
बंद कमरों से मंच तक, कैसे लिखे जाते हैं प्रधानमंत्री के भाषण? इनसाइड स्टोरी
लाल किले की प्राचीर पर खड़े प्रधानमंत्री जब देश को संबोधित करते हैं, संसद में विपक्ष को जवाब देते हैं या फिर अमेरिकी कांग्रेस जैसे वैश्विक मंच पर भारत का पक्ष रखते हैं, तो जनता सिर्फ एक चेहरा देखती है लेकिन उस चेहरे के पीछे कई मंत्रालय, दर्जनों अधिकारी, कूटनीतिज्ञ, नीति विशेषज्ञ और कई रातों की मेहनत छिपी होती है।
प्रधानमंत्री का भाषण सिर्फ भाषण नहीं होता। वह सरकार की सोच, देश की नीति और कई बार आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला दस्तावेज होता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार और स्पीच राइटर रहे संजय बारू ने RT INDIA के स्पेशल शो में पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के साथ बातचीत में उस दुनिया के दरवाजे खोले, जहां प्रधानमंत्री के शब्दों को गढ़ा जाता है। उनकी बातें बताती हैं कि PMO के अंदर भाषण लिखना साहित्य से ज्यादा रणनीति, राजनीति और कूटनीति का खेल है। और कभी-कभी एक शब्द पर ऐसी बहस छिड़ जाती है कि देश के बड़े-बड़े दिमाग आमने-सामने आ जाते हैं।

प्रधानमंत्री के भाषण के तीन रास्ते
संजय बारू के मुताबिक प्रधानमंत्री के भाषण मुख्य रूप से तीन तरीके से तैयार होते हैं
1. मंत्रालय लिखता है और…
प्रधानमंत्री को हर हफ्ते औसतन दो-तीन सार्वजनिक कार्यक्रमों में बोलना होता है। किसी प्लांट का उद्घाटन हो, नई रेलवे लाइन की शुरुआत हो, सड़क परियोजना का लोकार्पण या किसी सरकारी योजना का शुभारंभ हो। ऐसे कार्यक्रमों के भाषण सबसे पहले संबंधित मंत्रालय तैयार करता है। मंत्रालय का ड्राफ्ट आंकड़ों और तकनीकी जानकारियों से भरा होता है। उसमें परियोजना की लागत, लाभ, रोजगार और सरकारी उपलब्धियों का ब्योरा होता है लेकिन वह ड्राफ्ट सीधे प्रधानमंत्री तक नहीं पहुंचता।
पहले वह PMO के संबंधित संयुक्त सचिव के पास जाता है। वहां से प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार या स्पीच राइटर तक पहुंचता है। संजय बारू के अनुसार, उनका सबसे बड़ा काम नई बातें जोड़ना नहीं, बल्कि सरकारी भाषा को इंसानी भाषा में बदलना होता था। नौकरशाही की फाइलों वाली अंग्रेजी को प्रधानमंत्री के स्तर के संबोधन में बदलना पड़ता था। आंकड़े वही रहते थे, लेकिन उनका प्रस्तुतीकरण बदल जाता था। यहीं से एक सरकारी नोट प्रधानमंत्री का भाषण बनता था।
2. जब पीएम खुद बोलते हैं, लेखक सुनता है
लेकिन राजनीति सिर्फ उद्घाटन और शिलान्यास तक सीमित नहीं होती। कभी संसद में संकट होता है, कभी कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेना होता है और कभी कोई ऐसा मुद्दा सामने आ जाता है जो सीधे देश की दिशा तय करता है। ऐसे मामलों में मंत्रालयों के ड्राफ्ट काम नहीं आते। संजय बारू बताते हैं कि तब प्रधानमंत्री खुद स्पीच राइटर को अपने कमरे में बुलाते थे।
न कोई फाइल। न कोई तैयार दस्तावेज। सिर्फ प्रधानमंत्री के दिमाग में चल रही सोच।
डॉ. मनमोहन सिंह विस्तार से बताते थे कि वह क्या कहना चाहते हैं, किस मुद्दे पर सरकार का रुख क्या है और राजनीतिक संदेश क्या होना चाहिए। स्पीच राइटर नोट्स लेता था। फिर शुरू होती थी रातभर की मशक्कत। उन नोट्स को भाषण का रूप दिया जाता। तर्कों को व्यवस्थित किया जाता। शब्द चुने जाते। वाक्यों को तराशा जाता।

सुबह होने से पहले ड्राफ्ट प्रधानमंत्री के पास पहुंचता और फिर शुरू होती थी उनकी अपनी एडिटिंग। एक-एक लाइन पढ़ी जाती। एक-एक शब्द पर नजर डाली जाती। कई बार पूरा पैराग्राफ बदल दिया जाता। जब तक प्रधानमंत्री संतुष्ट नहीं होते, भाषण अंतिम रूप नहीं लेता।
3. जब पूरा देश मिलकर एक भाषण लिखता है
सबसे दिलचस्प प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब प्रधानमंत्री किसी वैश्विक मंच को संबोधित करने वाले होते हैं। ऐसे भाषण सिर्फ प्रधानमंत्री के नहीं होते, वो भारत के आधिकारिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए उन्हें तैयार करने में महीनों भी लग सकते हैं। संजय बारू बताते हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह का अमेरिकी कांग्रेस वाला संबोधन तैयार करने में लगभग दो महीने लगे थे और इस काम में सिर्फ स्पीच राइटर नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति और रणनीतिक व्यवस्था के सबसे बड़े माइंड शामिल थे।
