जब कोई नहीं था तो वो था, भारत-रूस की यारी को जयशंकर ने यूं ही नहीं किया याद

जब कोई नहीं था तो वो था, भारत-रूस की यारी को जयशंकर ने यूं ही नहीं किया याद

1947 से 2026 तक भारत-रूस की दोस्ती उतार-चढ़ाव के कई दौर गुजरी है। 1971 की जंग से लेकर कारगिल, S-400 और रूसी तेल तक, संकट के समय दोनों देशों का साथ कई बार दिखा है। यह कहानी इसी भरोसे और सात दशक पुराने रिश्ते की है।
सत्यम बघेलसत्यम बघेल Published

दुनिया में दोस्त बहुत होते हैं, लेकिन हर दोस्त मुसीबत में काम आए, ये जरूरी नहीं। भारत-रूस दोस्ती की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि इसके सबसे यादगार अध्याय अक्सर तब लिखे गए, जब एक साथी संकट में था। कभी संयुक्त राष्ट्र में वीटो की जरूरत पड़ी, कभी हथियारों की, कभी स्टील बनाने की मशीनों की, कभी अंतरिक्ष तक पहुंचने की और अब सस्ते तेल की। सात दशक में जरूरतें बदलती गईं, लेकिन सच्चा पार्टनर नहीं बदला। 

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसी पुराने रिश्ते की याद दिलाते हुए कहा है कि जब भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा था, रूस उसके साथ खड़ा था। तो चलिए 2026 से पीछे 1947 तक और पलटते हैं इस दोस्ती की फाइल और देखते हैं संकट की घड़ी में मॉस्को ने भारत के लिए क्या-क्या किया।

Jaishankar
जब हमारी सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता खतरे में थी, तब रूस और उससे पहले सोवियत संघ कई तरह से हमारे साथ खड़ा रहा।
एस जयशंकर
एस जयशंकर
भारतीय विदेश मंत्री

रविवार को दिल्ली में आयोजित म्यूनिख समिट में जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के रिश्ते खासकर 1950 के दशक से मजबूत रहे हैं और 'वह इतिहास भुलाया नहीं गया है।' उन्होंने याद किया कि ऐसे वक्त में जब दुनिया के एक बड़े हिस्से ने भारत के पड़ोस में मौजूद सैन्य शासन (पाकिस्तान) का साथ देना पसंद किया, तब रूस भारत के साथ था। जयशंकर ने यह भी कहा कि आज यह रिश्ता सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, इसमें अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, सैन्य, परमाणु और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत रूस को दोस्त क्यों कहता है। सवाल यह है कि इस दोस्ती का रिकॉर्ड क्या कहता है? और उस रिकॉर्ड को 1947 से 2026 तक देखें तो कहानी काफी दिलचस्प है।

1947: भारत की आजादी से पहले रिश्ता शुरू हो गया

भारत और सोवियत संघ ने 13 अप्रैल 1947 को राजनयिक संबंध स्थापित किए। यानी भारत की औपचारिक आजादी से करीब चार महीने पहले। भारत के आजाद होने के बाद यह रिश्ता धीरे-धीरे राजनयिक संपर्क से कहीं आगे बढ़ता गया। 1955 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ की यात्रा की और उसी साल सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव और निकोलाई बुल्गानिन भारत आए। यहीं से रिश्ते का आर्थिक और औद्योगिक अध्याय भी तेजी से खुला।

1955 में मॉस्को के दौरे पर तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू।© The Nehru Archive

भारत की औद्योगिक नींव में भी हिस्सेदारी

1950 के दशक का भारत एक नया आजाद हुआ देश था। उसे भारी उद्योग खड़ा करना था, लेकिन पूंजी, तकनीक और औद्योगिक क्षमता सीमित थी। इसी दौर में सोवियत मदद से भिलाई स्टील प्लांट खड़ा हुआ। भारत सरकार के पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक, 2 फरवरी 1955 को भारत और सोवियत संघ के बीच एकीकृत लौह-इस्पात संयंत्र स्थापित करने का समझौता हुआ। शुरुआती योजना करीब 10 लाख टन स्टील इंगट क्षमता वाले संयंत्र की थी। सोवियत संस्थाओं को डिजाइन और उपकरण निर्माण में भूमिका मिली और सोवियत विशेषज्ञों ने भारतीय इंजीनियरों के साथ काम किया। यानी यह सिर्फ रूस से स्टील खरीदने की कहानी नहीं थी। भारत में स्टील बनाने की क्षमता खड़ी करने में सोवियत तकनीकी सहयोग शामिल था।

