जब ‘तुलसी’ को देखने के लिए अफगानिस्तान में थम जाती थी जंग, स्मृति ईरानी ने सुनाया दिलचस्प किस्सा

जब ‘तुलसी’ को देखने के लिए अफगानिस्तान में थम जाती थी जंग, स्मृति ईरानी ने सुनाया दिलचस्प किस्सा

स्मृति ईरानी ने बताया कि अफगानिस्तान में ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ इतना लोकप्रिय था कि शो के आधे घंटे के दौरान कुछ देर के लिए जंग तक रुक जाती थी। इसका जिक्र वहां से आए कई खतों में किया गया था।
सत्यम बघेलसत्यम बघेल Published

टीवी स्क्रीन पर जब ‘तुलसी विरानी’ हाथ जोड़कर घर के आंगन में कदम रखती थी, तो भारत के करोड़ों घरों में टीवी का वॉल्यूम तेज हो जाता था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एकता कपूर के आइकॉनिक शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ का जादू सिर्फ भारत या दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं था? इस शो ने सात समुंदर पार, युद्ध की आग में जल रहे अफगानिस्तान से लेकर सऊदी अरब के बंद समाज तक में एक ऐसा इतिहास रचा था, जिसकी कल्पना शायद खुद स्मृति ईरानी ने भी नहीं की थी।

हाल ही में RT इंडिया को दिए इंटरव्यू में पूर्व केंद्रीय मंत्री और अभिनेत्री स्मृति ईरानी ने अपने इस शो और ग्लोबल स्टारडम से जुड़े कई ऐसे अनसुने किस्से शेयर किए हैं, जो हैरान कर देने वाले हैं।

जब अफगानिस्तान में ‘तुलसी’ के लिए आधे घंटे थम जाती थी जंग

स्मृति ईरानी ने इंटरव्यू में अपने लोकप्रिय टीवी शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब यह शो डब होकर अफगानिस्तान में टेलीकास्ट होता था, तो वहां से उन्हें कई खत मिला करते थे। उन चिट्ठियों में लोगों ने लिखा था, ‘जब टीवी पर ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ का वो आधा घंटे का स्लॉट आता था, तो देश में कुछ देर के लिए जंग तक रुक जाती थी।’ स्मृति ने इसे वहां के दर्शकों के प्यार और शो की लोकप्रियता का प्रतीक बताया।

उन्होंने एक और रोचक बात बताई। उनके मुताबिक, अफगानिस्तान में ‘तुलसी’ के किरदार को आवाज देने वाली डबिंग आर्टिस्ट इतनी लोकप्रिय हो गई थीं कि बाद में उन्होंने वहां चुनाव तक लड़ा। 

RT इंडिया पर स्मृति ईरानी
RT इंडिया पर स्मृति ईरानी

सऊदी अरब से फिजी तक... ‘तुलसी’ से जुड़ाव बना रहा

स्मृति ईरानी ने बताया कि उन्हें पहले लगता था कि भारतीय पारिवारिक कहानियां शायद दूसरे देशों के दर्शकों से उतनी आसानी से नहीं जुड़ पाएंगी। लेकिन उनका अनुभव इससे बिल्कुल अलग रहा। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब जैसे रूढ़िवादी समाज में भी इस शो को बड़ी संख्या में लोग देखते थे। सिर्फ महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी इसे पसंद करते थे। इसके अलावा पूर्वी अफ्रीका के स्वाहिली भाषी क्षेत्रों और फिजी समेत कई देशों में इस शो को स्थानीय भाषाओं में डब करके प्रसारित किया गया और वहां भी इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिली। बताते चलें कि स्वाहिली भाषा पूर्वी अफ्रीका की प्रमुख संपर्क भाषा (Lingua Franca) है। यह मुख्य रूप से केन्या, तंजानिया, युगांडा, रवांडा, बुरुंडी और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य सहित कई देशों में व्यापक रूप से बोली जाती है।  

स्मृति के मुताबिक, इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि परिवार, रिश्ते और भावनाएं ऐसी चीजें हैं, जिनसे दुनिया के अलग-अलग समाजों के लोग खुद को जोड़ लेते हैं। इसलिए ‘तुलसी’ का किरदार और उसकी कहानी सीमाओं और भाषाओं से आगे जाकर भी दर्शकों तक पहुंच सकी।

‘तुलसी’ या राजनीति?  

इंटरव्यू के रैपिड-फायर राउंड में स्मृति ईरानी से पूछा गया कि उनके दिल के ज्यादा करीब क्या है, उनका चर्चित टीवी किरदार ‘तुलसी विरानी’ या फिर राजनेता के रूप में उनकी पहचान। इस पर उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया, ‘पॉलिटिशियन... एनी डे।’ स्मृति ने कहा कि अपने देश और लोगों की सेवा करने का अवसर मिलना उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है, इसलिए अगर दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो वह राजनीति को ही चुनेंगी।

मीडिया में महिलाओं की इमेज पर स्मृति ईरानी की बेबाक राय

RT इंडिया को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में स्मृति ईरानी ने ग्लैमर, सार्वजनिक छवि और राजनीति में महिलाओं की भूमिका पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में रहने के बाद उन्होंने यह सीखा है कि लोगों के सामने बनावटी छवि पेश करने से ज्यादा मायने आपकी असल पहचान रखती है।

टीवी पर काफी मशहूर रहा था स्मृति ईरानी का शो

‘लोग आपकी असलियत पहचान लेते हैं...’

