सोचिए, आप हाइवे पर गाड़ी चला रहे हैं। आगे-पीछे सैकड़ों गाड़ियां हैं, लेकिन न कोई लेन है, न ट्रैफिक सिग्नल और न ही कोई पुलिसकर्मी। ऐसे में टक्कर से कैसे बचेंगे? अब इसी तस्वीर को अंतरिक्ष में ले जाइए, जहां भारत, रूस, अमेरिका और चीन के सैटेलाइट्स पृथ्वी के चक्कर लगा रहे हैं। वहां न देशों की जमीन जैसी सीमाएं हैं, न सड़कों जैसी तय लेन और न ही कोई एक ट्रैफिक पुलिस। फिर भी सैटेलाइट्स को एक-दूसरे से टकराने से बचाना जरूरी है। आखिर अंतरिक्ष में यह व्यवस्था कैसे काम करती है और खतरा होने पर रास्ता कौन बदलता है?
अंतरिक्ष में किसका कितना इलाका?
सबसे पहले समझते हैं कि अंतरिक्ष में देशों की सीमाएं होती हैं या नहीं। पृथ्वी पर हर देश का अपना हवाई क्षेत्र है जिसे एयर स्पेस कहते हैं। किसी दूसरे देश का विमान वहां प्रवेश करता है, तो उसे तय नियमों का पालन करना पड़ता है लेकिन अंतरिक्ष का मामला अलग है।
साल 1967 में लागू आउटर स्पेस ट्रीटी के मुताबिक, कोई देश अंतरिक्ष पर अपना संप्रभु अधिकार नहीं जता सकता। यानी कोई देश यह दावा नहीं कर सकता कि पृथ्वी से एक खास ऊंचाई के बाद का पूरा अंतरिक्ष सिर्फ उसी का है। अंतरिक्ष सभी देशों के इस्तेमाल के लिए खुला है, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में।
संयुक्त राष्ट्र के बाहरी अंतरिक्ष मामलों के कार्यालय (UNOOSA) के मुताबिक, इस संधि में देशों की अंतरिक्ष गतिविधियों की जिम्मेदारी और अंतरिक्ष में उनके द्वारा भेजी गई वस्तुओं से होने वाले नुकसान से जुड़े सिद्धांत भी शामिल हैं। निजी कंपनियों की गतिविधियों के लिए भी संबंधित देश की जिम्मेदारी तय होती है।
लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। अंतरिक्ष पर किसी देश का मालिकाना हक नहीं होने का मतलब यह नहीं कि वहां कोई व्यवस्था ही नहीं है। सैटेलाइट्स की कक्षाएं तय होती हैं, उनके रास्तों पर नजर रखी जाती है और संभावित टक्कर से बचने के लिए ऑपरेटर कदम उठाते हैं। फर्क बस इतना है कि यह काम किसी एक वैश्विक ट्रैफिक कंट्रोल रूम से नहीं होता।
एक ऑर्बिट में कई सैटेलाइट्स, तो टक्कर क्यों नहीं होती?
