आग या लावा नहीं, भारत का मिट्टी उगलने वाला ज्वालामुखी चर्चा में है
दुनिया में कुछ जगहें ऐसी हैं, जहां जमीन से लावा नहीं, बल्कि मिट्टी बाहर निकलती है। कम लोग जानते होंगे कि भारत में भी कुदरत का यह अनोखा नजारा मौजूद है।
भारत
आग या लावा नहीं, भारत का मिट्टी उगलने वाला ज्वालामुखी चर्चा में है
अंडमान के समुद्र में धरती की हलचल से बने ज्वालामुखी।

ज्वालामुखी यानी Volcano का नाम सुनते ही आंखों के सामने आग उगलता पहाड़, लाल लावा और आसमान में उठता धुएं का गुबार आ जाता है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे ज्वालामुखी के बारे में सुना है, जो लावा नहीं, बल्कि मिट्टी उगलता है? जहां धरती के भीतर से पिघली हुई चट्टानों की जगह पानी, गैस और गीली मिट्टी का मिश्रण सतह पर आता है? भारत में ऐसी ही एक अनोखी भूगर्भीय संरचना मौजूद है, जो अब UNESCO की वजह से चर्चा में है।

यह जगह है अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का बाराटांग द्वीप (Baratang Island)। यहां मौजूद मिट्टी के ज्वालामुखी, चूना-पत्थर की गुफाएं और धरती के भीतर चलने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाएं इसे खास बनाती हैं। स्थानीय लोग इन मिट्टी के ज्वालामुखियों को ‘जलकी’ कहते हैं। UNESCO के World Heritage Centre ने बाराटांग के Karst-mud-volcano Complex को भारत के दो अन्य स्थलों के साथ UNESCO की संभावित विश्व धरोहर लिस्ट (World Heritage Convention Tentative List) में शामिल किया है।

लेकिन पहले समझते हैं कि आखिर बाराटांग का यह मिट्टी वाला ज्वालामुखी सामान्य ज्वालामुखियों से अलग क्यों है।

अंडमान के बाराटांग द्वीप पर मिट्टी के ज्वालामुखी।

धरती के पेट से मिट्टी कैसे निकलती है?

आमतौर पर ज्वालामुखी की कल्पना मैग्मा यानी धरती के भीतर मौजूद पिघली हुई चट्टानों से जुड़ी होती है। मैग्मा सतह पर आने के बाद लावा कहलाता है। लेकिन मिट्टी के ज्वालामुखी की कहानी इससे अलग है। यहां मैग्मा के बजाय जमीन के भीतर दबाव में मौजूद मिट्टी, पानी और गैसें बाहर निकलती हैं।

बाराटांग में जमीन के नीचे मौजूद तलछटी चट्टानों की परतों में दबाव बनता है। गैसें और तरल पदार्थ इस दबाव के कारण ऊपर की ओर बढ़ते हैं और अपने साथ महीन मिट्टी को भी सतह तक ले आते हैं। UNESCO के मुताबिक, दबावग्रस्त शेल यानी महीन दानेदार तलछटी चट्टानों की परतों की हलचल इसमें अहम भूमिका निभाती है। बाहर निकली मिट्टी जमा होकर छोटे-छोटे टीले, शंकु और गड्ढेनुमा संरचनाएं बना सकती है।

इस प्रक्रिया में मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें भी शामिल हो सकती हैं इसलिए मिट्टी के ज्वालामुखी को सामान्य ज्वालामुखी का छोटा या ठंडा रूप समझना सही नहीं होगा। दोनों के बनने की प्रक्रिया अलग है। सामान्य ज्वालामुखी में मैग्मा की भूमिका होती है, जबकि मिट्टी के ज्वालामुखी में गैसों और दबाव के कारण मिट्टी और पानी सतह पर आते हैं।

बाराटांग द्वीप पर मिट्टी उगलती धरती।

20 साल शांत रहे, फिर 2025 में दिखी हलचल

बाराटांग के मिट्टी के ज्वालामुखी हमेशा सक्रिय नहीं रहते। कभी इनसे मिट्टी और गैसें बाहर निकलती हैं, तो कभी लंबे समय तक ये शांत पड़े रहते हैं। UNESCO के दस्तावेज के अनुसार, यहां मिट्टी के ज्वालामुखियों के चार समूह हैं, जिनमें कई छोटे वेंट यानी मिट्टी और गैस निकलने वाले छिद्र शामिल हैं। केंद्रीय टीले पर मौजूद वेंट करीब दो मीटर ऊंचाई तक पहुंचते हैं।

इनकी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ 2025 में आया। करीब 20 साल की निष्क्रियता के बाद यहां फिर गतिविधि देखी गई। इससे इस अनोखी भूगर्भीय संरचना की ओर ध्यान गया।

इसके पीछे अंडमान क्षेत्र की भूगर्भीय बनावट भी अहम है। यहां भारतीय प्लेट बर्मा माइक्रोप्लेट के नीचे धंस रही है। इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहते हैं। इससे धरती की परतों में दबाव और भूगर्भीय बदलाव पैदा होते हैं। हालांकि, मिट्टी के ज्वालामुखी की गतिविधि को सामान्य ज्वालामुखीय विस्फोट के बराबर नहीं समझना चाहिए।

