ओपिनियन: आर्कटिक में खुलते नए रास्तों के बीच बढ़ रही भारत-रूस की साझेदारी

आर्कटिक में बनते नए समुद्री मार्ग भारत और रूस के बीच ऊर्जा, जरूरी खनिजों, जहाज निर्माण और निवेश में सहयोग के नए अवसर खोल रहे हैं। हालांकि, ज्यादा खर्च और मुश्किल मौसम अब भी बड़ी चुनौतियां हैं।

दुनिया के सबसे ठंडे इलाके आर्कटिक में अब सिर्फ बर्फ नहीं पिघल रही, कारोबार के नए रास्ते भी खुल रहे हैं। रूस यहां से एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला नया समुद्री मार्ग तैयार कर रहा है। चीन और दक्षिण कोरिया ने इस रास्ते पर जहाज भेजने शुरू कर दिए हैं। वहीं भारत इस क्षेत्र में ऊर्जा, जरूरी खनिजों, जहाज निर्माण और निवेश के जरिए रूस के साथ अपनी आर्थिक साझेदारी आगे बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है। सवाल है कि क्या आर्कटिक भारत-रूस के आर्थिक रिश्तों का अगला बड़ा केंद्र बन सकता है?

दरअसल रूस की आर्कटिक योजना दो दिशाओं में आगे बढ़ रही है। पहली, नए समुद्री और माल ढुलाई के रास्ते तैयार करना। दूसरी, आर्कटिक और साइबेरिया में मौजूद तेल, गैस एवं खनिजों के विकास के लिए निवेश जुटाना। रूस का नया ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (TATC) इसी योजना का हिस्सा है। इसका सबसे अहम हिस्सा नॉर्दर्न सी रूट (NSR) है, जो रूस के आर्कटिक तट के साथ गुजरता है।

रूस इस कॉरिडोर से सेंट पीटर्सबर्ग, मरमंस्क और व्लादिवोस्तोक जैसे प्रमुख बंदरगाहों को जोड़ना चाहता है। इन बंदरगाहों को सड़क, रेल, समुद्री और अंदरूनी जलमार्गों के जरिए रूस के दूसरे शहरों और कस्बों से भी जोड़ा जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका उद्देश्य एशिया और यूरोप के बाजारों के बीच कम दूरी वाला, सुरक्षित और कम खर्चीला वैकल्पिक समुद्री रास्ता तैयार करना है।

आर्कटिक के रास्ते 25 दिन में चीन से ब्रिटेन

नॉर्दर्न सी रूट पर कंटेनर परिवहन की दिशा में पिछले महीने एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। सी लीजेंड शिपिंग ने 'चाइना-यूरोप आर्कटिक एक्सप्रेस' नाम से नियमित कंटेनर सेवा शुरू की है। इसके तहत अगस्त से अक्टूबर 2026 की शुरुआत तक कुल आठ यात्राएं प्रस्तावित हैं। पहला जहाज 15 अगस्त को चीन के निंगबो-झोउशान बंदरगाह से रवाना हुआ और नॉर्दर्न सी रूट से होते हुए केवल 25 दिन में 9 सितंबर को ब्रिटेन के टीसपोर्ट पहुंच गया।

इस रास्ते से इलेक्ट्रॉनिक सामान, लिथियम बैटरियां, इलेक्ट्रिक वाहनों के पुर्जे और सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण यूरोप भेजे जा रहे हैं। इन सामानों को ब्रिटेन के फेलिक्सस्टो, नीदरलैंड के रॉटरडैम, जर्मनी के हैम्बर्ग और पोलैंड के ग्डिनिया जैसे बंदरगाहों तक पहुंचाने की योजना है।

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कंपनी इस यात्रा में रूस के बर्फ तोड़ने वाले जहाजों की सेवाएं ले रही है। पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में सामान काफी कम समय में यूरोप पहुंच रहा है। अब तक कंपनी को यूरोप की ओर से किसी विरोध या प्रतिबंध का सामना भी नहीं करना पड़ा है।

दक्षिण कोरिया ने भी किया समुद्री रास्ते का परीक्षण

दक्षिण कोरिया का पैनस्टार समूह भी रसायन लेकर नॉर्दर्न सी रूट से यूरोप तक परीक्षण यात्रा कर चुका है। दक्षिण कोरिया के समुद्री और मत्स्य मंत्रालय और पैनस्टार के मुताबिक, 'पैनस्टार आर्को' नाम का कंटेनर जहाज अपनी परीक्षण यात्रा का पहला चरण पूरा कर चुका है। यह जहाज 21 दिनों में आर्कटिक मार्ग से ब्रिटेन और रॉटरडैम पहुंचा। जहाज क्रमशः 12 और 13 सितंबर को इन दोनों स्थानों पर पहुंचा। इसके बाद जहाज पोलैंड के ग्डिनिया जाएगा। वहां अतिरिक्त सामान लादने के बाद वह वापसी की यात्रा शुरू करेगा। इसके 12 अक्टूबर को दक्षिण कोरिया के बुसान लौटने की संभावना है।

दक्षिण कोरिया चाहता है कि इस परीक्षण से बुसान को आर्कटिक समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र बनाने में मदद मिले। हालांकि, 2030 से पहले इस रास्ते पर नियमित व्यावसायिक यातायात शुरू करने की कोई योजना नहीं है।

भारत के लिए यह रास्ता कितना फायदेमंद?