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के मुताबिक, अक्टूबर 2026 तक पृथ्वी की कक्षा में करीब 15,900 सक्रिय सैटेलाइट्स हैं। वहीं, काम करने वाले और बंद हो चुके सैटेलाइट्स को मिलाकर लगभग 19,440 सैटेलाइट्स अब भी पृथ्वी की कक्षा में मौजूद हैं।हालांकि यहां ध्यान देने वाली बात है कि अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर हो सकता है, क्योंकि उनके ट्रैकिंग कैटलॉग और गिनती के तरीके अलग-अलग हैं।
क्या ये हजारों सैटेलाइट्स स्पेस में एक ही जगह होते हैं? जवाब है नहीं... पृथ्वी के चारों ओर घूमने वाले सैटेलाइट्स अलग-अलग ऊंचाइयों और कक्षाओं यानी ऑर्बिट में होते हैं। कुछ पृथ्वी के करीब रहकर तस्वीरें लेते हैं या इंटरनेट सेवाएं देते हैं, जबकि कुछ बहुत ऊंचाई पर रहकर संचार और दूसरी सेवाओं में मदद करते हैं।
अब मान लीजिए कि भारत और अमेरिका के दो सैटेलाइट एक ही ऊंचाई पर हैं। क्या इसका मतलब है कि वे टकरा जाएंगे? जरूरी नहीं।
यहां ऊंचाई के अलावा सैटेलाइट की गति, कक्षा का झुकाव और पृथ्वी के चारों ओर उसका रास्ता भी मायने रखता है। दो सैटेलाइट एक ही ऊंचाई पर घूम सकते हैं, लेकिन उनकी कक्षाएं अलग हों तो वे एक-दूसरे से सुरक्षित दूरी पर रह सकते हैं।
इसे ऐसे समझिए कि दो ट्रेनें एक ही पुल से गुजरती हैं। पुल एक है, लेकिन दोनों ट्रेनों की दिशा, गति और गुजरने का समय अलग हो सकता है। सिर्फ पुल एक होने से टक्कर नहीं हो जाती।
हालांकि, अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स के लिए हवाई जहाजों जैसी तय लेन की एक सार्वभौमिक व्यवस्था नहीं है। खासकर पृथ्वी के नजदीक वाली कक्षाओं में सैटेलाइट्स और पुराने रॉकेटों के टुकड़ों की मौजूदगी के कारण संभावित टकराव पर नजर रखना जरूरी हो जाता है।
सैटेलाइट्स पर नजर कौन रखता है?
टक्कर से बचने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि अंतरिक्ष में कौन-सी वस्तु कहां है और किस दिशा में बढ़ रही है।
इसके लिए जमीन पर मौजूद रडार, ऑप्टिकल टेलिस्कोप और दूसरे ट्रैकिंग सिस्टम की मदद ली जाती है। इनसे सैटेलाइट्स और अंतरिक्ष में मौजूद मलबे की स्थिति का पता लगाने में मदद मिलती है। इस जानकारी के आधार पर गणना की जाती है कि आने वाले समय में दो वस्तुएं कितनी करीब से गुजर सकती हैं।
इस प्रक्रिया को Conjunction Assessment कहा जाता है। आसान भाषा में कहें तो यह संभावित नजदीकी गुजरने और उससे जुड़े टकराव के खतरे का आकलन है।
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मसलन, अगर किसी सैटेलाइट के रास्ते में पुराने रॉकेट का कोई टुकड़ा आने की आशंका है, तो दोनों की स्थिति और गति के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि वे कब और कितनी दूरी पर होंगे। खतरा तय सीमा से ज्यादा होने पर सैटेलाइट ऑपरेटर को रास्ता बदलने पर विचार करना पड़ सकता है।
लेकिन हर बार दो वस्तुओं का करीब से गुजरना टक्कर का संकेत नहीं होता। उनकी स्थिति का अनुमान कितना सटीक है, संभावित दूरी कितनी है और टक्कर की आशंका कितनी है- इन सभी बातों को ध्यान में रखा जाता है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) अंतरिक्ष के मलबे की निगरानी और टकराव से बचाव के लिए काम करती है। वहीं, NASA भी अपने अंतरिक्ष अभियानों और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की सुरक्षा के लिए ऐसी निगरानी और जोखिम आकलन का इस्तेमाल करता है।
भारत में कौन संभालता है यह जिम्मेदारी?
भारत के लिए भी सैटेलाइट्स को टक्कर से बचाना अहम है, क्योंकि मौसम, संचार, नेविगेशन और पृथ्वी की निगरानी जैसी सेवाएं इन पर निर्भर हैं।
इसके लिए ISRO ने IS4OM व्यवस्था बनाई है, जो अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं की निगरानी, संभावित टक्कर के खतरे का आकलन और बचाव के उपायों से जुड़े काम संभालती है। वहीं, NETRA प्रोजेक्ट रडार और ऑप्टिकल टेलिस्कोप जैसी सुविधाओं के जरिए भारत की अपनी अंतरिक्ष निगरानी क्षमता मजबूत कर रहा है।
ISRO की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीहरिकोटा का मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार स्पेस में बड़ी वस्तुओं को ट्रैक कर सकता है, जबकि लद्दाख के हानले में ऑप्टिकल टेलिस्कोप स्थापित करने का काम जारी था। यानी भारत दूसरे देशों से मिलने वाले डेटा के साथ अपनी निगरानी व्यवस्था भी मजबूत कर रहा है।
भारत को कितनी बार बदलना पड़ा सैटेलाइट्स का रास्ता?
