
अमेरिका फिर से टैरिफ पर लौट आया है। 100 पर्सेंट टैरिफ लगाने वाला बिल अमेरिकी संसद में पास हो गया। इस बिल के समर्थन में 262 और खिलाफ में 159 वोट पड़े। इस बिल पर एक साल से ज्यादा चर्चा की गई है। अब यह राष्ट्रपति ट्रंप की टेबल पर जाएगा।
अब उन देशों पर सख्ती की तैयारी है, जो अपने देश की जरूरतों के लिए रूस से तेल और गैस खरीदते हैं यानी रूस पर दबाव बनाने के लिए भारत जैसे देशों के पूरे व्यापार को निशाना बनाने की तैयारी है।
क्या?
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पास बिल रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों से आने वाले सभी सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का रास्ता खोल सकता है।
कैसे?
मूल बिल में भारत का नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं है। भारत और चीन समेत 10 देशों का नाम जोड़ने वाला स्टेनी होयर का संशोधन रूल्स कमेटी में खारिज हो चुका है। इसके बावजूद भारत के लिए मुश्किल कम नहीं हुई है, क्योंकि मूल बिल किसी देश का नाम लेने के बजाय रूस से तेल और गैस खरीदने वाले सबसे बड़े देशों को निशाना बनाता है।
क्यों?
अमेरिका सीधे यह संदेश देना चाहता है कि रूस से व्यापार जारी रखा तो अमेरिकी बाजार में उसकी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। भारत इसे ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित का फैसला मानता है, लेकिन वॉशिंगटन टैरिफ के जरिए उसी फैसले पर दबाव बनाने की तैयारी में है।
1. रूस सैंक्शंस बिल क्या है?
इसका नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ है। इसका मकसद रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर दबाव बढ़ाना और उन देशों को निशाना बनाना है जो बड़े पैमाने पर रूसी तेल और गैस खरीदते हैं। बिल में रूस के बड़े राजनेताओं, सैन्य अधिकारियों, सरकारी कंपनियों और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान है।

2. अमेरिकी संसद में बिल कहां तक पहुंचा?
अमेरिकी सीनेट (ऊपरी सदन) ने 7 अगस्त को इस बिल को भारी बहुमत (86 पक्ष में और 11 विरोध में) से पास किया था। इसके बाद प्रतिनिधि सभा (Lower House) में बिल को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया पर वोटिंग हुई। इसके समर्थन में 214 और विरोध में 211 वोट पड़े। यह बिल को अंतिम मंजूरी देने वाली वोटिंग नहीं थी। इस मतदान से केवल सीनेट से आए बिल पर प्रतिनिधि सभा में चर्चा और अंतिम फैसले का रास्ता खुला है। अब प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में वोटिंग हो चुकी है और इसे मंजूरी मिल चुकी है।
3. भारत का नाम कहां से आया?
सीनेट से पारित बिल में भारत या चीन का नाम सीधे नहीं लिखा गया है। इसमें रूस से तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों पर टैरिफ लगाने की मांग की गई है। हालांकि, डेमोक्रेट सांसद स्टेनी होयर ने अलग संशोधन पेश कर भारत और चीन समेत 10 देशों के नाम जोड़ने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन रूल्स कमेटी ने इस संशोधन को खारिज कर दिया। इसलिए भारत का नाम अब सदन के सामने रखे जाने वाले मूल प्रावधान में सीधे शामिल नहीं है।
4. नाम जोड़ने वाला संशोधन
स्टेनी होयर के संशोधन में भारत, चीन, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक रिपब्लिक, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाखस्तान और किर्गिज रिपब्लिक का नाम जोड़ने का प्रस्ताव था। लेकिन रूल्स कमेटी में इसके समर्थन में केवल 3 और विरोध में 7 वोट पड़े। इस वजह से संशोधन खारिज हो गया और उसे प्रतिनिधि सभा के सामने मतदान के लिए नहीं रखा गया। हालांकि, इससे भारत पर संभावित टैरिफ का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। मूल बिल में किसी देश का नाम नहीं है, लेकिन रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों को तय शर्तों के आधार पर इसके दायरे में लाया जा सकता है।
5. क्या भारत पर 100% टैरिफ लग गया है?
नहीं। फिलहाल, इस बिल के तहत भारत पर कोई नया 100 फीसदी टैरिफ नहीं लगा है। प्रतिनिधि सभा ने भी बिल को मंजूर तो कर दिया है। लेकिन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही यह कानून बनेगा। इसके बाद तय शर्तों के आधार पर रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों की पहचान की जाएगी।
6. टैरिफ का दायरा कितना बड़ा हो सकता है?
