
सोचिए... एक विमान हजारों फीट ऊपर उड़ रहा हो और अचानक मौत का खतरा मंडराने लगे। कहीं कॉकपिट के अंदर हमला हुआ तो कहीं आतंकियों ने पूरे विमान को अपने कब्जे में ले लिया। चीख-पुकार, अफरातफरी और हर पल बढ़ता खतरा... ऐसे वक्त में दिमाग सुन्न हो जाता है और सोचने-संभलने तक का मौका नहीं मिलता।
लेकिन इतिहास ऐसे ही पलों में कुछ नाम दर्ज करता है।
सितंबर 1986... और सितंबर 2026। 40 साल का फासला, दो अलग विमान, दो अलग संकट... लेकिन जज्बा एक ही- खुद खतरे में रहकर दूसरों की जिंदगी बचाना।
एक कहानी है नीरजा भनोट की और दूसरी कैप्टन स्मित मच्छार की। एक ने कराची एयरपोर्ट पर आतंकियों के कब्जे वाले विमान में सैकड़ों यात्रियों को बचाने की कोशिश करते हुए अपनी जान गंवाई, तो दूसरे ने हजारों फीट की ऊंचाई पर गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कॉकपिट का दरवाजा खोलकर विमान को सुरक्षित हाथों में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
1986: कराची में नीरजा ने संभाला मोर्चा
5 सितंबर 1986... Pan Am Flight 73 मुंबई से फ्रैंकफर्ट और न्यूयॉर्क के सफर पर थी। कराची एयरपोर्ट पर शेड्यूल्ड स्टॉप ओवर के लिए उतरने के तुरंत बाद आतंकवादियों ने विमान को हाईजैक कर लिया। विमान में 359 यात्री सवार थे।
कॉकपिट क्रू के विमान से निकल जाने के बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी केबिन क्रू पर आ गई। उस वक्त विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर (Senior Flight Purser) थीं 23 साल की नीरजा भनोट। जो केबिन क्रू की वरिष्ठ सदस्य थीं।
आतंकियों ने यात्रियों के पासपोर्ट मांगे, ताकि अमेरिकी नागरिकों की पहचान की जा सके। नीरजा ने पासपोर्ट इकट्ठा किए, लेकिन अमेरिकी यात्रियों की पहचान छिपाने के लिए कई पासपोर्ट अलग कर दिए।

एग्जिट खोला, यात्रियों को बाहर निकाला, फिर...
फिर हालात बिगड़ गए। विमान के अंदर गोलीबारी शुरू हुई और यात्रियों में भगदड़ मच गई। नीरजा ने इमरजेंसी एग्जिट खोलने और यात्रियों को बाहर निकालने में मदद की। बच्चों समेत दूसरे यात्रियों को बचाने की कोशिश के दौरान वह खुद आतंकियों की गोली का शिकार हो गईं।
नीरजा की उम्र सिर्फ 23 साल थी।

भारत ने उनके साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। पाकिस्तान ने भी उन्हें मरणोपरांत तमगा-ए-इंसानियत दिया।
करीब चार दशक बाद, एक बार फिर एक भारतीय आसमान में सैकड़ों जिंदगियों के लिए मसीहा बनाकर आया।

2026: 33 हजार फीट ऊपर स्मित की लड़ाई
30 सितंबर 2026.. दुबई से तेल अवीव जा रही Flydubai की फ्लाइट FZ1073 करीब 33 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रही थी। विमान में 174 यात्री सवार थे। सब कुछ सामान्य था, लेकिन कुछ ही पलों में कॉकपिट के भीतर हालात बेकाबू हो गए।
भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर उनके साथ मौजूद को-पायलट ने धारदार हथियार से हमला कर दिया। हमलावर विमान का नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान विमान तेजी से नीचे आने लगा और करीब एक मिनट में उसने 17 हजार फुट नीचे आ गया।
दरवाजा खुला... और बाहर वालों को अंदर आने का रास्ता मिला
कॉकपिट के अंदर स्मित गंभीर रूप से घायल थे। वह खून से लथपथ फर्श पर पड़े थे। लेकिन खतरा सिर्फ उनकी जिंदगी पर नहीं था- पीछे विमान में 174 यात्रियों की जान दांव पर थी।
ऐसे वक्त में स्मित ने अपनी बची हुई ताकत जुटाई। उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया।

दरवाजा खुलते ही केबिन क्रू और कुछ यात्री कॉकपिट तक पहुंच सके। हमलावर को काबू करने की कोशिश शुरू हुई। विमान में मौजूद ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने भी मदद की और विमान का नियंत्रण सुरक्षित हाथों में वापस आया।
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और फिर सुरक्षित लैंड हुए सभी यात्री
इसके बाद FZ1073 को इजरायल के बजाय सऊदी अरब के तबूक की ओर डायवर्ट किया गया। आखिरकार विमान सुरक्षित रूप से तबूक में उतर गया। घायल स्मित और दूसरे पायलट को अस्पताल ले जाया गया।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्मित के साहस की तारीफ की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके धैर्य, सूझबूझ और साहस को सराहा। उन्होंने नेतन्याहू के हवाले से कहा कि एक भारतीय ने 9/11 जैसा बड़ा हादसा होने से रोक दिया।
40 साल पहले नीरजा भनोट ने कराची में दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी। 40 साल बाद कैप्टन स्मित मच्छार ने आसमान में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद दूसरों को बचाने की कोशिश जारी रखी।
दो अलग दौर। दो अलग विमान। दो अलग संकट। लेकिन एक ही जज्बा- जब सैकड़ों जिंदगियां खतरे में हों, तो अपनी जान से पहले दूसरों की जिंदगी को रखना।
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