आर्कटिक को लेकर भारत की प्राथमिकता चीन और दक्षिण कोरिया से कुछ अलग है। भारत की दिलचस्पी इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और निवेश की संभावनाओं में ज्यादा है। भारत से सामान लेकर पूरे नॉर्दर्न सी रूट से यूरोप भेजना फिलहाल आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। इसके बावजूद मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों को देखते हुए यह रास्ता पारंपरिक समुद्री मार्गों का एक सुरक्षित और रणनीतिक विकल्प बन सकता है। भारत के लिए रूस का ट्रांस-आर्कटिक कॉरिडोर उस स्थिति में ज्यादा उपयोगी हो सकता है, जब सामान व्लादिवोस्तोक से लिया या वहां पहुंचाया जाए। इसके बाद उसे रूस के दूसरे हिस्सों तक भेजने के लिए सड़क, रेल और समुद्री नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है।

व्लादिवोस्तोक से भारत तक सामान लाने के लिए ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर का उपयोग हो सकता है। इसे चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा भी कहा जाता है। नॉर्दर्न सी रूट पर मौजूद रूस के पूर्वी बंदरगाहों और भारत के बीच सीधी माल ढुलाई की कुछ सेवाएं भी भविष्य में फायदेमंद बन सकती हैं। लेकिन इसके लिए रूस को इन बंदरगाहों को अपने ऊर्जा और खनिज प्रोजेक्ट से जोड़ना होगा।

भारत-रूस संबंधों के लिए नया अवसर

भारत और रूस की साझेदारी की मजबूत नींव 1971 की भारत-सोवियत शांति, मित्रता और सहयोग संधि से जुड़ी है। दुनिया में आए बड़े भू-राजनीतिक बदलावों के बावजूद दोनों देशों के रिश्तों का मूल स्वरूप कायम रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा है। मुश्किल समय में यह रूस की अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम साबित हुआ। साल 2022 में भारत का रूस से तेल आयात बढ़कर 45.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। पिछले साल यह आंकड़ा 79 अरब डॉलर को पार कर गया।

रूस आर्कटिक में समुद्री परिवहन, ऊर्जा और खनिजों से जुड़ी बड़ी परियोजनाएं तैयार कर रहा है। अगर भारतीय कंपनियां इन परियोजनाओं में हिस्सा लेती हैं तो दोनों देशों का व्यापार आने वाले वर्षों में नई ऊंचाई पर पहुंच सकता है।

जरूरी खनिजों के लिए रूस क्यों अहम?

भारत में दुर्लभ और महत्वपूर्ण धातुओं की मांग 2047 तक चार से दस गुना बढ़ने का अनुमान है। भारत अभी लिथियम, कोबाल्ट, निकल और कई दुर्लभ खनिजों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इसके अलावा 2025 से 2070 के बीच तांबा, ग्रेफाइट, सिलिकॉन और निकल जैसे खनिजों की मांग भी तेजी से बढ़ने का अनुमान है। रूस के पास इन खनिजों का विशाल भंडार है, जो भारत की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है। रूस के नोवाया जेमल्या द्वीप समूह में पावलोवस्कोये सीसा-जस्ता भंडार मौजूद हैं। याकूतिया का टॉमटोर क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े नायोबियम और दुर्लभ खनिज भंडारों में शामिल है। साइबेरिया का अंगारा-येनिसेई क्षेत्र भी दुर्लभ और दूसरी उपयोगी धातुओं के प्रसंस्करण का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

इन परियोजनाओं में भारत और रूस मिलकर निवेश करते हैं तो आर्थिक साझेदारी के नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे जरूरी खनिजों के लिए भारत की चुनिंदा देशों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

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रूसी कच्चा तेल खरीदे भारत, तैयार ईंधन वापस भेजे

भारत में तेल की मांग 2050 तक प्रतिदिन करीब 1.4 करोड़ बैरल पहुंचने का अनुमान है। इसी तरह 2030 तक देश में गैस की सालाना खपत 103 अरब घन मीटर हो सकती है। इसमें करीब 65 अरब घन मीटर गैस आयातित एलएनजी से मिलने की संभावना है। भारत-रूस व्यापार में कच्चा तेल सबसे महत्वपूर्ण वस्तु बना हुआ है। दूसरी ओर, रूस के आर्कटिक क्षेत्र में एलएनजी की विशाल क्षमता है, जिसका भारत ने अभी पूरी तरह उपयोग नहीं किया है।