भिलाई इस रिश्ते का एक बड़ा प्रतीक बना, क्योंकि यहां सहयोग का मतलब सिर्फ तैयार माल खरीदना नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण था।

फिर आया 1962: मिग-21 ने बदला गेम

1962 का चीन-भारत युद्ध भारत के लिए बड़ा सैन्य झटका था। इसके बाद भारत को अपनी वायुसेना और सैन्य क्षमता तेजी से मजबूत करनी थी। इसी दौर में सोवियत संघ के साथ मिग-21 सौदा हुआ। भारतीय संसद के दस्तावेज के मुताबिक, भारत में मिग-21 के निर्माण की परियोजना का समझौता 29 अगस्त 1962 को हुआ। इसके तहत नासिक में विमान ढांचे, कोरापुट में इंजन और हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी उत्पादन क्षमता विकसित करने की योजना बनी।

© Indian Air Force

पहले मिग-21 भारत को मिले और बाद में लाइसेंस के तहत भारत में उनका निर्माण हुआ। यह भारत के लिए सिर्फ एक लड़ाकू विमान खरीदना नहीं था। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को तकनीक और उत्पादन क्षमता हासिल करने का रास्ता मिला। फिर कुछ ही समय बाद मिग-21 भारत-सोवियत रक्षा साझेदारी की रीढ़ बन गया।

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संयुक्त राष्ट्र में दोस्ती की सबसे बड़ी परीक्षा

भारत-रूस संबंधों की सबसे ज्यादा चर्चा शायद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सोवियत वीटो को लेकर होती है। यह किस्सा उन दिनों का है जब आज का रूस नहीं, तब सोवियत संघ UNSC में वीटो करता था। 1957 में कश्मीर पर सुरक्षा परिषद की एक प्रस्तावित कार्रवाई में सोवियत संघ ने मतदान से परहेज किया था। लेकिन बाद के वर्षों में भारत से जुड़े मामलों में उसका रुख ज्यादा स्पष्ट हुआ। 1961 में गोवा के सवाल पर सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में वीटो का इस्तेमाल किया। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में 18 दिसंबर 1961 के गोवा संबंधी प्रस्ताव पर USSR को वीटो देने वाले देश के रूप में दर्ज किया गया है।

1971: जब इंदिरा के सामने निक्सन थे, साथ में मॉस्को

1971 में पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई के बाद करीब एक करोड़ शरणार्थी भारत आ गए। युद्ध का खतरा बढ़ रहा था। अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पाकिस्तान के साथ थे और दिसंबर में अमेरिकी सातवें बेड़े का USS Enterprise बंगाल की खाड़ी की तरफ बढ़ा। लेकिन भारत अकेला नहीं था। 9 अगस्त 1971 को इंदिरा गांधी सरकार ने सोवियत संघ के साथ शांति, मित्रता और सहयोग की संधि की थी। फिर दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत-पाकिस्तान युद्ध को लेकर आए प्रस्तावों पर सोवियत संघ ने 5, 7 और 13 दिसंबर को वीटो किया।

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यानी एक तरफ अमेरिकी दबाव था, दूसरी तरफ मॉस्को का कूटनीतिक सहारा। 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ युद्ध खत्म हुआ। यही वह 1971 है, जिसे आज जयशंकर के उस बयान के सबसे मजबूत ऐतिहासिक उदाहरणों में गिना जा सकता है, 'जब हमारी क्षेत्रीय अखंडता खतरे में थी, रूस हमारे साथ खड़ा था।'

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1984: दोस्ती जमीन से अंतरिक्ष तक पहुंची

अगर 1950 और 1970 का दौर उद्योग और सुरक्षा का था, तो 1980 के दशक में यह रिश्ता अंतरिक्ष तक पहुंच गया। 3 अप्रैल 1984 को भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर राकेश शर्मा सोवियत Soyuz T-11 से अंतरिक्ष गए। ISRO के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक शर्मा सोवियत Interkosmos कार्यक्रम का हिस्सा थे और उन्होंने सोवियत अंतरिक्ष स्टेशन Salyut 7 पर 7 दिन 21 घंटे से ज्यादा समय बिताया। तब भारत का पहला नागरिक अंतरिक्ष में पहुंचा और उसके पीछे भारत-सोवियत अंतरिक्ष सहयोग था।