बिल के मुताबिक, इसके दायरे में आने वाले देश से अमेरिका पहुंचने वाले सभी सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। यानी यह शुल्क केवल रूसी तेल या तेल कारोबार से जुड़े सामान तक सीमित नहीं होगा। अगर भारत को तय शर्तों के आधार पर इसके दायरे में रखा जाता है, तो भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामान पर इसका असर पड़ सकता है।
7. क्या अमेरिकी सांसद बिल पर एकमत हैं?
नहीं। बिल के टैरिफ प्रावधानों को लेकर रूल्स कमेटी में मतभेद सामने आए। स्टेनी होयर ने भारत समेत 10 देशों के नाम जोड़ने का प्रस्ताव दिया था, जबकि ग्रेगरी मीक्स ने बड़े खरीदार देशों पर टैरिफ लगाने वाला पूरा प्रावधान हटाने की मांग की थी। दोनों प्रस्ताव खारिज हो गए। होयर का संशोधन 3-7 और टैरिफ प्रावधान हटाने वाला मीक्स का संशोधन भी 3-7 वोट से गिर गया। इसका मतलब है कि किसी देश का नाम जोड़े बिना मूल टैरिफ प्रावधान बरकरार है।
8. भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?
अगर ट्रंप प्रशासन भारत के खिलाफ इस शक्ति का इस्तेमाल करता है, तो भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगा हो सकता है। साथ ही भारत के सामने रूसी तेल से मिलने वाले आर्थिक फायदे और अमेरिकी बाजार में व्यापारिक नुकसान के बीच चुनाव जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह जरूरी नहीं है कि अमेरिका सभी भारतीय वस्तुओं पर एकमुश्त टैरिफ लगाए। संभव है कि कई उत्पादों को छूट दी जाए और केवल चुनिंदा क्षेत्रों को ही टारगेट किया जाए। अगर ऐसा होता है, तो इसका सबसे बड़ा झटका कपड़ा, चमड़ा, फुटवियर और अन्य लेबर-इंटेंसिव उद्योगों को लगेगा।
9. रूसी तेल की खरीद पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत सरकार के पूर्व वाणिज्य एवं उद्योग सचिव अजय दुआ ने RT India से कहा कि अगर रूसी तेल खरीदने की वजह से भारत पर 100 फीसदी शुल्क लगाया जाता है, तो भारी छूट के बिना रूसी तेल खरीदना आर्थिक रूप से वहन करने योग्य नहीं रह सकता।
हालांकि, दुआ ने भारत के बढ़ते आर्थिक कद और अमेरिका के साथ उसके लोकतांत्रिक मूल्यों की समानता की ओर भी ध्यान दिलाया।
10. भारत सरकार का रुख क्या है?
विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर साफ किया है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के फैसले राष्ट्रीय हित के आधार पर करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, 'जहां तक भारत की ऊर्जा खरीद का सवाल है, वह राष्ट्रीय हित पर आधारित है।'
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था में 'हर चीज को हथियार बनाए जाने' की ओर इशारा किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया में टैरिफ को लेकर अस्थिरता बढ़ रही है और प्रतिस्पर्धा कम संयम और ज्यादा जोखिम वाला रूप ले रही है। जयशंकर का यह बयान उस दौर की तस्वीर पेश करता है जिसमें तेल, व्यापार और टैरिफ अब केवल आर्थिक विषय नहीं रह गए हैं। इनका इस्तेमाल देशों की विदेश नीति और रणनीतिक फैसलों को प्रभावित करने के औजार के रूप में भी किया जा रहा है।
❗EAM Jaishankar: ‘Global Economy Witnessing The Weaponization Of Everything’
— RT_India (@RT_India_news) September 15, 2026
He said the world is seeing greater tariff volatility, increased dumping and competition taking “an extreme form with less restraint and higher risks.”
“What can be done to deter, to avoid, to… https://t.co/382n3DaTlMpic.twitter.com/nXW3hqnBl6
भारत के पास क्या विकल्प हैं?
इस पर बात करते हुए लेखक और विदेश मामलों के जानकार रोबिंदर सचदेव कहते हैं कि भारत के सामने मुख्य रूप से दो विकल्प हैं:
- रूस से तेल खरीदना जारी रखना: भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत रूस से तेल खरीदना जारी रख सकता है। साथ ही अमेरिका के साथ शुल्क को लेकर बातचीत करने की कोशिश की जा सकती है। इस स्थिति में भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को कायम रखते हुए कुछ आर्थिक नुकसान भी सहना पड़ सकता है।
- रूस से तेल की खरीद कम करना: भारत आधिकारिक तौर पर रूस से तेल की खरीद कुछ कम कर सकता है और दूसरे माध्यमों के जरिए तेल खरीदने की कोशिश कर सकता है।
आगे क्या देखना होगा?
अब सबकी नजर इस बात पर है कि कानून बनने पर रूस से तेल और गैस खरीदने वाले किन देशों को इसके दायरे में रखा जाता है।