बाराटांग द्वीप पर धरती से निकलती मिट्टी।

मिट्टी के ज्वालामुखी के साथ गुफाओं की दुनिया

बाराटांग की अहमियत सिर्फ मिट्टी के ज्वालामुखियों तक सीमित नहीं है। यहां चूना-पत्थर की गुफाओं का एक बड़ा परिसर भी मौजूद है। UNESCO के मुताबिक, प्रस्तावित क्षेत्र में करीब एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में अनेक चूना-पत्थर की गुफाएं हैं। इनमें से कई तक पहुंचना कठिन है, क्योंकि यहां की जमीन ऊबड़-खाबड़ है और जगह-जगह गहरी दरारें, संकरे रास्ते और भूमिगत कक्ष मौजूद हैं।

इन गुफाओं का निर्माण लाखों साल में हुई प्राकृतिक प्रक्रियाओं का नतीजा है। समुद्री जीवों के खोल, मूंगे और दूसरे जैविक अवशेष जमा होकर चूना-पत्थर की चट्टानों का हिस्सा बने। बाद में बारिश का पानी इन चट्टानों को धीरे-धीरे घोलता रहा। समय के साथ दरारें चौड़ी हुईं और गुफाओं, सुरंगों तथा भूमिगत रास्तों का निर्माण हुआ। इस तरह की भू-आकृति को कार्स्ट (Karst) कहा जाता है।

गुफाओं के भीतर पानी में घुले खनिजों के जमाव से स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट जैसी संरचनाएं बनती हैं। छत से नीचे की ओर लटकती खनिज संरचनाएं स्टैलेक्टाइट और जमीन से ऊपर उठती संरचनाएं स्टैलेग्माइट कहलाती हैं। इन्हें बनने में बहुत लंबा समय लग सकता है।

बाराटांग द्वीप के मिट्टी के ज्वालामुखी और चूना-पत्थर की गुफाएं।

इन गुफाओं और आसपास के उष्णकटिबंधीय जंगलों का आपस में गहरा संबंध है। यह क्षेत्र गुफाओं में रहने वाले जीवों और वन्यजीवों के लिए भी अहम है। इस तरह बाराटांग का यह परिसर भूगर्भ विज्ञान, प्राकृतिक इतिहास और जैव विविधता- तीनों लिहाज से महत्वपूर्ण है।

अंडमान के ज्वालामुखीय द्वीप और छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक सिरपुर

UNESCO की संभावित लिस्ट में शामिल दूसरा स्थल Andaman Subduction Volcanoes है। इसमें बैरन आइलैंड और नारकोंडम आइलैंड शामिल हैं। बाराटांग के मिट्टी वाले ज्वालामुखियों से अलग, इनका संबंध मैग्मा और टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से है।

बैरन आइलैंड भारत का एकमात्र पुष्ट सक्रिय मैग्मा-आधारित ज्वालामुखी है, जहां समय-समय पर ज्वालामुखीय गतिविधि दर्ज की गई है। वहीं नारकोंडम एक लंबे समय से निष्क्रिय ज्वालामुखीय द्वीप है। यहां नारकोंडम हॉर्नबिल नाम का पक्षी पाया जाता है। दोनों द्वीप वैज्ञानिकों को ज्वालामुखीय गतिविधि और उससे प्रभावित पारिस्थितिकी को समझने का अवसर देते हैं।

समुद्र के नीचे छिपी ज्वालामुखियों की दुनिया।

तीसरा स्थल छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित सिरपुर सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक स्थल है। महानदी के किनारे बसा सिरपुर प्राचीन दक्षिण कोसल का महत्वपूर्ण केंद्र था। यहां हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़े पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं। नदी के जरिए होने वाले व्यापार ने इसके विकास में अहम भूमिका निभाई। आज भी यहां गांव, स्थानीय समुदाय और आसपास का प्राकृतिक परिवेश इस ऐतिहासिक परिदृश्य का हिस्सा हैं।

सिरपुर का ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल।

UNESCO की Tentative List में शामिल होने का क्या मतलब है?

इन तीनों स्थलों को अभी UNESCO की अंतिम World Heritage List में शामिल नहीं किया गया है। संभावित लिस्ट में जगह मिलना उस प्रक्रिया का शुरुआती चरण है, जिसके बाद कोई देश किसी स्थल को विश्व धरोहर के दर्जे के लिए औपचारिक रूप से नामांकित कर सकता है। इसके बाद स्थल की वैश्विक अहमियत और संरक्षण संबंधी मानकों का मूल्यांकन किया जाता है।

भारत के UNESCO स्थित स्थायी प्रतिनिधिमंडल ने इन स्थलों के दस्तावेजीकरण और विरासत संबंधी शोध के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के काम की सराहना की है।

एक तरफ बाराटांग में मिट्टी उगलती धरती और लाखों साल में बनी गुफाएं हैं, दूसरी तरफ अंडमान के ज्वालामुखीय द्वीप और छत्तीसगढ़ में प्राचीन सभ्यता के निशान। ये तीनों स्थल दिखाते हैं कि भारत की जमीन अपने भीतर प्राकृतिक बदलावों से लेकर इंसानी इतिहास तक की कितनी अनूठी कहानियां समेटे हुए है।

ताज़ा ख़बरें