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1991 के बाद दोस्ती खत्म नहीं हुई, बदली

1991 में सोवियत संघ टूट गया। जिस देश के साथ भारत ने दशकों का रिश्ता बनाया था, वह राजनीतिक रूप से मौजूद नहीं रहा। लेकिन रिश्ता भी नहीं टूटा। रूस नया देश था, भारत के लिए पुराना साझेदार नहीं बल्कि बदलती दुनिया में वही पुराना रणनीतिक संपर्क था। अक्टूबर 2000 में भारत और रूस ने स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप की घोषणा की। 2010 में इसे और ऊपर ले जाकर 'Special and Privileged Strategic Partnership' बनाया गया। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार यह साझेदारी राजनीति, सुरक्षा, रक्षा, व्यापार, अर्थव्यवस्था, विज्ञान-तकनीक, संस्कृति समेत कई क्षेत्रों में फैली हुई है। यानी सोवियत दौर की दोस्ती को रूस ने नए दौर की रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया।

पोखरण-II: भारत पर प्रतिबंध लगे, रूस आगे आया

मई 1998 में भारत ने पोखरण-II परमाणु परीक्षण किए। इसके बाद अमेरिका समेत कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए। रूस ने भारत के परमाणु परीक्षणों का समर्थन नहीं किया था लेकिन उसने अमेरिका की तरह भारत पर व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाए। रणनीतिक मामलों पर शोध में यह दर्ज है कि रूस ने पोखरण-II की आलोचना करने से परहेज किया और भारत पर अमेरिकी शैली के प्रतिबंध नहीं लगाए। इसके बाद रूस ने भारत में दो रूसी परमाणु रिएक्टरों के निर्माण की दिशा में भी कदम बढ़ाया। यानी दोस्ती का मतलब यह नहीं था कि मॉस्को भारत के हर फैसले से सहमत था। लेकिन असहमति के बावजूद रिश्ता तोड़ने की नीति नहीं अपनाई गई। यह फर्क अहम है।

फाइल फोटो

कारगिल: रूस ने भारत का साथ नहीं छोड़ा

1999 में कारगिल की चोटियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी तो भारत को सिर्फ मोर्चे पर नहीं, कूटनीतिक स्तर पर भी समर्थन की जरूरत थी। इस दौर में रूस ने पाकिस्तान की घुसपैठ और संघर्ष को बढ़ाने के बजाय तनाव कम करने और समस्या के राजनीतिक समाधान पर जोर दिया। लेकिन रूस का साथ सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं था। उस समय भारतीय सेना और वायुसेना के बड़े हिस्से में सोवियत मूल के हथियार और प्लेटफॉर्म शामिल थे। ऐसे में युद्ध के बीच स्पेयर पार्ट्स और सैन्य उपकरणों की उपलब्धता बेहद अहम थी। समकालीन रिकॉर्ड और विश्लेषणों के मुताबिक, रूस ने कारगिल के दौरान भारत को जरूरी स्पेयर और उपकरण उपलब्ध कराने में मदद की। यानी जिस वक्त भारत पहाड़ों पर लड़ रहा था, मॉस्को ने कूटनीति की मेज पर भी साथ दिया और सैन्य जरूरतों के मोर्चे पर भी।

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फिर दोस्ती हथियारों से साझा तकनीक तक पहुंची। रूस भारत का सिर्फ हथियार बेचने वाला देश नहीं रहा। रिश्ता धीरे-धीरे सह-विकास और लाइसेंस उत्पादन की तरफ गया।

टी-90

2001 में भारत ने रूस के साथ T-90 टैंकों का बड़ा समझौता किया। भारत सरकार के अनुसार रूस के साथ लाइसेंस उत्पादन का समझौता हुआ और भारत में T-90 का निर्माण शुरू हुआ।

सुखोई-30MKI

सुखोई लड़ाकू विमान भी इसी मॉडल का उदाहरण है। भारत सरकार के अनुसार रूस के साथ Su-30 विमान के लिए लाइसेंस उत्पादन व्यवस्था लागू हुई।

S-400

2018 में भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के लिए समझौता किया। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह कॉन्ट्रैक्ट 5 अक्टूबर 2018 को हुआ था।

यानी दशकों में मॉडल बदलता गया:

पहले भारत रूस से हथियार खरीदता था। फिर रूस ने भारत को इन्हें देश में बनाने की तकनीक दी। अब दोनों देश मिलकर कई हथियार और सैन्य तकनीक विकसित और बना रहे हैं।

यानी रिश्ता सिर्फ खरीद-बिक्री से आगे बढ़कर साझे उत्पादन तक पहुंच गया। मई 2026 में RT India को दिए इंटरव्यू में लावरोव ने कहा कि संबंध अब सिर्फ हथियार बेचने-खरीदने तक सीमित नहीं हैं और भारत में संयुक्त उत्पादन बढ़ रहा है। उन्होंने ब्रह्मोस और T-90 जैसे कार्यक्रमों का उदाहरण दिया।

2022 के बाद: जब पश्चिमी प्रतिबंध आए, भारत ने रूसी तेल खरीदा

भारत-रूस दोस्ती का सबसे नया और सबसे व्यावहारिक अध्याय ऊर्जा है। यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर बड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। कई पश्चिमी कंपनियों ने रूसी तेल खरीदना कम या बंद किया। भारत ने ऐसा नहीं किया। भारत ने रूसी कच्चा तेल खरीदना तेजी से बढ़ाया।

Reuters के मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में रूस भारत का लगातार दूसरे साल सबसे बड़ा तेल सप्लायर रहा। रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी भारत के कुल तेल आयात में करीब 35% तक पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 22% थी।

2022 में भी रूस से आने वाला तेल छूट पर मिल रहा था और भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी Urals crude खरीदा। Reuters के मुताबिक मई 2022 तक भारत को 24 फरवरी के बाद रूस से 3.4 करोड़ बैरल से ज्यादा डिस्काउंटेड क्रूड मिल चुका था। यानी पुराने भरोसे ने नए दौर में ऊर्जा साझेदारी का रूप ले लिया।

2026: दोस्ती अब सिर्फ इतिहास नहीं, कारोबार भी है

मई 2026 में भारत आए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने RT India को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत-रूस संबंध सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच भरोसे की नींव आजादी के शुरुआती वर्षों से बनी और रक्षा, ऊर्जा, परमाणु, अंतरिक्ष, तकनीक और व्यापार तक फैल गई।

मई 2026 में जयशंकर से मुलाकात के दौरान लावरोव ने बताया कि दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है और दोनों नेताओं ने 2030 तक इसे 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। 2025 में भारत और रूस ने 2030 तक आर्थिक सहयोग के रणनीतिक क्षेत्रों के लिए कार्यक्रम भी अपनाया था। इसमें उच्च तकनीक समेत कई क्षेत्र शामिल हैं।

यानी 1947 की दोस्ती 2026 में सिर्फ पुराने फोटो और पुराने भाषणों में नहीं बची है। यह आज भी तेल के टैंकरों, S-400, T-90, परमाणु रिएक्टरों, अंतरिक्ष कार्यक्रमों, व्यापार समझौतों और कूटनीतिक बातचीत में दिखाई देती है।

यही वजह है कि जयशंकर का बयान महत्वपूर्ण है

जयशंकर का बयान असल में आज के रिश्ते की तारीफ से ज्यादा पुरानी याददाश्त की राजनीति को समझाता है। भारत की विदेश नीति में रूस का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि वह हथियार बेचता है या तेल देता है और शायद इस पूरी कहानी का सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि दोस्ती सिर्फ तब नहीं पहचानी जाती जब दोनों देश एक-दूसरे से सहमत हों। असली परीक्षा तब होती है जब दुनिया का दबाव बढ़े और फिर भी बातचीत का दरवाजा बंद न हो।

भारत और रूस के रिश्ते की सात दशक लंबी कहानी में यही चीज बार-बार दिखाई देती है। इसीलिए जयशंकर का यह कहना कि 'वह इतिहास भुलाया नहीं गया है' सिर्फ एक कूटनीतिक वाक्य नहीं है। यह भारत की विदेश नीति की उस पुरानी स्मृति की तरफ इशारा है, जिसमें मुश्किल वक्त में मॉस्को का नाम कई बार सामने आता है। और शायद यही वजह है कि 1947 से 2026 तक दुनिया बदलती रही, सोवियत संघ का विघटन हो गया, शीत युद्ध खत्म हो गया, भारत की विदेश नीति बदली, अमेरिका के साथ रिश्ते बदले... लेकिन नई दिल्ली और मॉस्को के बीच बातचीत का धागा नहीं टूटा।