक में शामिल कराने के मिशन पर हैं। रविवार को सोशल मीडिया पर दिए गए एक सीधे संबोधन में उन्होंने कहा: “अल्बानियाई लोगों को बहुत स्पष्ट रूप से सोचने की जरूरत है: क्या वे यह (प्रोटेस्ट) चाहते हैं, या यूरोपीय संघ (EU) चाहते हैं?” अल्बानिया को उम्मीद है कि वह 2027 के अंत तक ईयू में शामिल होने के लिए वार्ता को पूरी कर लेगा। मगर ताजा विरोध प्रदर्शनों ने नया और बड़ा संकट पैदा कर दिया है।  

आरोप है कि सरकार का इरादा स्पष्ट रूप से यूरोपीय संघ के मानकों द्वारा कानूनी रूप से बाध्य होने से पहले इस प्रोजेक्ट को अंतिम रूप देने का है। इस तरह की चालाकी भरी और निष्ठाहीन प्रथाओं की यूरोपीय संघ द्वारा कड़ी आलोचना की जानी चाहिए। यदि अल्बानिया गंभीरता से एक विश्वसनीय उम्मीदवार सदस्य देश बनना चाहता है, तो उसे यूरोपीय संघ के कानून का सम्मान करना चाहिए और इससे बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वहीं छात्रों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर अल्बानिया के प्रधानमंत्री ने इस्तीफा न देने का संकल्प लिया। 

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