ISRO की भारतीय अंतरिक्ष स्थिति आकलन रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, पिछले साल पृथ्वी की कक्षा में मौजूद भारतीय सैटेलाइट्स के लिए टक्कर से बचने के लिए 18 कक्षीय बदलाव किए गए। इसके अलावा, चंद्रयान-2 ऑर्बिटर की कक्षा से जुड़ी दो योजनाओं में भी संभावित नजदीकी को देखते हुए बदलाव किया गया।
इसी दौरान, अमेरिकी अंतरिक्ष कमान के Combined Space Operations Center से मिले 1.5 लाख से ज्यादा अलर्ट का विश्लेषण किया गया। हालांकि, हर अलर्ट का मतलब टक्कर का निश्चित खतरा नहीं होता।
सावधानी लॉन्च से पहले भी बरती जाती है। ISRO के मुताबिक, 30 दिसंबर 2024 को PSLV-C60/SPADEX मिशन का लॉन्च संभावित टक्कर के जोखिम के आकलन के बाद 2 मिनट 15 सेकंड टाल दिया गया था।
जब दो सैटेलाइट्स आमने-सामने आ जाएं, तो कौन रास्ता बदलता है?
सैटेलाइट्स की निगरानी का असली इम्तिहान तब होता है, जब दो सक्रिय सैटेलाइट्स के रास्ते एक-दूसरे के बेहद करीब आने वाले हों। ऐसे में संबंधित ऑपरेटरों को खतरे का आकलन करना पड़ता है। जरूरत पड़ने पर सैटेलाइट की कक्षा में बदलाव किया जाता है। इसे Collision Avoidance Manoeuvre कहते हैं।
इसका एक वास्तविक उदाहरण सितंबर 2019 में सामने आया। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Aeolus सैटेलाइट और अमेरिकी कंपनी SpaceX के Starlink नेटवर्क के एक सैटेलाइट के बीच टक्कर की आशंका पैदा हुई। Aeolus पृथ्वी की हवाओं का अध्ययन करता है, जबकि Starlink सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए इस्तेमाल होते हैं।
ESA के मुताबिक, उसने अपने Aeolus सैटेलाइट के थ्रस्टर्स चालू करके उसकी कक्षा में बदलाव किया, ताकि संभावित टक्कर से बचा जा सके।
इस घटना का एक और अहम पहलू था। ESA ने बताया कि उस समय दो सक्रिय सैटेलाइट्स के बीच टक्कर से बचने के लिए तालमेल की प्रक्रिया काफी हद तक मैनुअल थी। यानी खतरे की जानकारी मिलने के बाद ऑपरेटरों को आपस में संपर्क करके कदम उठाने पड़ते थे। एजेंसी ने यह भी चिंता जताई कि सैटेलाइट्स की संख्या बढ़ने के साथ इस तरह की प्रक्रिया को बड़े पैमाने पर संभालना मुश्किल हो सकता है।
यह उदाहरण बताता है कि अंतरिक्ष में हर सैटेलाइट के लिए कोई एक केंद्रीय अधिकारी रास्ता तय नहीं करता। संभावित टक्कर की जानकारी, ऑपरेटरों के बीच तालमेल और समय पर लिया गया फैसला बेहद अहम होता है।
जब सामने वाला सैटेलाइट नहीं, मलबा हो तो?
अंतरिक्ष में खतरा सिर्फ सक्रिय सैटेलाइट्स से नहीं, बल्कि पुराने सैटेलाइट्स और रॉकेट के टुकड़ों से भी है। इन्हें स्पेस डेब्रिस यानी अंतरिक्ष का मलबा कहते हैं। चूंकि ये खुद रास्ता नहीं बदल सकते, इसलिए सक्रिय सैटेलाइट या अंतरिक्ष स्टेशन को अपनी कक्षा बदलनी पड़ सकती है।
30 अप्रैल 2025 को NASA ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की कक्षा चीनी लॉन्ग मार्च रॉकेट के एक टुकड़े से बचने के लिए बदली गई। रूसी Progress 91 यान के थ्रस्टर्स 3 मिनट 33 सेकंड तक चालू किए गए, ताकि स्टेशन मलबे से सुरक्षित दूरी पर निकल सके।
इस कार्रवाई में NASA, रूस की अंतरिक्ष एजेंसी Roscosmos और दूसरे साझेदारों ने तालमेल किया। यानी जब मलबा हटाना संभव न हो, तो टक्कर से बचने के लिए यान का रास्ता बदलना पड़ता है।
अंतरिक्ष के नियम कौन बनाता है?