उस समय अमेरिका संबंधी मामलों को देखने वाले संयुक्त सचिव एस. जयशंकर, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जे एन दीक्षित जैसे अधिकारी लगातार इस प्रक्रिया में शामिल थे। ड्राफ्ट दिल्ली से वॉशिंगटन जाता। वॉशिंगटन से टिप्पणियां आतीं फिर संशोधन होते। फिर नई टिप्पणियां आतीं। यह सिलसिला हफ्तों तक चलता रहता।
PMO में पहला दिन और सीधे ‘अग्निपरीक्षा’
संजय बारू के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में स्पीच राइटर की नौकरी किसी सामान्य सरकारी पद की तरह शुरू नहीं हुई थी। वह खुद इसे ‘ट्रायल बाय फायर’ यानी अग्निपरीक्षा बताते हैं। 2 जून 2004 को उन्होंने PMO में जॉइन किया। यह उनका पहला दिन था। नए दफ्तर, नए लोग और नई जिम्मेदारियां। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों में उनके सामने ऐसा काम आने वाला है, जो देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक भाषणों में गिना जाता है। जॉइन करने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें अपने कक्ष में बुलाया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद का नया सत्र शुरू होने वाला है और उन्हें ‘राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव’ के जवाब में प्रधानमंत्री का भाषण तैयार करना है। बारू के लिए यह चौंकाने वाला पल था। वह पत्रकारिता और नीति विश्लेषण की दुनिया से आए थे, लेकिन उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उन्हें संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिया जाने वाला इतना महत्वपूर्ण भाषण लिखना पड़ेगा। उनकी घबराहट को समझते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें सलाह दी कि वह PMO के सभी जॉइंट सेक्रेटरी से मिलें, उनकी राय लें और सरकार की प्राथमिकताओं को समझें।
पहली परीक्षा यहीं खत्म नहीं हुई। संसद के भाषण के तुरंत बाद उनके सामने एक और बड़ी चुनौती थी। 15 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस संबोधन। PMO में उनके शुरुआती दो बड़े असाइनमेंट थे, संसद में प्रधानमंत्री का जवाब और लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधन। किसी भी भाषण लेखक के लिए इससे बड़ी शुरुआत शायद ही हो सकती थी।
मनमोहन सिंह की सबसे अनोखी आदत
संजय बारू बताते हैं कि मनमोहन सिंह बाकी नेताओं से काफी अलग थे। भारतीय राजनीति में कई नेता बिना तैयारी के लंबे भाषण देने के लिए मशहूर रहे हैं लेकिन मनमोहन सिंह का स्वभाव अकादमिक था। वह शब्दों को बेहद गंभीरता से लेते थे. लगभग हर चीज लिखित रूप में देखना चाहते थे. यहां तक कि संसद में अचानक जवाब देने की स्थिति आ जाए, तब भी वह लिखित टेक्स्ट के साथ ज्यादा सहज महसूस करते थे। उनके लिए भाषण कोई मंचीय प्रदर्शन नहीं था. वह एक आधिकारिक दस्तावेज था, जो भविष्य में इतिहास का हिस्सा बन सकता था इसलिए वह हर शब्द को तौलते थे। हर वाक्य को जांचते थे और हर संदेश को समझते थे।
पांच साल, एक हजार से ज्यादा भाषण
संजय बारू के मुताबिक, उन्होंने अपने पांच साल के कार्यकाल में डॉ. मनमोहन सिंह के लिए एक हजार से अधिक भाषण लिखे। लेकिन इनमें से कोई भी भाषण सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं था। किसी के पीछे मंत्रालय था। किसी के पीछे संसद थी। किसी के पीछे राजनीति थी और किसी के पीछे पूरी भारतीय कूटनीति।
संजय बारू कहते हैं कि इसलिए अगली बार जब आप प्रधानमंत्री को बोलते हुए सुनें, तो सिर्फ मंच पर खड़े व्यक्ति को मत देखिए। उस भाषण के पीछे PMO के बंद कमरे हैं। संयुक्त सचिवों की टिप्पणियां हैं। रातभर जागते स्पीच राइटर हैं। विदेश नीति के विशेषज्ञ और उन सबके बीच चलने वाली गहन बहसें होती हैं।
प्रधानमंत्री की आवाज एक होती है, लेकिन उस आवाज के पीछे पूरा शासन तंत्र बोल रहा होता है। यही है प्रधानमंत्री के भाषणों की असली इनसाइड स्टोरी। PMO की वह गुप्त डायरी, जो जनता को कभी दिखाई नहीं देती।