पाकिस्तान को अपनी 'मजबूरी' बताने वाले अमेरिका को भारत-ईरान की दोस्ती इतनी चुभती क्यों है?

भारत-अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में क्या वक्त का पहिया फिर से 70 के दशक की तरफ बढ़ रहा है? क्या अमेरिकी कूटनीति दशकों पुरानी नीति को दरकिनार कर पुराने रुख की ओर बढ़ रही है? पढ़िए विश्लेषण

1970 के दशक में जब रिचर्ड निक्सन अमेरिका के राष्ट्रपति थे और हेनरी किसिंजर नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (NSA) हुआ करते थे, उस वक्त वॉशिंगटन की विदेश नीति का झुकाव साफतौर पर पाकिस्तान की तरफ था। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ये और भी साफ तरीके से दिखा था। क्या भारत-अमेरिका के रिश्तों में वक्त का पहिया फिर से उसी तरफ बढ़ रहा है? भारत पर मार और तमाम हरकतों के बावजूद पाकिस्तान को पुचकार... क्या अमेरिकी कूटनीति दशकों पुरानी नीति को दरकिनार करके अपना पुराना रुख अपनाने की ओर बढ़ रही है?

पिछले कुछ समय की अमेरिकी कूटनीति पर नजर डालें और भारत यात्रा पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का बयान देखें तो ये सवाल उठना लाजिमी है। आतंकवाद को पालने-पोसने वाले पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के नरम रुख को लेकर एक इंटरव्यू में जब रूबियो से सवाल किया गया, तो उन्होंने क्या जबाव दिया, पहले ये देखिए।

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पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जिसके साथ हमें संबंध रखने ही होंगे। उसके पास परमाणु हथियार हैं, भौगोलिक रूप से भी वह अहम है। हमें उससे बातचीत करने की जरूरत होती है, ठीक वैसे ही जैसे भारत सरकार को ईरान के नेताओं के साथ संबंध रखने पड़ते हैं और उनसे मिलना होता है।
मार्को रूबियो, अमेरिकी विदेश मंत्री, एक सवाल के जवाब में
मार्को रूबियो, अमेरिकी विदेश मंत्री, एक सवाल के जवाब में

पाकिस्तान से संबंध मजबूरी क्यों?

अमेरिकी विदेश मंत्री ने न सिर्फ पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का हवाला दिया, बल्कि उससे संबंध रखने की अपनी मजबूरी भी जाहिर कर दी। तर्क दिया कि पाकिस्तान से अमेरिका के करीबी संबंध भारत की आतंकवाद संबंधी चिंताओं को दूर करने में मददगार बनते हैं। हालांकि इस दौरान उन्होंने एक बात और कही, जो दिखाती है कि भारत के ईरान से रिश्ते अमेरिका की नजरों में किस कदर चुभ रहे हैं। उनका कहना था कि जिस तरह भारत ईरान से संबंध रखता है, वैसे ही अमेरिका पाकिस्तान से रिश्ते बनाकर रखता है।

भारत-ईरान जैसा नहीं है ये रिश्ता

रूबियो कुछ भी कहें, लेकिन इन दोनों रिश्तों में फर्क है। ये किसी से छिपा नहीं है कि भारत-ईरान से संबंध सदियों पुराने हैं और आधुनिक दौर में रणनीतिक, व्यवहारिक, व्यापारिक और ऊर्जा संबंध जरूरतों पर टिके हैं।

भारत ने ईरान के चाबहार में रणनीतिक निवेश किया है। हाल ही में ईरान ने चाबहार बंदरगाह को जहेदान से जोड़ने वाली 730 किलोमीटर लंबी रेल लाइन का निर्माण पूरा किया है। ये लाइन ईरान के राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जुड़ेगी। भारतीय व्यापारियों के लिए ये अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधे संपर्क की अहम कड़ी साबित होगी। बड़ी बात ये कि इसके लिए भारत को पाकिस्तान का मुंह ताकने की जरूरत नहीं होगी।

भारत का इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने का पुराना प्लान है। मकसद है हिंद महासागर, फारस की खाड़ी और कैस्पियन सागर के जरिए भारत को ईरान, सेंट्रल एशिया और रूस से जोड़ना। इस लिहाज से चाबहार-जहेदान रेल लिंक अहम है। यह उत्तर की तरफ तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान को भी कनेक्ट करेगा।

