The Diesel Story: अमेरिका के पास क्रूड भरपूर, फिर भी रूस से डीजल मांगना मजबूरी क्यों है?

दुनिया का बड़ा तेल उत्पादक अमेरिका डीजल के लिए रूस की तरफ क्यों देख रहा है? वजह इतनी आसान नहीं है जिसे वह झट से पूरा कर सके। अब ट्रंप का यह कदम रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति में एक अहम सवाल भी खड़े करता है।

एक तरफ अमेरिका दुनिया को चेतावनी दे रहा है कि रूस से तेल खरीदोगे तो भारी टैरिफ चुकाना पड़ेगा। दूसरी तरफ, जब अपने यहां डीजल की कीमतें बढ़ती हैं और दुनियाभर में सप्लाई पर दबाव पड़ता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उसी रूस से डीजल मंगाने का रास्ता खोल देते हैं। अभी यही हुआ है, पर क्यों?

जिस रूसी तेल से दूरी बनाने के लिए वॉशिंगटन दूसरे देशों पर दबाव डालता रहा, जरूरत पड़ने पर उसी से ईंधन लेने को मजबूर क्यों हुआ? क्या अमेरिका में तेल की कमी हो गई है? या फिर मामला कुछ और है... डीजल की मांग, महंगी होती सप्लाई और अपने हितों के हिसाब से बदलती ऊर्जा नीति अब अमेरिका के लोगों के लिए ही चिंता का विषय बन गई है।

अमेरिका के पास कच्चे तेल की कमी नहीं है। फिर भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से डीजल की सप्लाई के लिए समझौते की घोषणा करनी पड़ी। ट्रंप ने खुद कहा कि US को डीजल की भारी जरूरत है। ऐसे में सवाल यह है कि जब अमेरिका खुद तेल का बड़ा उत्पादक है, तो डीजल के मामले में उसकी मुश्किल कहां है?

क्रूड और डीजल का बारीक अंतर समझिए

अमेरिका में ज्यादातर निजी कारें पेट्रोल यानी गैसोलीन से चलती हैं। लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था सिर्फ कारों के भरोसे नहीं चलती। लंबी दूरी के ट्रक, मालगाड़ियां, कृषि मशीनें और निर्माण उपकरण डीजल पर निर्भर हैं। डीजल महंगा होने का असर माल ढुलाई से लेकर खेती और सामान की कीमतों तक पहुंच सकता है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक, 2025 में अमेरिका के परिवहन क्षेत्र में रोजाना करीब 29.4 लाख बैरल डीजल और अन्य डिस्टिलेट ईंधन की खपत हुई। यह अमेरिका की कुल डिस्टिलेट खपत (Distillate Consumption) का लगभग 75% था।

कच्चा तेल और डीजल अलग-अलग चीजें हैं। रिफाइनरी में कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल और दूसरे ईंधन बनाए जाते हैं। कितना पेट्रोल या डीजल बनेगा, यह तेल की किस्म और रिफाइनरी की क्षमता पर निर्भर करता है। यानी अमेरिका के पास कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है, लेकिन उसके यहां शेल ऑयल से निकलने वाला हल्का कच्चा तेल बड़ी मात्रा में है। इससे पेट्रोल जैसे हल्के ईंधन ज्यादा बन सकते हैं, जबकि भारी कच्चे तेल के मुकाबले डीजल का प्रोडक्शन कम हो सकता है। इसलिए सिर्फ कच्चे तेल का बड़ा उत्पादक होना डीजल की जरूरत पूरी करने की गारंटी नहीं है।

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मिडिल ईस्ट की जंग ने तोड़ी US की कमर!

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति पर दबाव बढ़ा दिया है। तेल की सप्लाई में रुकावट और कीमतों में उछाल का असर अमेरिका पर भी पड़ा है। डीजल महंगा होने से ट्रक, माल ढुलाई और खेती जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ती है, जिसका असर आम लोगों तक पहुंच रहा है। EIA के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में अमेरिकी डीजल की कीमत 21 सितंबर वाले हफ्ते में 6.529 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। 

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक, 2025 में अमेरिका के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 8% मिडिल ईस्ट की खाड़ी के देशों से आया था। वहीं, अमेरिका के तेल आयात में कनाडा की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका में निकलने वाला ज्यादातर कच्चा तेल हल्का है, जबकि उसकी कई रिफाइनरियां भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के हिसाब से बनाई गई हैं। इसलिए अमेरिका कनाडा जैसे देशों से भारी तेल आयात करता है, ताकि रिफाइनरियां अपनी जरूरत के मुताबिक काम कर सकें।

रूस का वो फैसला

गौर करने वाली बात है कि रूस ने 8 जुलाई 2026 को डीजल निर्यात पर रोक लगाने की घोषणा की थी। इसके बाद प्रतिबंध बढ़ाकर 31 अगस्त और फिर 30 सितंबर तक किया गया। यानी अक्टूबर में रूस से डीजल की अतिरिक्त सप्लाई की घोषणा ऐसे समय हुई, जब उसका निर्यात पहले से प्रतिबंधों और घरेलू बाजार की जरूरतों के दबाव में था।

टैरिफ लगाने के चक्कर में बुरे फंसे ट्रंप!

अमेरिकी नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं सामने आता है। 18 सितंबर 2026 को कानून बने प्रावधान के तहत ट्रंप प्रशासन को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ देशों पर 100% तक आयात शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया। कानून का दायरा उन देशों पर केंद्रित है जो रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं या प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं। लेकिन 9 अक्टूबर को ट्रंप ने पुतिन से बातचीत के बाद रूसी डीजल की आपूर्ति बढ़ाने की घोषणा की। उसी दिन अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) ने जनरल लाइसेंस 135 जारी किया, जो रूस में बने डीजल की बिक्री, डिलीवरी, अनलोडिंग और आयात से जुड़े निर्दिष्ट लेनदेन की अनुमति देता है।

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यहां एक सवाल उठता है कि दूसरे देशों की रूसी ऊर्जा खरीद पर दबाव डालने वाला अमेरिका अपनी जरूरत के लिए उसी रूस से ईंधन लेने की छूट क्यों दे रहा है?

अपने ही चक्रव्यूह में फंसा अमेरिका

ट्रंप प्रशासन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर टैरिफ का दबाव बनाता रहा है। लेकिन डीजल की कीमतें बढ़ने पर उसी रूस से सप्लाई लेने का रास्ता खोल दिया। ऐसे में सवाल यह है कि अगर अमेरिका अपनी जरूरत के हिसाब से रूसी ईंधन के लिए छूट दे सकता है, तो दूसरे देशों की ऊर्जा सुरक्षा को अलग नजरिए से क्यों देखा जाए? दूसरों पर दबाव और अपनी जरूरत पर छूट, अमेरिकी ऊर्जा नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है।