अब सवाल है कि अगर कोई एक वैश्विक ट्रैफिक पुलिस नहीं है, तो नियम कौन बनाता है?
इसका जवाब है- अलग-अलग संस्थाएं अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाती हैं।
संयुक्त राष्ट्र के तहत काम करने वाला UNOOSA अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून से जुड़े काम में भूमिका निभाता है। वहीं, COPUOS यानी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र समिति अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अंतरिक्ष गतिविधियों के कानूनी पहलुओं पर चर्चा करती है।
दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) सैटेलाइट्स के रेडियो फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल और नेटवर्क के बीच समन्वय का काम करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करने में मदद करना है कि अलग-अलग सैटेलाइट नेटवर्क के रेडियो सिग्नल एक-दूसरे के काम में बाधा न डालें।
हालांकि, यहां एक फर्क समझना जरूरी है। ITU सैटेलाइट्स की भौतिक आवाजाही को नियंत्रित करने वाला ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम नहीं है। उसका मुख्य काम रेडियो फ्रीक्वेंसी और संबंधित ऑर्बिटल संसाधनों के अंतरराष्ट्रीय समन्वय से जुड़ा है।
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सैटेलाइट लॉन्च करने और उसके संचालन की अनुमति संबंधित देश की राष्ट्रीय व्यवस्था के तहत आती है। आउटर स्पेस ट्रीटी के मुताबिक, देश अपनी सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ अपने गैर-सरकारी संस्थानों की अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदार होते हैं।
यानी अंतरिक्ष में नियम, निगरानी और टकराव से बचाव एक ही व्यवस्था के तीन नाम नहीं हैं। इनके लिए अलग-अलग संस्थाओं, देशों और सैटेलाइट ऑपरेटरों को अपनी-अपनी भूमिका निभानी पड़ती है।
क्या अंतरिक्ष का बढ़ता ट्रैफिक नई चुनौती बनेगा?
इंटरनेट सेवाओं के लिए हजारों सैटेलाइट्स के नेटवर्क बनाए जा रहे हैं। ऐसे नेटवर्क को मेगा-कॉन्स्टेलेशन कहा जाता है। सैटेलाइट्स की संख्या बढ़ने के साथ उनके रास्तों की निगरानी, संभावित टक्कर की चेतावनियों और ऑपरेटरों के बीच तालमेल की जरूरत भी बढ़ती है।
अंतरिक्ष में मौजूद मलबा इस चुनौती को और जटिल बनाता है। किसी निष्क्रिय वस्तु को रास्ता बदलने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, जबकि सक्रिय सैटेलाइट्स के बीच तालमेल न होने पर दोनों ऑपरेटर अलग-अलग फैसले ले सकते हैं। इसलिए सटीक जानकारी साझा करना और टकराव से बचने के फैसलों में समन्वय करना अहम है।
आने वाले समय में ऐसे सिस्टम की जरूरत बढ़ सकती है, जो सैटेलाइट्स की स्थिति का तेजी से आकलन करें, संभावित टकराव की चेतावनी दें और ऑपरेटरों को सही समय पर फैसला लेने में मदद करें। लेकिन तकनीक के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, अंतरिक्ष में न देशों की जमीन जैसी सीमाएं हैं और न ही कोई एक वैश्विक ट्रैफिक पुलिस। सैटेलाइट्स की सुरक्षित आवाजाही निगरानी, गणना, अंतरराष्ट्रीय नियमों और ऑपरेटरों के तालमेल से चलती है। असली चुनौती अब यह है कि जब अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स और मलबे की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो क्या यह व्यवस्था भविष्य के ट्रैफिक को भी सुरक्षित ढंग से संभाल पाएगी?