‘सबका साथ-सबका विकास’ 

भारत ऐसी रीजनल कनेक्टिविटी का सपोर्ट करता है जो बाजारों को आपस में जोड़े, व्यापार को आसान बनाए और विकास के नए अवसर पैदा करे। ताजिकिस्तान के दुशान्बे में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा भी कि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और चाबहार पोर्ट जैसी पहल मध्य एशिया को व्यापक बाजारों से जोड़ने में अहम योगदान दे सकती हैं।

कहने का मतलब ये कि भारत की सोच 'सबका साथ-सबका विकास' वाली है। दूसरी तरफ अमेरिका की नीतिगत सोच सिर्फ अपने फायदे वाली ज्यादा लगती है। इसका सबसे हालिया उदाहरण रूस के साथ डीजल डील है।

'फायदे की दोस्ती' वाली अमेरिकी नीति

अमेरिका ने पिछले कई वर्षों से रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। रूस से संबंध रखने वाले भारत-चीन जैसे देश भी उसकी नजरों में खटकते हैं। रूसी तेल और अन्य वस्तुओं के आयात पर मनमाने टैरिफ थोपने के बाद, अब उसने 100 पर्सेंट तक टैरिफ लगाने का कानून भी पास कर दिया है।

अब जब ईरान पर अचानक हमले की आंच खुद अमेरिका को झुलसाने लगी तो उसने पलटी मार दी। डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल की मदद से अमेरिका में डीजल की कमी दूर करने की डील कर ली।

यहां अमेरिका का दोहरा रवैया साफ दिखता है। जब भारत रूस से अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए तेल खरीदता है तो अमेरिका उस पर टैरिफ थोपता है। रूस से व्यापार न करने का दबाव डालता है। ये अलग बात है कि भारत दबाव में नहीं आया और साफ कर दिया कि जहां से उसे सस्ता तेल मिलेगा, वह खरीदता रहेगा।

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रूबियो को दिखाया पाकिस्तान का असली चेहरा

अब अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ऐसे पाकिस्तान से अपने संबंधों को जायज ठहराने के तर्क दे रहे हैं, जो पूरी दुनिया में आतंकवाद फैलाने के लिए बदनाम है। अमेरिका खुद भी पाकिस्तान के आतंकवाद का पीड़ित रहा है। पाकिस्तानी आतंकियों के 2008 में किए गए 26/11 अटैक में 6 अमेरिकी नागरिक भी मारे गए थे। रूबियो मंगलवार को मुंबई के ताज महल पैलेस होटल में बने 26/11 स्मारक पर श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचे।

पाकिस्तान से अपने रिश्तों की दलील देने वाले अमेरिका को भारत ने इस दौरान आतंक का असली चेहरा भी आईना बनाकर दिखा दिया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ताज होटल के सिक्योरिटी चीफ सुनील कुडयादी की रुबियो से मुलाकात कराई, जो 26/11 अटैक के वक्त वहीं मौजूद थे और इस वीभत्स हमले को अपनी आंखों से देखा था। ये मुलाकात सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी बल्कि जयशंकर ने रूबियो को दिखाया कि पाकिस्तान की शह पर पलने वाले आतंकवाद के घाव कितने गहरे हैं।

आतंकवाद पर क्या उम्मीदें, जयशंकर ने बताया 

जयशंकर ने इसके बाद 'फ्रीडम 250' रिसेप्शन के दौरान अपनी एक्सपेक्टेशन भी सामने रख दीं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अपनी सुरक्षा के अधिकार को लेकर भारत का रुख पूरी तरह साफ है। वह अपने अंतरराष्ट्रीय साझीदारों से भी उम्मीद रखता है कि वो आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाएंगे। कूटनीति का दोहरा पैमाना अपनाने वाले अमेरिका के सामने उन्होंने साफ जता दिया कि भारत दोतरफा बातें स्वीकार नहीं करेगा। देश और देश के हितों की हिफाजत उसके लिए सबसे ऊपर है।

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