इंटरव्यू के दौरान जब RT इंडिया की न्यूज हेड ने उनके सादे लुक और चश्मा पहनकर इंटरव्यू देने का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या यह उनकी कोई सोची-समझी रणनीति है, तो स्मृति मुस्कुराईं और बोलीं, ‘तथाकथित स्टार्स शायद इस तरह चश्मा पहनकर स्टूडियो न आएं, लेकिन मैं पिछले 30 साल से सार्वजनिक जीवन में हूं। मैं अपनी असलियत और पब्लिक परसेप्शन के बीच झूलती नहीं रहती। मुझे लगता है कि जनता इतनी समझदार है कि वह बनावट और सच्चाई का फर्क तुरंत समझ जाती है।’

उन्होंने कहा कि खासकर मीडिया और मनोरंजन जगत से जुड़ी महिलाओं पर हमेशा एक खास तरीके से दिखने और खुद को ‘परफेक्ट’ बनाए रखने का दबाव रहता है। हालांकि, उन्होंने हमेशा कोशिश की कि वह जैसी हैं, वैसी ही लोगों के सामने रहें।

राजनीति में महिलाओं की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

राजनीति में महिलाओं के संघर्ष पर बात करते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि वह इस धारणा से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि सबसे मुश्किल काम राजनीति में प्रवेश करना है। स्मृति ईरानी के मुताबिक, ‘असल चुनौती तब शुरू होती है, जब आपके हाथ में अधिकार और निर्णय लेने की ताकत आती है। उन्होंने कहा कि राजनीति में सिर्फ महिला होने की वजह से हर बार रास्ते नहीं रुकते, लेकिन जब आप सत्ता या जिम्मेदारी की स्थिति में होती हैं, तब आपके फैसलों और नेतृत्व को अलग नजर से परखा जाता है।’

वंशवाद और पैसे का असर, लेकिन रास्ता बंद नहीं

स्मृति ईरानी ने यह भी माना कि जिन लोगों का संबंध बड़े राजनीतिक परिवारों से होता है या जिनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन होते हैं, उनके लिए राजनीति का सफर अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि बिना राजनीतिक विरासत और बिना बड़े आर्थिक संसाधनों के राजनीति में आगे बढ़ना मुश्किल जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। उनके मुताबिक, जमीनी स्तर से भी अपनी जगह बनाई जा सकती है, अगर लगातार काम करने और लोगों का भरोसा जीतने का धैर्य हो।

‘पीएम मोदी अयोग्यता बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते’

स्मृति ईरानी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे अधिक आपत्ति अयोग्यता (Incompetence) और चापलूसी (Sycophancy) से होती है। उनके मुताबिक, पीएम मोदी किसी भी विषय पर काम करने वाले व्यक्ति से पूरी तैयारी और गहरी समझ की अपेक्षा रखते हैं।

यह भी पढ़ें- बंद कमरों से मंच तक, कैसे लिखे जाते हैं प्रधानमंत्री के भाषण? इनसाइड स्टोरी

उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रोजेक्ट पर प्रधानमंत्री से चर्चा करनी है, तो उससे जुड़े हर पहलू की जानकारी होनी चाहिए। उनके अनुसार, पीएम मोदी की याददाश्त इतनी तेज है कि यदि किसी विषय पर वर्षों पहले चर्चा हुई हो, तो भी उन्हें उसका विवरण याद रहता है। ऐसे में उनके सामने अधूरी जानकारी के साथ जाना संभव नहीं है।

‘चापलूसी पसंद नहीं, बातचीत वहीं खत्म कर देते हैं’

स्मृति ईरानी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी को चापलूसी बिल्कुल पसंद नहीं है। उन्होंने दावा किया कि यदि उन्हें यह महसूस हो जाए कि कोई व्यक्ति उनकी खुशामद करने की कोशिश कर रहा है, तो वे बातचीत को तुरंत समाप्त कर देते हैं।

‘भारत-रूस की दोस्ती को किसी सफाई की जरूरत नहीं’

कार्यक्रम में जब पश्चिमी देशों की ओर से भारत-रूस संबंधों पर उठने वाले सवालों का जिक्र हुआ, तो स्मृति ईरानी ने कहा कि सच्ची दोस्ती को किसी स्पष्टीकरण की जरूरत नहीं होती।

उन्होंने कहा कि दोस्ती किसी तीसरे पक्ष की पसंद-नापसंद देखकर नहीं निभाई जाती। अगर ऐसा किया जाए तो वह दोस्ती नहीं, बल्कि सुविधा का रिश्ता बन जाता है।

उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के राष्ट्रीय हितों और रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखा है। इसलिए भारत को अपने इस रुख पर किसी के सामने सफाई देने की जरूरत नहीं है।