एलएनजी लाने के लिए विशेष जहाजों की जरूरत होती है। लंबी दूरी के कारण परिवहन का खर्च बढ़ता है और आखिर में गैस की कीमत भी बढ़ जाती है। अगर कीमत और परिवहन की समस्या का समाधान हो जाए तो रूसी आर्कटिक की एलएनजी परियोजनाओं में निवेश भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है। यह पश्चिम एशिया में किसी भावी संकट की स्थिति में भारत को ऊर्जा आपूर्ति का दूसरा विकल्प भी देगा।

दूसरी ओर, भारत के पास कच्चे तेल को पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने की बड़ी क्षमता है। रूस को इस समय अपने देश में तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की मांग पूरी करने में मुश्किल हो रही है। ऐसे में भारत ने रूस को तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति बढ़ाई है। यह दोनों देशों के बीच सहयोग का एक नया क्षेत्र बन रहा है।

जहाज निर्माण में भी बन सकती है साझेदारी

भारत सरकार ने इस साल मार्च में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत जहाज निर्माण, पुराने जहाजों को तोड़ने और उनकी मरम्मत की सुविधाएं बढ़ाने के लिए करीब 8.4 अरब डॉलर तय किए। उधर, रूस में जहाजों के निर्माण और रखरखाव की मांग बढ़ रही है। इससे भारतीय जहाज निर्माण और मरम्मत कंपनियों को बड़ा कारोबारी अवसर मिल सकता है।

भारत और रूस दोनों पर्यावरण के अनुकूल बंदरगाह और साफ समुद्री ढांचा तैयार करने पर जोर दे रहे हैं। दोनों देश वैकल्पिक ईंधन, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक जहाज तथा ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर विकसित करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। बंदरगाहों को आधुनिक बनाने और माल ढुलाई बेहतर करने के लिए नई तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल भी बढ़ाया जा रहा है। इससे भारत और रूस के बीच तकनीक-आधारित सहयोग की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं।

भारत ने हाल में ‘इंडिया एआई मिशन’ के लिए करीब 1.25 अरब डॉलर तय किए हैं। वहीं ‘सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम’ का उद्देश्य देश में आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर व्यवस्था तैयार करना है। ये योजनाएं भारत और रूस के बीच तेजी से बढ़ते डिजिटल क्षेत्रों में भी सहयोग के अवसर खोल सकती हैं।

रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं

नॉर्दर्न सी रूट पर कंटेनर परिवहन अभी सीमित और मौसम पर निर्भर है। इस रास्ते से जहाज चलाने वाली कंपनियों को बड़ा कारोबारी जोखिम उठाना पड़ता है। रूस की एटमफ्लोट कंपनी का शुल्क जहाज के आकार, बर्फ में चलने की क्षमता, यात्रा की दूरी और बर्फ तोड़ने वाले जहाज की जरूरत के समय पर निर्भर करता है। इसके अलावा आइसब्रेकर की सेवाओं, आर्कटिक यात्राओं के महंगे बीमा और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले ट्रेन्ड चालक दल की वजह से खर्च बढ़ जाता है। इन चुनौतियों के बावजूद चीन और दक्षिण कोरिया नॉर्दर्न सी रूट से यूरोप तक परीक्षण के तौर पर सामान भेजना शुरू कर चुके हैं। दोनों देश इस नए रास्ते पर शुरुआती बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत को अब क्या करना होगा?

साल 2025 में रूस का कुल विदेशी व्यापार 697.3 अरब डॉलर था। इसमें एशियाई देशों की हिस्सेदारी 73.4% रही। भारत ने इसमें करीब 63.6 अरब डॉलर का योगदान दिया। चीन के बाद भारत रूस का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वह संयुक्त अरब अमीरात, ब्राजील, ईरान और दक्षिण अफ्रीका से काफी आगे है। भारत ने 2027 तक नॉर्दर्न सी रूट से अपना पहला माल भेजने की योजना बताई है। हालांकि, आर्कटिक क्षेत्र को लेकर उसकी व्यापक योजना अभी शुरुआती चरण में है।

रूस के आर्कटिक क्षेत्र का खुलना दोनों देशों के लिए नए कारोबारी अवसर लेकर आया है। इनका लाभ उठाने के लिए भारत सरकार को अधिक सक्रियता दिखानी होगी और भारतीय कंपनियों को इस क्षेत्र की परियोजनाओं से जोड़ना होगा। इससे भारत और रूस को 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। आगे चलकर दोनों देश इस लक्ष्य को पार भी कर सकते हैं।

(ओपिनियनः यह लेख पोरा एक्सपर्ट सेंटर (मॉस्को) के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विभाग की प्रमुख एकातेरिना सेरोवा और मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (नई दिल्ली) के एसोसिएट फेलो बिपनदीप शर्मा ने लिखा है। इस लेख में व्यक्त विचार और राय पूरी तरह लेखकों के निजी हैं। जरूरी नहीं कि RT भी इनसे सहमत हो।)